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शनिवार, 30 अप्रैल 2016

सहरिया से आई जाओ बलमू

नून जईसे गले है उमरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।

ओही सहरिया में उज्जर अन्हरिया
ओही सहरिया में उज्जर अन्हरिया,

अंगना में उतरी अंजोरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।

ओही सहरिया में लाला के नोकरिया
ओही सहरिया में लाला के नोकरिया,  

ऊसर कईले खेत कियरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।

ओही सहरिया में बईठी है सवतिया
ओही सहरिया में बईठी है सवतिया,

कहाँ गईले चंदा के चकोरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।

नून जईसे गले है उमरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू।






बुधवार, 24 जून 2015

लागि झूमि झूमि बरसे बदरिया




मानसून 2015  की पहली बारिश ....रात भर बूंदे झरती रहीं ...पानी का झर्रा बालकनी से कमरे में जानबूझ कर आ रहा था ...सावन की आहट ... एक कजरी का लिखना तो तय था ..ये अलग धुन में तैयार किया है ...आनंद लीजियेगा ...
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लागि झूमि झूमि बरसे बदरिया,
आए ना संवरिया ना।
कारी कारी घटा छाई
चारउ ओर अन्हराई
चारउ ओर अन्हराई-२
रतिया लागे अइसे जइसे मोर सवतिया,
कइसे बोली बतिया ना।
दईव जोर जोर गरजा
कांपे लागे हो करेजा
कांपे लागे हो करेजा-२
परलय आज होई गिरेला बिजुरिया,
हीलेला बखरिया ना।
जमुना बाढ़े भरिके पानी
राम कईसे हम जुड़ानी
राम कईसे हम जुड़ानी-२
सुग्गा बोले जाने कऊन से नगरिया,
मिले ना खबरिया ना।
...डॉ पवन विजय

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

मोरी जमुना जुड़इहें ना।

आज  डी एन डी पुल से  यमुना का जो मनोहारी रूप देखा रहा नही गया।  बाइक खड़ी  कर नीचे कछार में  कूद गया।  ठंडी जमुन जलधार को हथेली में लिया माथे लगाया। हल्की हल्की फुआर पड़ रही थी। कछार से निकल कर जब कॉलेज के लिए चला तो कुछ पंक्तियाँ अपने आप फूटने लगी जो आपके सामने हैं। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

मद्धिम मद्धिम जल बरसइहो 
मोरी जमुना अघइहें ना।  

कदम के नीचे श्याम खड़े हैं 
मुरली अधर लगाये  

बंसिया बाज रही बृंदाबन
मधुबन सुध बिसराये 

हौले हौले पवन चलइहो 
मोरी जमुना लहरिहें  ना।  

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

रस बरसइहो बरसाने में 
भीजें राधा रानी 

गोपी ग्वाल धेनु बन भीजें 
भीजें नन्द की रानी 

झिर झिर झिर झिर बुन्द गिरइहौ 
मोरी जमुना नहइहें ना। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 



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रविवार, 3 अगस्त 2014

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया (kajali)

पिछली लिखी कजली पर मिले प्यार से अभिभूत हूँ। उसे  कविता कोष के लोकगीत में शामिल किया गया है। मुझसे कई मित्रों ने एक और कजली लिखने की फ़रमाईश की थी जिसे आज मैं पूरी कर रहा हूँ।  प्रस्तुत कजली की धुन
पूर्व से अलग है। आनंद लीजियेगा।
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सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

घर में बाटी हम अकेली,
कउनो संगी ना सहेली
पापी पपिहा बोले बीचोबीच अटरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

चारो ओर बदरिया छाई
हरियर आँगन मोर झुराई
सजना पठये नाही कउनो  खबरिया 
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

छानी छप्पर सब चूवेला
देहिया भींज भींज फूलेला
अगिया लागे तोहरी जुलुमी नोकरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।


मंगलवार, 15 जुलाई 2014

एक कजरी गीत (Kajari)

एक कजरी गीत अभी लिखे है । हमारे गांव में इस समय महिलाये झूले पर बैठ कजरी गा रही होंगी। पेंग मारे जा रहे होंगे। हलकी बारिश में भीगे ज्वान नागपंचमी की तैयारी में अखाड़े में आ जुटे होंगे और मैं यहाँ ७०० किलोमीटर दूर कम्प्यूटर तोड़ रहा हूँ। खैर आप लोग लोकभाषा में लिखे इस गीत और भाव को देखिये। 
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हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

अलता टिकुली हम लगइबे 
मंगिया सेनुर से सजइबे, 

हमरे उँगरी में मुनरी पहिनावा पिया

नेहिया देखावा पिया ना
हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

हँसुली देओ तुम गढ़ाई
चाहे केतनौ हो महंगाई,

चलिके  सोनरा से कंगन देवावा पिया
हमका सजावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

बाला सोने के बनवइबे  

पायल चांदी के गढ़इबे,

माथबेनी औ' बेसर बनवावा पिया
झुमकिउ पहिनावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

गऊरी शंकर धाम जइबे
अम्बा मईया के जुड़इबे ,

इही सोम्मार रोट के चढावा पिया
धरम तू निभावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना।