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शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

हिन्दी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता अभियान : किसी दूसरी भाषा का विरोध किये बिना हिंदी के लिए आग्रह कीजिए: अमिताभ अग्निहोत्री




मैंने अपने पत्रकारीय जीवन की 25 वर्षों की यात्रा में देश में कई आम चुनाव और राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव देखे ---समूचा देश घूमा --- चारों दिशाओं में --- लेकिन कहीं भी मुझे किसी भी चुनावी सभा में कोई नेता इंग्लिश में वोट मांगता नहीं दिखा --- केरल में भी नहीं और तमिलनाडु में भी नहीं --भारत में चुनाव की भाषा या तो हिंदी है या फिर राज्यों की अपनी अपनी भाषाएं ---यानि  वोट अपनी ज़ुबान में ही मांगे जाते हैं। लेकिन मुश्किल तब होती है जब चुनाव की भाषा अपनी जुबां होती है और सरकार की भाषा इंग्लिश हो जाती है। देश का राजकाज उस भाषा में ही होना चाहिए जो भाषा अधिकाँश आम जनता समझ और जान सके। हाँ , सम्पर्क भाषा के रूप में इंग्लिश भी रहे -- लेकिन वह प्रथम भाषा नहीं हो सकती इस देश की। बैसे भी यह कुछ अनैतिक सा ही लगता है की आप वोट एक भाषा में मांगते हैं और सरकार दूसरी भाषा में चलाते हैं। यह आम जन के साथ छल जैसा ही है। अपने घर के जेवर और खेत बेंच कर ननकू जो मुकदमा लड़ता है , उसका फैसला आने पर उसे अपने वकील से पूछना पड़ता है कि वकील बाबू , हम जीते कि हारे। ना बहस की भाषा उसकी और ना फैसले की। इलाज़ में भी यही ---- जो डॉक्टर बता दे बही रोग और बही इलाज़ मानना होगा ननकू को --- क्यूंकि यंहा भी इलाज़ और जांच की जो भाषा है , वह ननकू की भाषा नहीं है। ऐसे असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं जो देश के लोक जीवन में विसंगतियां पैदा कर रहे हैं। ------- यह विसंगतियां देश की प्रगति को भी वाधित कर रही हैं। भाषा माध्यम है , और माध्यम अपना ना हो तो अवरोध स्वाभाविक हो जाता है। एक बात उन सभी से भी जो हिंदी को दुलार करते हैं। हिंदी को लेकर हमें अहसास-ए -कमतरी से उबरना होगा। अपनी माँ को लेकर संकोच या शर्मिंदगी क्यों और कैसी ??------- आपको अच्छी हिंदी आती है तो उसी में बोलिए --- अशुद्ध इंग्लिश का मोह क्यों पालें ?कुछ खरीदने जाएँ तो हिंदी में ही संवाद करें --- बच्चे स्कूल में इंग्लिश सीखें , अच्छी बात है , पर आप जब बच्चे के अध्यापक से मिलें तो हिंदी में ही बात करें -- बच्चे की प्रगति हिंदी  में  पूछी जा सकती है। कोशिश करिये डॉक्टर और वकील से भी हिंदी में ही बात हो। यकीन मानिए , आप हिंदी में बोलेगे तो जिन्हे हिंदी नहीं आती वो डॉक्टर और वकील भी हिंदी सीखने को मजबूर हो जाएंगे ---- धंधे का मसला जो है। जो व्यापार कर रहे हैं भारत में , उन्हें भारत की भाषाएँ सीखनी ही होंगी अगर हम चाह लें तो। जैसे अगर हम ब्रिटेन में कारोबार करना चाहते हैं तो हमें इंग्लिश सीखनी ही होगी। इसलिए अगर हम कमर कस लें तो भरोसा रखिये हर कारोबार करने वाला हिंदी में ही बोलेगा और लिखेगा। यही दबाब सरकारों पर भी बनाया जा सकता है , शर्त बस यही है की हम और आप चाहलें। तो आइये , आज और अभी से शुरुआत करें -------- किसी दूसरी भाषा का विरोध किये बिना हिंदी के लिए आग्रह कीजिए । 

