बुधवार, 30 जून 2010

तुम भी कही भीगती होगी..........

सावन की सीली हवाएं
जब तन से मेरे टकराती है,
तुम्हारे कोमल छुअन की यादें
मुझे  पुकार जाती है.
धुली और पनियल सडको से
काफी हाउस आना,
घुमड़ते कारे बादलो की
फुआरों में भीज जाना.




तुम्हारे बालो का गीलापन
मेरे कंधे पर होता था,
सारा रेगिस्तान मेरा
उस पल को गायब होता था.
तुम्हारे साथ बिताई हुयी
हर शाम याद आती है,
जिस बात पर हंसी थी तुम
वो बात याद आती है.
आगे सावन बरसे ना बरसे
लेकिन बारिश लम्बी होगी,
मेरी आँखों के बादल से
तुम भी कही भीगती होगी.
तुम भी कही भीगती होगी..........







सोमवार, 28 जून 2010

मौन निमंत्रण मेरा.........


मधुवन को भीनी खुशबू से
महकाए जब रजनीगंधा
अम्बर में तारो संग संग
इतराए इठलाये चंदा
मुसकाते बलखाते झरने
लगे सुनाने गीत सुहाने
उनकी धुन पर ढलकी जाए
लोरी गाये जब संझा
मौन निमंत्रण मेरा प्रियतम
आ जाओ बन आनंदा


दीप बुझे जब जग के सारे
मन में दीप जलाना तुम
बुलबुल गीत सुनाती है तब
हौले से कदम बढ़ाना तुम
चौकड़िया भरते मृगशावक
राह दिखायेगे तुमको
मेरी बंशी की धुन
मेरा पता बताएगी तुमको
मधुर रागिनी सुनकर आली
आना तुम बन वृंदा
मौन निमंत्रण मेरा प्रियतम
आ जाओ बन आनंदा






बुधवार, 9 जून 2010

प्री-टेक्निक युग की खुदाई


नीम का पेड़
छोटे -छोटे शालिग्राम
कुए का ठंडा पानी
और  पीपल की नरम छांह
सुबह का कलेवा
'अग्गा राजा दुग्गा दरोगा'
गन्ने का रस और दही
साथ में आलू की सलोनी
गेरू और चूने से
लिपे पुते   घर में
आँगन और तुलसी
दरवाजे की देहरी
ताख में रखा दिया
उजास का पहरिया
बाबा की झोपड़ी
और मानस की पोथी
लौकी की बेले
छप्पर पर आँखमिचौनी खेले
आमो का झूरना
महुए  का बीनना
अधपके गेहू की  बाली का चूसना
बगल के बांसों की
बजती बांसुरी
खेत खलिहान में काम करते
बैल हमारे परिवार के
और पास में चरते गोरू बछेरू  घर के
प्री-टेक्निक युग की खुदाई में
मिली ये सारी वस्तुए
जिनको मैंने खोया था
कई बरस पहले
कई बरस पहले...............

सोमवार, 7 जून 2010

मेरी धरती



                                  
                                
  तुम जलती हो ,
 जो धूप मै देता हूँ.
तुम भीगती हो,
जो पानी मै उडेलता हूँ.
तुम कांपती हो,
जो शीत मै फैलता हूँ.
सबकुछ समेटती हो,
जो मै बिखेरता हूँ.
तुम सहती हो
बिना किसी शिकायत के


मेरी धरती,
तुम रचती हो,
सृष्टि  गढ़ती हो
और मै तुम्हारा आकाश
तुम्हे बाहों में भरे हुए
चकित सा देखता  रहता हूँ
तुम हसती हो
निश्छल  हसती जाती हो
हवाए महक जाती है
रुका समय चल पड़ता है
और ज़िन्दगी नए पड़ाव
तय करती है.

रविवार, 6 जून 2010

दोगलापन

दर्शन और व्यवहार का दोगलापन ही वह सहज चीज़ है जो इस जमाने को हर गुजरे जमाने से अलग करता है. हो सकता है किसी जमाने में आदमी ज्यादा बर्बर हिंसक या आक्रामक रहा हो लेकिन यह तय है की उस पशुत्व में भी कम से कम धोखाधड़ी न थी. हो सकता है की चंगेज़ो या नादिरशाहो ने नरमुंडो के ढेर लगाए हो पर यह तय है उन्होंने मानवतावाद सह अस्तित्व प्रजातंत्र या समाजवाद के नारे नहीं ही लगाए थे. साम्प्रदायिकता प्रबल रही होगी लेकिन निश्चित ही धर्मनिरपेक्षता की ओट में नहीं रही होगी. गौर से देखा जाय कि बीसवी शताब्दी और खासकर द्वितीय विश्वयुद्ध  के बाद की दुनिया छद्मवाद की दुनिया है. मानवता और प्रजातंत्र का रक्षक बेहिचक परमाणु बम  का प्रयोग करता है  जनसमर्थन से क्रान्तिया   करने वाले जनसंहार में तिल भर संकोच नहीं कर रहे है. प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाये नंगी ताकत के सहारे चल रही हैं. धर्मध्वजा लहराते हुए विजय अभियान पर निकले गिरोह अपने वास्तविक उद्देश्यों में धर्मनिरपेक्ष नहीं तो गैर धार्मिक तो है ही और उनसे कही कमतर नहीं वो धर्मनिरपेक्ष जो बिना साम्प्रदायिक टुकडो में बांटे सच्चाई को देख ही नहीं सकते. पर्यावरण को नष्ट करने वाली नयी से नयी तकनीक का प्रयोग करने वाले ही यह हैसियत  रखते है वो  पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़े से बड़ा एन.जी.ओ. चलाये.
सो भैया देखो राज तो है दोगलो का ढोल में पोल,घुस सके तो घुस जा और न घुस पाए  तो ढोल की तरह पिट. दोनों ही सूरत में कल्याण नहीं है. आवश्यकता है सहज ढंग से चलने  वाली व्यवस्था का जिसमे शिखंडी तत्व कि मौजूदगी न हो.
क्रमश.........

बुधवार, 2 जून 2010

तुम्हारी याद ...............


अकेले में तुम्हारी याद आना

अच्छा लगता है,

तुम्ही से रूठना तुमको मनाना

अच्छा लगता है।

धुन्धलकी शाम जब मुंडेर से

पर्दा गिराती है,

सुहानी रात अपनी लट बिखेरे,

पास आती है,

तुम्हारा चाँद सा यूँ छत पे आना,

अच्छा लगता है।

फिजाओं में घुली रेशम नशीला

हो रहा मौसम,

ओढ़कर फूल का चादर सिमटती

जा रही शबनम,

हौले से तुम्हारा गुनगुनाना

अच्छा लगता है।

अकेली बाग़ में बुलबुल बिलखती है

सुलगती है,

रूमानी चांदनी मुझपर घटा बनकर

पिघलती है,

तुम्हारा पास आना मुसकराना

अच्छा लगता है

अकेले में तुम्हारी याद आना

अच्छा लगता है।


मंगलवार, 1 जून 2010

हिन्दुस्तान बदल रहा है.......

महबूब-ए-मुल्क की हवा बदल रही है,
ताजीरात-ए-हिंद की दफा बदल रही है.
अस्मत लुटी अवाम की कहकहो के साथ,
और अफज़लो की सजा बदल रही है.
बारूदी बू आ रही है नर्म हवाओ में,
कोयल की भी मीठी ज़बा बदल रही है.
सुबह की हवाखोरी भी हुई मुश्किल,
जलते हुए टायर से सबा बदल रही है.
सियासत ने हर पाक को नापाक कर दिया,
पंडित की पूजा मुल्ला की अजां बदल रही है.
कहने को वह दिल हमी से लगाए है,
मगर मुहब्बत की वजा बदल रही है.
दुआ करो चमन की हिफाजत के वास्ते,
बागबानो की अब रजा बदल रही है।
निगहबानी करना बच्चो की ऐ खुदा,
दहशत में मेरे शहर की फ़ज़ा बदल रही है.
महबूब-ए-मुल्क की हवा बदल रही है.