बहुत कम किताबें ऐसी होती हैं जो एक बैठक में ही समाप्त हो जाती हैं। मतलब एक बार पढ़ना शुरू किये तो आप बिना खत्म किये उठ नहीं सकते। फरवरी नोट्स एक ऐसा ही उपन्यास है।
बहुत समय पहले शैली की एक कविता पढी थी, 'ओड टू द वेस्टर्न विंड'। भाव यह था कि स्वय को तप्त रखकर यह पवन बारिश का कारण बन जाता है। तीव्र वेग होने के कारण जमीन पर छितरे झाड झंख़ाडो को उडा ले जाता है। इसकी दिशा हमेशा पूर्व की ओर है। वह कविता मन मे बस गयी। बरसो बरस बाद मेरे द्वारा बनाया गया यह ब्लाग उसी भाव का स्फुटन है।
समाजशास्त्रीय मंच: The Socological Forum
शुक्रवार, 6 नवंबर 2020
फरवरी नोट्स ऐसे ही एक बहाव की कहानी है, जो बुरी हो कर भी मीठी लगती है
सोमवार, 5 अक्टूबर 2020
फरवरी नोट्स : प्रेम गली अति सांकरी
फरवरी नोट्स (प्रेम गली अति सांकरी...)
मंगलवार, 25 अगस्त 2020
अंतस में दर्ज मधुमास के अनावरण का नाम है 'फरवरी नोट्स'
मधुमास के नुपुर खनखनाने लगते हैं. घर और दफ्तर का शोर अतीत की मधुर ध्वनियों में विलीन होने लगता है उस पार जाने के लिए वर्तमान की खाई के ऊपर पुल बनने लगता हैं। फरवरी हर साल आती है लेकिन जिस पर हमने कोई हर्फ़ लिखा है वह फरवरी जीवन में एक ही बार आती है। फिर से उसके वासंती पन्नों पर कुछ नोट्स लिखने की कोशिश होती है पर जैसे लिखे को मिटाना मुश्किल है वैसे ही धुंधले हो चुके अक्षरों के ऊपर लिखना भी मुश्किल होता है। ‘फरवरी नोट्स’ इन्ही मुश्किलों, नेह छोह के संबंधों और मन की छटपटाहटों की कहानी समेटे हुए है। यह कहानी मेरी है, यह कहानी आपकी है, यह कहानी हर उस व्यक्ति की है जिसके हृदय में स्पंदन है और स्मृतियों में कोई धुंधली सी याद जो एक निश्छल मुस्कुराहट का कारण बन जाती है।
प्रकाशक : हर्फ़
पब्लिकेशन
मूल्य २०० रूपये अमेज़न लिंक
सोमवार, 27 जुलाई 2020
प्रेम में पड़ी स्त्रियाँ
गोमुख से निकली गंगा
जिसके घाटों पर बुझती है
प्यासों की प्यास
लहरों पर पलते हैं धर्म
स्पर्श मात्र से तर जाती हैं पीढ़ियाँ
कंकर कंकर शंकर
हरियरा उठते हैं खेत
भर जाते हैं कोठार अन्न से
प्रेम में नदी बन जाने का मोल
अपने आँचल में विष्ठा समेटे
तेजाब और जहर में डूबी
मर चुकी होती हैं
सागर तक पहुंचने से पहले
सागर भी कोई कसर कहाँ छोड़ता है
प्रेम में पड़ी स्त्रियों के हरे घावों पर
लगा देता है खारेपन का नमक
अपना घर नही छोड़ना
प्रेम में नदी मत होना
सोमवार, 20 जुलाई 2020
डार्क सर्किल
ये घेरे इस बात के साक्षी हैं
कि उसकी सुंदरता आरोपित नही है
उसकी सुंदरता रात रात में अपने बच्चे को लोरी सुनाने और उसका बिस्तर बदलने से आई है
उसकी सुंदरता किसी को आंखों में बसाने से आई है
वे लोग बहुत सौभाग्यशाली होते हैं
जिन्हें एक स्त्री नींद के बदले अपने नयनों में जगह देती है
उसकी सुंदरता गृहस्थी के पाट में पिसकर आई है
ये आँख के नीचे घिरे काले बादल
सींचते हैं हर व्यक्ति को
क्या आपने भी इन घेरों में स्नान किया है?
