सोमवार, 27 जुलाई 2020

प्रेम में पड़ी स्त्रियाँ


प्रेम में पड़ी स्त्रियाँ हो जाती हैं
गोमुख से निकली गंगा
जिसके घाटों पर बुझती है
प्यासों की प्यास
लहरों पर पलते हैं धर्म
स्पर्श मात्र से तर जाती हैं पीढ़ियाँ
कंकर कंकर शंकर
हरियरा उठते हैं खेत
भर जाते हैं कोठार अन्न से



प्रेम में पड़ी स्त्रियों को चुकाना होता
प्रेम में नदी बन जाने का मोल
अपने आँचल में विष्ठा समेटे
तेजाब और जहर में डूबी
मर चुकी होती हैं
सागर तक पहुंचने से पहले
सागर भी कोई कसर कहाँ छोड़ता है
प्रेम में पड़ी स्त्रियों के हरे घावों पर
लगा देता है खारेपन का नमक

प्रेम में पड़ी स्त्रियों!!
अपना घर नही छोड़ना
प्रेम में नदी मत होना

सोमवार, 20 जुलाई 2020

डार्क सर्किल

स्त्री की सुंदरता देखनी है
उसकी आँखों में नही
आँखों के नीचे बने काले घेरों में देखो
ये घेरे इस बात के साक्षी हैं
कि उसकी सुंदरता आरोपित नही है
उसकी सुंदरता रात रात में अपने बच्चे को लोरी सुनाने और उसका बिस्तर बदलने से आई है
उसकी सुंदरता किसी को आंखों में बसाने से आई है
वे लोग बहुत सौभाग्यशाली होते हैं
जिन्हें एक स्त्री नींद के बदले अपने नयनों में जगह देती है
उसकी सुंदरता गृहस्थी के पाट में पिसकर आई है
ये आँख के नीचे घिरे काले बादल
सींचते हैं हर व्यक्ति को
क्या आपने भी इन घेरों में स्नान किया है?
इन्हें प्रणाम करिए
ये नीलकंठ से भी आदरणीय हैं
सत्य, शिव और सुंदर है
इन्होंने रात को पीकर
सुबह की है

शनिवार, 18 जुलाई 2020

कुछ सच्ची कुछ झूठी : हमारी आपकी कहानी


'कभी हसरत थी आसमां छूने की अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की',ओपनिंग लाइन है डॉ. कुमारेंद्र सिंह सेंगर आत्मकथा  'कुछ सच्ची और कुछ झूठी की'   शुरुआती पंक्तियों से ही पता चल जाता है कि लेखक ठहराव वाले मिज़ाज का  व्यक्ति नहीं है।   अपनी आत्मकथा के बारे में कुमारेंद्र लिखते हैं कि  इसकी कल्पना उन्होंने तब  की थी जब वह बचपन में महापुरुषों की जीवनी/संस्मरण पढ़ते थे और उनके मन में ख्याल आता था कभी ऐसी ही उनकी जीवनी या संस्मरण लोग पढ़ेंगे   एक  तरीके से उनकी आत्मकथा, उनके द्वारा बचपन में देखे गए स्वप्न के  यथार्थ में परिणीति है।   वैसे तो पुस्तक का नाम 'कुछ सच्ची कुछ झूठीहै किंतु कुमारेंद्र शुरू में ही स्पष्ट कर देते हैं सब कुछ  सच्ची है कुछ भी झूठी नहीं है। वह कहते हैं कि ये जो झूठी बात है दरअसल वह सत्य ही है पर किसी और तरीके से कही गयी बात है। शायद समाज के मापदंड और कुमारेन्द्र की छवि उस सत्य  के अनुरूप नही है इसलिये कुछ बातों को झूठ के खोल में प्रस्तुत किया गया है।  

यह  लेखक की ईमानदारी है जो पहले ही स्वीकार कर लेता है कि झूठ झूठ नही है। इस पुस्तक को कुल अठहत्तर शीर्षकों  में समेटा गया है।  यह सारे शीर्षक कुमारेंद्र के जीवन से जुड़े हुए वे  मोड़ हैं जहाँ  पर उन्होंने जीवन के महत्वपूर्ण हिस्सों को बिताया    है।   कुछ शीर्षक  उनके जीवन दर्शन से जुड़े हुए हैं जो चालीस वर्ष  के अनुभवों से प्राप्त हुए। कुमारेन्द्र लिखते हैं कोई इंसान संपूर्ण नहीं होता, कोई अपने में परिपूर्ण नहीं होता, खुद की कमियाँ  जान कर खुद को सुधारने का प्रयास करते  रहना  चाहिए जो अपने हैं उन्हें अपने से दूर ना होने देने की कोशिश  इसी जिंदगी में करना है क्योंकि यह जिंदगी ना मिलेगी दोबारा। यही लेखक की संवेदनशीलता और फलसफा दोनों है।  

अमूमन आत्मकथा में लेखक वह सभी  बातें लिखता है जो उसके जीवन में दबी  छुपी हुई होती खासतौर से व्यक्तिगत जीवन में आए उतार-चढ़ाव के बारे में।   कुमारेंद्र स्वयं लिखते हैं कि   बात आत्मकथा की हो तो लोगों की यह जानने की इच्छा रहती है लेखक के जीवन की व्यक्तिगत संबंधों को सार्वजनिक किया जाए किंतु जब लेखक यानी कुमारेंद्र  के जीवन में घटित प्रेम कहानियों की बात हो  थोड़ी निराशा होती है।   उन्होंने यह स्वीकार तो किया है कि  उनके प्रेम संबंध ढेर सारे लोगों से रहे हैं पर किसी विशेष घटना किसी विशेष व्यक्ति का संदर्भ देने से लेखक ने स्वयं को बचा लिया शायद यहाँ सोशल स्टिग्मा आड़े आ गया।   यहाँ पर प्रेम कहानियों की जगह पाठक को प्रेम के दर्शन से रूबरू होना पड़ता है।   

कुमारेंद्र अपनी आत्मकथा में जब अपने बचपन  की बात कर रहे होते हैं तो ऐसा लगता है कि वह सभी के बचपन की बात कर रहे हो।  पहले दिन स्कूल जाने की बात, इस स्कूल में शिक्षकों की बात दोस्तों की बात खेलों की बात खिलौनों की बात सारी बातें ऐसी लगती हैं कि वह हमारी कहानी हो और उसे तुम्हारे अपनी आत्मकथा के माध्यम से लिख रहे हो दूरदर्शन का प्रारंभिक दौर  का वर्णन कुमारेंद्र ने बड़ी खूबसूरती के साथ अपनी कथा में किया।   ऐसे ही एक कहानी साइकिल के बारे में है । कुमारेन्द्र  अपने अपने दो दोस्तों के साथ  चार आने  किराए पर साइकिल   पूरे दिन उसे चलाते रहे फिर शाम को घर ले गए।   दोस्तों ने साइकिल को अपने पास रखने से मना कर दिया(कितने चालाक दोस्तों के साथ दोस्ती रही ) तो वह  उसे अपने घर ले गए और छत पर छिपा दिया ।   शाम को साइकिल वाला कुमारेंद्र के घर पहुँच गया तो उन्हें  लगा कि  पिताजी अब पिटाई करेंगे पर जब उन्होंने सच  सच बात पिताजी को बताई  तो पिताजी ने कुमारेन्द्र  से कुछ नहीं कहा।   बहुत सारे बच्चे झूठ बोलकर किसी समस्या से बचने का प्रयास करते हैं  पर कुमारेंद्र सच बोलकर समस्याओं को सुलझाने की कोशिश बचपन से ही करने लगे।    ऐसी बहुत सी कहानियां हैं, नानी के गांव की बात, क्रिकेट की बात, लोकल फोन  से पहले पहली बार बात  करना, पहली बार  रोटी बनाने की बात और कुछ बहुत कोमल बातें हैं जैसे अपने साथ पढ़ने वाली लड़की जो कि गाने में बहुत अच्छी थी उसकी चर्चा कुमारेन्द्र अत्यंत सतर्कता से करते हैं ।  इसके साथ-साथ  खिड़की वाले भूत की बातें, रक्तदान की बातें और पहली बार दुनाली चलाने वाली बात का उल्लेख उन्होंने विशेष तौर पर किया है।   आज हम कुमारेंद्र का एक यूट्यूब चैनल देखते हैं जो कि ‘दुनाली’ के नाम पर है तो यह लगता है उन्हें इसकी प्रेरणा उन्हें पहली बार  फायर किए हुए दुनाली से मिली।  