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

हिन्दी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता अभियान: अपने ही देश में बेगानी होती हिंदी :नीरज कृष्ण

                                 
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है अर्थात जीवन के जितने भी दैनिक कार्य व्यापार हैं, गतिविधियाँ हैं उन्हें भाषा के माध्यम से संपन्न किया जा सकता है। भाषा ही व्यक्ति को समाज और समाज को देश अथवा विश्व-सूत्र में जोडती है। बहुभाषी समाज को राष्ट्र बनाने में भी भाषा की बड़ी भूमिका है। स्वतंत्रता  आंदोलन के रहनुमाओं ने महसूस किया था कि भारत जैसे बहुभाषिक देश में एक ऐसी संपर्क भाषा चाहिए जो संपूर्ण भारतीयों को एकसूत्र में बाँध सके। पहले यह काम संस्कृत के जिम्मे था और बाद में इसे हिंदी ने निभाया। हिंदी देश की संपर्क भाषा बनी।

प्रतिवर्ष 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ तो मनाया ही जाता है, साथ ही इसे विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए 10 जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ भी मनाया जाता है।

इसमें दो राय नहीं है कि - “हिंदी भारत की आत्मा ही नहीं, धड़कन भी है। यह भारत के व्यापक भू-भाग में फैली शिष्ट और साहित्यिक भाषा है। इसकी अनेक आंचलिक बोलियाँ हैं।

भाषा चाहे हिंदी हो या अन्य भारतीय भाषाएँ हो या फिर विदेशी भाषाएँ, अपने समाज अथवा देश की अस्मिता की प्रतीक होती हैं। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने भी कहा है कि “राष्ट्र के एकीकरण के लिए सर्वमान्य भाषा से अधिक बलशाली कोई तत्व नहीं।” अपनी भाषा के प्रति प्रेम और गौरव की भावना न हो तो देश की अस्मिता खतरे में पड़ सकती है।

फरवरी 1835 में भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा शत्रु लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश संसद में अपने विचार व्यक्त करते हुए अपना मन्तव्य स्पष्ट किया कि जब तक हम इस देश की रीढ़ की हड्डी न तोड़ दें, तब तक इस देश को जीत नहीं पायेंगे और ये रीढ़ की हड्डी है- इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, इसके लिए मेरा सुझाव है कि इस देश की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को इसकी संस्कृति को बदल देना चाहिए।

लार्ड मैकाले ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपनी शिक्षा नीति बनाई, जिसे आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली का आधार बनाया गया ताकि एक मानसिक रूप से गुलाम मुल्क तैयार किया जा सके, क्योंकि मानसिक गुलामी, शारीरिक गुलामी से बढ़कर होती है।

मैकाले ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था लागू की कि भारतीयों की सोच बदल गयी, अपनी संस्कृति और सभ्यता उनको गंवारू और पिछड़ी हुई लगने लगी और अंग्रेजी सभ्यता, अंग्रेजी भाषा उनके मनोमस्तिष्क पर छा गयी।

यहाँ तक कि भारतीय संविधान में 26 जनवरी 1950 को जो संविधान इस देश में लागू हुआ उसके अनुच्छेद 343 के अनुसार तो व्यवस्था ही निर्धारित कर दी गयी कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी इस देश में संघ (Union) सरकार की भाषा रहेगी,राज्य सरकारों को भी छूट दे दी गयी कि वो चाहे हिंदी  अपनाएं या अंग्रेजी को।

संविधान में ही ये भी अनुच्छेद 343 में ये प्रावधान करते हुए तीसरे पैराग्राफ में लिखा गया कि भारत के विभिन्न राज्यों में से किसी ने भी हिंदी का विरोध किया तो फिर अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा।