इन्हें प्रणाम करिए
ये नीलकंठ से भी आदरणीय हैं
सत्य, शिव और सुंदर है
इन्होंने रात को पीकर
सुबह की है
शनिवार, 18 जुलाई 2020
कुछ सच्ची कुछ झूठी : हमारी आपकी कहानी
यह लेखक की ईमानदारी है जो पहले ही स्वीकार कर लेता है कि झूठ झूठ नही है। इस पुस्तक को कुल अठहत्तर शीर्षकों में समेटा गया है। यह सारे शीर्षक कुमारेंद्र के जीवन से जुड़े हुए वे मोड़ हैं जहाँ पर उन्होंने जीवन के महत्वपूर्ण हिस्सों को बिताया है। कुछ शीर्षक उनके जीवन दर्शन से जुड़े हुए हैं जो चालीस वर्ष के अनुभवों से प्राप्त हुए। कुमारेन्द्र लिखते हैं कोई इंसान संपूर्ण नहीं होता, कोई अपने में परिपूर्ण नहीं होता, खुद की कमियाँ जान कर खुद को सुधारने का प्रयास करते रहना चाहिए जो अपने हैं उन्हें अपने से दूर ना होने देने की कोशिश इसी जिंदगी में करना है क्योंकि यह जिंदगी ना मिलेगी दोबारा। यही लेखक की संवेदनशीलता और फलसफा दोनों है।
कुमारेन्द्र की आत्मकथा पढ़ते हुए हुए उनके रूबरू होने का मौका मिलता है चाहे वह उनका दबंग रूप हो या उनके कोमल मनोभाव हों अथवा गैर बराबरी के विरुद्ध मन में आए आक्रोश की बात, कुमारेंद्र हर समय न्याय के पक्ष में ही खड़े मिले । कन्या भ्रूण-हत्या को रोकने के लिए कुमारेंद्र ने 1998 में अजन्मी बेटियों को बचाने के लिए अभियान छेड़ा । वह उस समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते थे, बिना किसी की मदद के खुद इस पर काम करने का फैसला किया । कोई फंडिंग नहीं, कोई प्रशासनिक सहयोग नहीं पर इन्होंने अपना राष्ट्रव्यापी अभियान ‘बिटोली’ शुरू कर दिया और आज उसी को व्यापक जनसमर्थन मिलता हम देख सकते हैं। आत्मकथा के बीच- बीच में लेखक के सुकोमल संवेदनाओं के भी चित्र हमें दिखते हैं जैसे अगस्त के रविवार को आने वाले फोन को लेकर कुमारेंद्र की प्रतीक्षा आज भी निरंतर जारी है। कोई कितना बड़ा भी लेखक हो जाए लेकिन पहली बार उसके लेखन धर्म को स्वीकृति मिलना और साथ ही उसका सम्मान होना उसे कभी नहीं भूलता।
मंगलवार, 30 जून 2020
पारले जी : एक विरासत
मैं चाहता हूँ कि
'पारले जी' कभी न बदले
वही पैकेजिंग
वही स्वाद
वही दाम
(सरकार सब्सिडी दे इसके लिए)
न उसके खाने में हो
कोई इनोवेशन
चाय में डुबा डुबा,
या चाय का हलवा बना
या पानी के साथ
यात्रा में, पिकनिक पर,
नाश्ते में, शाम को कविता सुनते
या स्टडी टेबल पर
ठीक वैसे जैसे हम बचपन में इसे खाते थे
सायकल चलाते हुए,
रेस लगाते हुए,
स्कूल पीरियड में अध्यापक की नज़र बचाकर
बिस्कुट खाने के रिस्क का आनंद
नही बदलना चाहिए
दफ़्तर से घर लौटे पिता को
चाय के साथ दो बिस्कुट देती माँ
सुकून भी परोसती है
बिना दांतों वाली दादी बताती है
बिस्कुट पिया कैसे जाता है
हॉस्टल हो या परिवार
बिना 'पारले जी' के
सम्पूर्ण कहाँ होता है
'पारले जी' कोई उत्पाद नही
यह एक संस्कृति है
थाती है विरासत है
बचपन की अल्हड़ता
कैशोर्य के उत्सव
कॉलेज की टी पार्टीज
उसी संस्कृति के ही स्वरूप हैं
मैं चाहता हूँ कि
यह थाती अनवरत बनी रहे
इस संस्कृति का, विरासत का
हस्तांतरण हो
पीढ़ी दर पीढ़ी
बिना किसी बदलाव के
क्योंकि,
कुछ चीजे कभी नही बदलनी चाहिए
जैसे धरती, हवा, पानी, और
'पारले जी'
...डॉ. पवन विजय
शुक्रवार, 15 मई 2020
दुःखों की वसीयत
जब बंट रहे थे
खेत खलिहान दुआर मोहार
गोरु बछेरु बरतन भांड़े
ताल तलैया बाग बगीचे
जब बंट रहे थे
हाथी घोड़े जर जमीन
लाल मोहर गिन्नी अशर्फी रुपिया
यहां तक कि जब हुआ
ठाकुर जी का बंटवारा
कितने दिन किसके यहां रहेंगे
जब इस बात को भी तय किया गया कि
बाबा की बुढ़ौती किसके यहां
कितने महीने में कटेगी
तब भी मैं चुप बैठा था
आखिर सभी अपने अपने हिस्से लेकर