कुमारेन्द्र  की आत्मकथा पढ़ते हुए  हुए उनके रूबरू होने का मौका मिलता है चाहे वह उनका दबंग रूप हो या उनके कोमल मनोभाव हों  अथवा  गैर बराबरी के विरुद्ध मन में आए आक्रोश की बात, कुमारेंद्र हर समय न्याय के पक्ष में ही खड़े मिले ।   कन्या भ्रूण-हत्या को रोकने के लिए  कुमारेंद्र ने 1998 में  अजन्मी  बेटियों को बचाने के लिए अभियान छेड़ा ।  वह उस समय  प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते थे, बिना किसी की मदद के  खुद इस पर काम करने का फैसला किया    कोई फंडिंग नहीं, कोई प्रशासनिक सहयोग नहीं  पर  इन्होंने  अपना राष्ट्रव्यापी अभियान  बिटोली’  शुरू कर दिया  और आज उसी को व्यापक जनसमर्थन  मिलता हम देख सकते हैं।  आत्मकथा के बीच- बीच में  लेखक के सुकोमल संवेदनाओं के भी चित्र हमें दिखते हैं  जैसे अगस्त के रविवार को आने वाले फोन को लेकर कुमारेंद्र की प्रतीक्षा आज भी निरंतर जारी है।   कोई कितना बड़ा भी लेखक  हो जाए लेकिन पहली बार उसके लेखन धर्म को स्वीकृति मिलना और साथ ही  उसका सम्मान होना उसे कभी नहीं भूलता।   

कुमारेंद्र के जीवन में  दो ऐसी घटनाएं हैं जो कि उनके  मजबूत इच्छाशक्ति से परिचित कराती है ।  पहला उनके  पिताजी का देहांत और दूसरा कुमारेंद्र की ट्रेन के साथ दुर्घटना ।   पिता के आदर्शों को मन में बसाए  और उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का संकल्प लेकर  कुमारेंद्र आज भी निरंतर कार्यरत हैं।   वह कहते हैं कि जब आज भी वह आंखें बंद करते हैं तो अपने आसपास अपने पिता का होना पाते हैं, दुविधा के समय वह अपने पिताजी को याद करते हैं सोचते हैं कि पिताजी  होते तो ऐसा करते, किंतु  अब बस यादें है,  कुछ गुदगुदाती, कुछ हँसातीं  तो कुछ  आंखें नम कर देती हैं ।   दूसरी घटना दुर्घटना से जुड़ी हुई है।   ऑपरेशन थिएटर में कटे पैर को लगाने की बात सुनकर  कुमारेंद्र अंदर तक हिल  जाते हैं लेकिन ऐसे वक्त पर उनका मित्र रवि चट्टान  बन कर उनके साथ खड़ा रहता है।  कुमारेन्द्र अपने मित्र के लिए विह्वल हैं वह कहते हैं, काश  ऐसी दोस्ती हर जन्म मिले और सभी को मिले।  दुर्घटना के बारे में बताते हुए कुमारेंद्र कहते हैं  कि चंद पलों की अपनी विषम स्थिति में ऊपर से गुजरती ट्रेन की गति से भी तेज गति से न जाने क्या-क्या सोच लिया।    सही बात है एक एथलीट्स जो कभी मैदान पर दस हजार  मीटर की दूरी को हंसते-हंसते नाप लेता था आज एलिम्को में दो स्टील छड़ों  के सहारे चलने का अभ्यास कर रहा है ।    लेकिन यहीं पर  कुमारेंद्र पूरी जिजीविषा और मजबूत इरादे के साथ  सामने आते हैं और वह फिर जिंदगी को दुबारा और बेहतर ढंग से जीने के लिए तैयार खड़े होते हैं।   