संविधान निर्माताओं ने तो अनुच्छेद 348 में स्पष्ट कर दिया कि भले ही हिन्दुस्तान में सबसे अधिक हिंदी बोली जाती हो परन्तु उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी।

हिंदी का सर्वाधिक अहित तो देशवासियों ने किया जो हिंदी भाषी परिवार में जन्म लेते और पलते हैं, हिदी हमारी रगों में होती है परन्तु दीवानगी अंग्रेजी के प्रति इतनी अधिक है कि भले ही अंग्रेजी के माध्यम से समझने में कई गुना अधिक समय लगे परन्तु अपनाते अंग्रेजी ही हैं। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि किसी भी राष्ट्र का सम्पूर्ण विकास अपनी भाषा में ही सम्भव है। आधुनिक युग में भी सभी कार्य हिंदी में संभव है, परन्तु देशवासियों का अंग्रेजी के प्रति मोह अपरम्पार है।

हिंदी और भारतीय भाषाओं के विद्वानों, लेखकों, कम्पयूटर विशेषज्ञों, तकनीकी विशेषज्ञों को संयुक्त रूप से अपनी भाषाओं के हित में काम करना होगा। हिंदी का हित भारतीय भाषाओं से अलग नहीं है। वैश्वीकरण और सूचनाक्रांति के दौर में हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाएँ भी पिछड़ रही हैं। अंग्रेजी का वर्चस्व सब को दबा रहा है इसलिए सब भारतीय भाषाओं के हितैषियों को एकजुट होकर अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती देनी चाहिए।



शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

हिन्दी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता अभियान :हिंदी - अश्पृश्यता की तरफ उन्मुख क्यों; डॉ. आलोक चान्टिया