रखने संभालने का जतन करने लगे
डंड़वारें डाली जाने लगीं
खूंटे गाड़े जाने लगे
बरतनों की गिनाई शुरू हो गयी
तब भी घुटनों पर कुहनियां टिकाए
मैं चुप था
सामान अंदर हो गए
बालकों को भी बता दिया गया
अपना पराया क्या है
दरवाजों के अंदर से सिटकनी दे दी गयी
जोड़ घटाव का दौर जारी था
लिस्ट मिलाई जा रही थी
लाई खाते रस पीते बही देखते
अंत में एक पंच ने आवाज लगाई
शायद मेरी बारी आई है
पर अब बचा क्या है
सब तो बंट गया है
पंच मुझसे मुखातिब होकर बोला
तुम्हारे तुम्हे वसीयत में दुःख मिला है
जब एक चम्मच के लिए किए जाएंगे
लज्जित माँ बाप
एक सूत जमीन के लिए तारे जाएंगे
पुरखे देवता थान पवान
जरा सी बात पर तार तार होंगी
परंपराएं मूल्य प्रतिमान
तो उनसे उत्पन्न दुःखों के आकाश की वसीयत
तुम्हारे नाम की गयी है
तुम्हे दिया गया है पूर्वजों की
आशाओं अभिलाषाओं का कोष
वे दुःख जिन पर गीत बने
वे दुःख जिन्हें पीढ़ी वहन करती आई है
वे दुःख जिन्हें देवता भी धारण न कर सके
उन दुःखो की थाती तुम्हे मिली है
यह कह पंच उठ गया
मैं दुःखों के वसीयत की पोटली खोलने लगा
...पवन विजय
बुधवार, 13 मई 2020
हर कोई अपने घर लौटना चाहता है
जब जीवन की थकन
उदासियों के बोझ
तोड़ने लगते हैं कंधे
तो लगता है लौट जाएं अपने घर
जहां जीवन से भरी गेहूँ की बालियाँ
अब भी चैता गाती होंगी
नेह छोह के रंग अभी भी छपे होंगे
फागुन की दीवार पर
असाढ़ के भीगे दिन
सावन को गीत गाने आमंत्रित करते होंगे
भादों झरता होगा दालान की ओरी से
अब भी राह टेरती माँ
उसे देखते ही दूध भात लेकर आएगी
बाबा की आश्वस्ति भरी आंखें
मानस के स्वर
लालटेम की टिमटिमाती लौ
निरबंसियों के मटियारे गीत
सभी तो यथावत होंगे
बड़े घर का ऊंचा दरवाजा
वहीं कहीं देहरी पर दिया अब भी जल रहा होगा
जिसे बाल कर छोड़ आये थे
फलों से लदे बाग
जल से लहलहाता ताल
पनघट की रौनक
पकी फसलों वाले खेत
अन्न से भरे बखार
सब के सब समय की छीजन से अछूते होंगे
गांव कभी नही भूलता अपने बच्चों को
चौपालों में हर रोज उन्हें याद किया जाता है
जो एक एक कर चले गए होंगे
अभी भी उनके नाम के गीत गाये जाते हैं
कोलतार की तपती सड़कों पर जलते तलुओं को
कच्चे मेड़ों की ठंडक चाहिए
बस सबको अपना गांव वाला घर चाहिए
हर कोई लौट जाना चाहता है अपने घर को
जैसे घोंसले में लौटती है बया
जैसे सांझ को लौटती हैं गायें
जैसे बाजार से लौटते हैं पिता
जैसे मायके में आती हैं बेटियां
जैसे अयोध्या लौट आये थे राम चौदह बरस बनवास से
जैसे लौट आता है पंछी फिर से जहाज पर आकाश से
पर सनद रहे
लौटना तो बादल बनकर
खेत बनकर
ताल बनकर
फूल बनकर बाग बनकर
गेंहू और धान बनकर
गीत बनकर थाप बनकर
स्नेह और विश्वास बनकर
अगर ऐसे नही लौट पाए तो
लौटना चले जाने से भी बदतर होगा
गुरुवार, 7 मई 2020
अपना मिलना तय है
शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।
सुनना सांध्य गगन तारे से,
सुनना मौसम हरकारे से।
द्वार तुम्हारे जोगी आया,
सुनना उसके इकतारे से।
अहो कामिनी! मिलन यामिनी,
लेकर आता हुआ समय है।।
शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।
हर पल तुमसे संवादित हूँ,
तुम्हे सोचकर आह्लादित हूँ।
अर्थ दिए जो मृदुल नेह के,
उसी भाव में अनुवादित हूँ।
अधरों के प्रेमिल सत्रों से,
जीवन का हर कण मधुमय है।।
शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।
तनिक नही तुम होना चिंतित
किंचित मैं हूँ जरा विलम्बित
फूल नही वे मुरझा सकते
जिसे किया है हमने सिंचित
अरुणारे नयनों को एक दिन,
मद से भर जाना निश्चय है।।
शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।
डॉ. पवन विजय
(चित्र: गूगल साभार)