आत्मकथा में लेखन की चर्चा काफी रोचकता लिए हुए है ।   दस  वर्ष की उम्र से  कविता लेखन और उसके  प्रकाशन के साथ-साथ कुमारेंद्र के अंदर का लेखक समय के साथ  युवा होता चला गया, परिपक्व होता चला गया।   कुमारेंद्र भारी-भरकम रीतिकालीन  शब्दावली से दूरी बनाकर आम बोलचाल की भाषा में कहानी कविता ग़ज़ल लिखने लगे।   वह लिखते हैं कि छपास के चलते ही  ब्लॉगर बन गये।    आज ब्लॉगजगत ‘रायटोक्रेट कुमारेन्द्र’  किसी परिचय का मोहताज नही है।    लगभग सभी विधाओं में स्वाभाविक अधिकारपूर्ण लेखन करते हुए विभिन्न विषयों पर लगभग लेखक की  दो दर्जन  पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी ।  कुमारेंद्र  फोटोग्राफी, पेंटिंग, स्केचिंग  का भी शौक रखते हैं।    इन्होंने सोशल मीडिया में व्यंग्य की अत्यंत लोकप्रिय लघुकथन  को भी विकसित किया है जिसे आप ‘छीछालेदर रस’  के नाम से जानते हैं।   

 कुमारेंद्र का जीवन संघर्ष का पर्याय  रहा है ।   परिवार को साथ लेकर (यहां परिवार का तात्पर्य पति पत्नी से नहीं बल्कि पिता के बाद संपूर्ण पारिवारिक सदस्य ) पारिवारिक सदस्यों को सहारा देना, पढ़ाना, आगे बढ़ाना, खुद दो-दो विषयों में पीएचडी करना, अपने आप में संघर्ष की पराकाष्ठा  को परिलक्षित करता है।    इन सबके बावजूद कुमारेंद्र  ने  गंभीर मुद्रा को कभी वरीयता नहीं दी बल्कि जिंदगी को मौज मस्ती के अंदाज में जीते रहे।    अपनी आत्मकथा में कुमारेंद्र एक बात का खास तौर पर उल्लेख करते हैं जब  वह सीएसडीएस से जुड़े तो  इसकी कार्यप्रणाली के दोहरे मापदंड के बारे में  कुमारेंद्र ने जब  कर्ता-धर्ताओं  से चर्चा की परिणामस्वरूप उन्होंने  संस्था से कुमारेंद्र को टर्मिनेट कर दिया।   पूरा प्रकरण यह बताता है कि चैरिटी, अध्ययन के नाम पर किस तरह के नरेटिव सेट किये जाने का काम होता है और मनी मोब्लाइजेशन का काम तो साइड में चलता ही रहता है ।  इन सब के बावजूद कुमारेंद्र की जिंदादिली में कोई अंतर नहीं आया।    अपने कथा का आखरी पन्ना वह अपने यारों को समर्पित करते हैं और कहते हैं, ‘यात्रा में अच्छे बुरे कड़वे मीठे अनुभवों का स्वाद चखने को मिला ।   सपनों का बनना बिगड़ना रहा।    वास्तविकता और कल्पना की सत्यता का आभास होता रहा।    कई बार जीवन सरल और जाना पहचाना लगा तो कई बार अबूझ पहेली की तरह सामने आकर खड़ा हो गया लेकिन अंधेरों के सामने दिखने पर उसको अपने भीतर समेट सब कुछ रोशनी में बदल देने की शक्ति भी प्रस्फुटित होने  लगती।    ऐसा क्यों होता? किसके कारण होता? ना जाने कितने सवालों के दोराहे  तिराहे चौराहे से गुजरते हुए यदि कोई जीवन शक्ति सदा साथ रहे तो वह हमारे दोस्तों की शक्ति।‘    पुराने दोस्तों की दोस्ती और नए मित्रों का संग,  सभी  नए पुराने रंगों को मिलाकर जीवन एक खूबसूरत कोलाज बनाने की कोशिश की गयी है।   ईश्वर करे   इस कोलाज के रंग हर दिन गहरे होते जायें।    हम उम्मीद करेंगे कि कुमारेंद्र अपनी आगामी संस्मरण या आत्मकथ्य पुस्तक में उन तमाम रंगों का उद्घाटन करेंगे जो अभी श्वेत प्रकाश में सप्तरंग जैसे छुपे हैं ।   