इस पृथ्वी पर पैदा होने वाला कोई भी मानव बच्चा किसी ना किसी संस्कृति का अटूट हिस्सा जरुर है और चाहे बोली के स्तर पर या फिर भाषा के स्तर पर वह अपने चारों ओर बहुधा बोली जाने वाले स्वर ज्ञान को अपनाता है जिससे न सिर्फ वह मौलिक रूप से उस संस्कृति का सदस्य प्रदर्शित होता है बल्कि संरक्षण की विधा को भी स्वाभाविक रूप से अपनाते हुए किसी बोली या भाषा को संरक्षित करता है | लेकिन विज्ञान के बढ़ते कदम ने जैसे जैसे मानव जीवन को जटिलता की ओर उन्मुख किया वैसे वैसे मानव अपनी मूल संस्कृति से दूर उस संस्कृति को सीखने के लिए भागने लगा जो उसकी नहीं थी | ऐसा करके वो अपनी संस्कृति में एक विशिष्टता को प्राप्त होने लगा और विशिष्टता प्राप्त करने से आने वाले परिवर्तन को देख कर ना जाने कितने लोग दूसरी संस्कृति को सीखने के लिए प्रेरित होने लगे | इस तरह की प्रक्रिया से जो सबसे बड़ा दुष्परिणाम आया वो मूल संस्कृति का पराभव था और उसमे भी उस संकृति की बोली या भाषा पर तुषारापात हुआ क्योकि ज्यादातर संस्कृति ने किसी विशिष्ट ज्ञान को अपनी संस्कृति की भाषा में परवर्तित करने का प्रयास नहीं किया और ये चिंताजनक स्थिति भारत और वह बोली जाने वाली हिंदी में अपेक्षाकृत ज्यादा ही दृष्टिगोचर हुई | जिन संस्कृतियों ने इस मूल तत्व को समझ लिया उन्होंने दूसरी संस्कृति की तरफ अंधी दौड़ लगाने के बजाये उस संस्कृति के विशिष्ट तत्वों को अपनी शैली में समाहित करके अपनी ही संस्कृति कोना समृद्ध किया बल्कि अपनी भाषा को भी समृद्ध किया जैसे फ्रेंच समाज शास्त्री इमाइल दुर्खीम ने अपनी सारी पुस्तक फ्रेंच भाषा में ही लिखी पर उनके कार्यो की आवश्यकता को महसूस करके अमेरिका या इंग्लॅण्ड जैसे देशो ने फ्रेंच को अपनाने के बजाये दुर्खीम के कार्यों को अपनी आंग्ल भाषा में अनुवाद करके उसको अपने लिए प्रयोग किया और अपनी भाषा को भी विश्व स्तर का बनाने में सहयोग किया | और आंग्ल भाषा के इसी प्रयास ने कभी उनकी संस्कृति को समाप्त होने के बजाये उसे एक ऐसी निरंतरता प्रदान की कि देखते देखते आंग्ल भाषा की सर्वाभौमिकता को पूरे विश्व ने स्वीकार कर लिया पर इसी का अबहव हिंदी भाषा में मिलता है | इसी देश में संतोषम परम सुखं के भाव को हर जगह आरोपित करके ये प्रयास कभी नहीं किया गया कि हिंदी को सार्वदेशिक और सर्वकालिक बना दिया जाये और इसके विपरीत आंग्ल भाषा ने हिंदी के प्रभाव को कभी उतने निम्न स्तर पर ले जाकर नही देखा जितना हिंदी भाषी लोगो ने ही करके देखा और इसी लिए ऑक्सफ़ोर्ड जैसे  प्रतिष्ठित  शब्दकोश ने अपने शब्द कोष माला को समृद्ध बनाने केलिए २०,००० ( बीस हज़ार ) से ज्यादा शब्दों को अपने में सम्मिलित किया | विश्व ने सदैव ही हिंदी के वर्चस्व को स्वीकार किया है इसी लिए आज विश्व के सभी बड़े विश्वविद्यालयों में हिंदी एक विषय के रूप में पढाया जाता है | यही नहीं डिस्कवरी , एनिमल प्लैनेट , हिस्ट्री १८ , नैशनल जियोग्राफिक आदि चैनल ने अपने यहाँ से प्रसारित कार्यकर्मो को हिंदी में भी रखा है लेकिन विदेशियों से इतर हम अपने देश में ही हिंदी बोल कर अपने को हीन महसूस करने लगे है | हमने अपनी भूमिका एक श्रोता की तरह समझ ली है जिसे किसी के हिंदी बोलने या लिखने पर सिर्फ तली बजानी है पर स्वयं हिंदी को बढ़ने के लिए कुछ नहीं करना है | हम अतीत को याद करके गौरवांन्वित होने वालों की कतार में खड़े है जो इस तथ्य पर गौरव उसू करता है कि देश का प्रधानमंत्री हर मंच से हिंदी बोलते है और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में दिए गए भाषण पर हमें हिंदी के उस स्थान का बोध होता है जिसमे शायद हम खुद मान लेते है कि जिस भाषा का प्रयोग करना या उससे जुड़े होने का तथ्य हम स्वयं के लिए स्वीकार करना पसंद नहीं करते उसी हिंदी भाषा को संयुक्त राष्ट्र में बोलना बड़ी बात है मानो हमने संविधान में प्रदत मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद १७ के अश्पृश्यता  की समाप्ति को मानव के लिए तो स्वीकार कर लिए पर उसको हिंदी भाषा के तरफ सरका दिया और जो भी आज के दौर में हिंदी बोलता दिखाई पद जाता है उसकी स्तर और शिक्षा और प्रगति करने की संभावना आदि पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह  लग जाता है | इंदिरा गाँधी मुक्त राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के किसी भी साक्षात्कार के पत्र में स्पष्ट लिखा रहता है कि अभ्यर्थी साक्षात्कार हिंदी में देना चाहते हो तो स्पष्ट रूप से लिखे | पर ज्यादातर लोग इस अवसर को सिर्फ इस लिए उठाने में हिचकते है क्योकि इसमें ये भी भाव रहता है कि उनको अंग्रेजी नहीं आती है जबकि इस तरह के लाभ से हिंदी के लिए माहौल बनने में सहायता मिलती है | इसके अतिरिक्त अभ्यर्थी इस लिए भी हिंदी में साक्षात्कार के विकल्प को चुनने से डरता है क्योकि उसे भय रहता है कि कही साक्षात्कार सदस्य इस लिए उसका चयन ना करें क्योकि उसे अंग्रेजी ही नहीं आती है | और इसी लिए सामान्यतया हिंदी की मृत्यु हो जाती है | कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार के एक प्रतिष्ठान में एक महिला को उसके अधिकारीयों ने एक पत्र आंग्ल भाषामे दिया पर उस महिला ने ये कह कर लेने से लेने मना कर दिया कि पत्र हिंदी में दिया जाया क्योकि आंग्ल भाषा में एक शब्द के तीन चार मतलब निकलते है जो मुझे नुकसान पंहुचा सकते है | लिखित रूप से दिए जाने पर उस महिला को अधिकारीयों ने बुलाया और कहा कि देखिये आपकी जो शिक्षा है उससे ये नही कह सकती कि आपको अंग्रेजी नहीं आती और फिर आगे आपके जो भी कार्य होंगे वो आपको इस लिए नुकसान पंहुचा सकते है क्योकि आपने लिखित रूप में कहा है कि मुझे पत्र हिंदी में दिए जाये | महिला ने कहा कि मैंने कही नहीं कहा कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती और हिंदी में बात करना लिखना किस नियम में बुरा है | मैं तो सिर्फ हिंदी के लिए प्रयास कर रही हूँ | अभी तक मामला लंबित है |
हिंदी को संविधान के अनुच्छेद ३४३ में राज भाषा का दर्जा दिया गया ना कि राष्ट्रीय भाषा का और इसी लिए आज तक देश एक सूत्र में नहीं बंध पाया | भारत विविधताओ का देश होते हुए भी जैसे रेल की पटरी किसी राज्य के सीमा विवाद से परे स्वतंत्र  है और इसी लिए भारतीय रेल आसानी से पूरे देश को पटरियों के सहारे एक सूत्र में जोड़े रहती है उसी तरह प्रदेश की सीमओं से परे हिंदी को सबसे ज्यादा लोगो और राज भाषा होने के कारण राष्ट्रीय भाषा का गौरव दे देना चाहिए ताकि कश्मीर से कन्या कुमारी तक लोग एक दूसरे को समझ सके और अपने को समझा सकें | लेकिन ऐसा अभी दिवा स्वप्न सा है क्योकि मजबूत इच्छा शक्ति की कमी , राजनैतिक लोलुपता , राष्ट्रीयता के प्रति उदासीनता , अपनी धरोहर हो बचाने की उत्कंठा रहित सामजिक सोच और भाषा के महत्व को समझाने के आवश्यक जागरूकता की कमी आदि ऐसे महत्वपूर्ण कारक है जो हिंदी को पतन की ओर ले जा रहे है | हिंदी के महत्व को जितना विदेशियों ने समझा है उतना ही हम सबको समझना होगा और मानवधिकार के अवयवों में घर , प्यास , भोजन , स्वास्थ्य के अनुरूप ही भाषा के अधिकार को भी मानवधिकार के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु के रूप में सम्मिल्लित किया जाये क्योकि भाषाई संहार को रोकना एक देश को बचाने से कम नहीं है | भारतेंदु हरिश्चन्द्र की पंक्तियों “ निज भाषा उन्नति ....” को समाहित  करना   ही हमारा सबसे बड़ा काम होना चाहिए और सरकार को हिंदी अनुवाद का काम राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहिए जैसे हमारे पुरानो , उपनिषदों आदि का अनुवाद अंग्रेजी में हो रहा है और सभी स्कूल , कालेज , विश्वविधायालय में पढाई पुस्तक आदि हिंदी में अवश्य हो और इसी प्रयास से हम हिन्दी   को अपनों के बीच से अश्पृश्य  होने से बचा लेंगे|