शुभकामनाओं के साथ
डॉ पवन विजय



मंगलवार, 30 जून 2020

पारले जी : एक विरासत




मैं चाहता हूँ कि 
'पारले जी' कभी न बदले
वही पैकेजिंग
वही स्वाद
वही दाम
(सरकार सब्सिडी दे इसके लिए)
न उसके खाने में हो
कोई इनोवेशन

चाय में डुबा डुबा,
या चाय का हलवा बना
या पानी के साथ
यात्रा में, पिकनिक पर,
नाश्ते में, शाम को कविता सुनते
या स्टडी टेबल पर 
ठीक वैसे जैसे हम बचपन में इसे खाते थे
सायकल चलाते हुए,
रेस लगाते हुए,
स्कूल पीरियड में अध्यापक की नज़र बचाकर
बिस्कुट खाने के रिस्क का आनंद 
नही बदलना चाहिए

दफ़्तर से घर लौटे पिता को  
चाय के साथ दो बिस्कुट देती माँ
सुकून भी परोसती है
बिना दांतों वाली दादी बताती है
बिस्कुट पिया कैसे जाता है

हॉस्टल हो या परिवार
बिना 'पारले जी' के 
सम्पूर्ण कहाँ होता है

'पारले जी' कोई उत्पाद नही
यह एक संस्कृति है
थाती है विरासत है

बचपन की अल्हड़ता 
कैशोर्य के उत्सव 
कॉलेज की टी पार्टीज 
उसी संस्कृति के ही स्वरूप हैं

मैं चाहता हूँ कि
यह थाती अनवरत बनी रहे
इस संस्कृति का, विरासत का 
हस्तांतरण हो
पीढ़ी दर पीढ़ी
बिना किसी बदलाव के
क्योंकि,
कुछ चीजे कभी नही बदलनी चाहिए
जैसे धरती, हवा, पानी, और
'पारले जी'

...डॉ. पवन विजय

शुक्रवार, 15 मई 2020

दुःखों की वसीयत

दुःखों की वसीयत

जब बंट रहे थे 
खेत खलिहान दुआर मोहार
गोरु बछेरु बरतन भांड़े 
ताल तलैया बाग बगीचे

जब बंट रहे थे
हाथी घोड़े जर जमीन
लाल मोहर गिन्नी  अशर्फी रुपिया 
यहां तक कि जब हुआ
ठाकुर जी का बंटवारा
कितने दिन किसके यहां रहेंगे
जब इस बात को भी तय किया गया कि
बाबा की बुढ़ौती किसके यहां 
कितने महीने में कटेगी
तब भी मैं चुप बैठा था

आखिर सभी अपने अपने हिस्से लेकर
रखने संभालने का जतन करने लगे
डंड़वारें डाली जाने लगीं
खूंटे गाड़े जाने लगे
बरतनों की गिनाई शुरू हो गयी
तब भी घुटनों पर कुहनियां टिकाए
मैं चुप था

सामान अंदर हो गए
बालकों को भी बता दिया गया
अपना पराया क्या है
दरवाजों के अंदर से सिटकनी दे दी गयी
जोड़ घटाव का दौर जारी था 
लिस्ट मिलाई जा रही थी

लाई खाते रस पीते बही देखते  
अंत में एक पंच ने आवाज लगाई
शायद मेरी बारी आई है
पर अब बचा क्या है
सब तो बंट गया है
पंच मुझसे मुखातिब होकर बोला
तुम्हारे तुम्हे वसीयत में दुःख मिला है

जब एक चम्मच के लिए किए जाएंगे 
लज्जित माँ बाप
एक सूत जमीन के लिए तारे जाएंगे
पुरखे देवता थान पवान
जरा सी बात पर तार तार होंगी
परंपराएं मूल्य प्रतिमान 
तो उनसे उत्पन्न दुःखों के आकाश की वसीयत
तुम्हारे नाम की गयी है

तुम्हे  दिया गया है पूर्वजों की
आशाओं अभिलाषाओं का कोष

वे दुःख जिन पर गीत बने
वे दुःख जिन्हें पीढ़ी वहन करती आई है
वे दुःख जिन्हें देवता भी धारण न कर सके
उन दुःखो की थाती तुम्हे मिली है

यह कह पंच उठ गया 

मैं दुःखों के वसीयत की पोटली खोलने लगा

...पवन विजय

बुधवार, 13 मई 2020

हर कोई अपने घर लौटना चाहता है


जब जीवन की थकन
उदासियों के बोझ 
तोड़ने लगते हैं कंधे 
तो लगता है लौट जाएं अपने घर
जहां जीवन से भरी गेहूँ की बालियाँ
अब भी चैता गाती होंगी
नेह छोह के रंग अभी भी छपे होंगे
फागुन की दीवार पर
असाढ़ के भीगे दिन
सावन को गीत गाने आमंत्रित करते होंगे
भादों झरता होगा दालान की ओरी से
अब भी राह टेरती माँ
उसे देखते ही दूध भात लेकर आएगी
बाबा की आश्वस्ति भरी आंखें
मानस के स्वर
लालटेम की टिमटिमाती लौ
निरबंसियों के मटियारे गीत
सभी तो यथावत होंगे
बड़े घर का ऊंचा दरवाजा
वहीं कहीं देहरी पर दिया अब भी जल रहा होगा
जिसे बाल कर छोड़ आये थे
फलों से लदे बाग
जल से लहलहाता ताल
पनघट की रौनक
पकी फसलों वाले खेत
अन्न से भरे बखार
सब के सब समय की छीजन से अछूते होंगे

गांव कभी नही भूलता अपने बच्चों को
चौपालों में हर रोज उन्हें याद किया जाता है
जो एक एक कर चले गए होंगे
अभी भी उनके नाम के गीत गाये जाते हैं 

कोलतार की तपती सड़कों पर जलते तलुओं को
कच्चे मेड़ों की ठंडक चाहिए
बस सबको अपना गांव वाला घर चाहिए

हर कोई लौट जाना चाहता है अपने घर को

जैसे घोंसले में लौटती है बया
जैसे सांझ को लौटती हैं गायें
जैसे बाजार से लौटते हैं पिता
जैसे मायके में आती हैं बेटियां
जैसे अयोध्या लौट आये थे राम चौदह बरस बनवास से
जैसे लौट आता है पंछी फिर से जहाज पर आकाश से

पर सनद रहे
लौटना तो बादल बनकर
खेत बनकर
ताल बनकर
फूल बनकर बाग बनकर
गेंहू और धान बनकर
गीत बनकर थाप बनकर
स्नेह और विश्वास बनकर

अगर ऐसे नही  लौट पाए तो
लौटना चले जाने से भी बदतर होगा


गुरुवार, 7 मई 2020

अपना मिलना तय है


शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।

सुनना सांध्य गगन तारे से,
सुनना मौसम हरकारे से।
द्वार तुम्हारे जोगी आया,
सुनना उसके इकतारे से।

अहो कामिनी! मिलन यामिनी,
लेकर आता हुआ समय है।।
शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।

हर पल तुमसे संवादित हूँ,
तुम्हे सोचकर आह्लादित हूँ।
अर्थ दिए जो मृदुल नेह के,
उसी भाव में अनुवादित हूँ।

अधरों के प्रेमिल सत्रों से,
जीवन का हर कण मधुमय है।।
शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।

तनिक नही तुम होना चिंतित
किंचित मैं हूँ जरा विलम्बित
फूल नही वे मुरझा सकते
जिसे किया है हमने सिंचित

अरुणारे नयनों को एक दिन,
मद से भर जाना निश्चय है।।
शिलालेख पर यह अक्षय है,
मधुरे! अपना मिलना तय है।।

डॉ. पवन विजय 

(चित्र: गूगल साभार)