बुधवार, 21 नवंबर 2018

तुम्हे छोड़ कर जाऊं कैसे ?

तुम्हे छोड़ कर जाऊं कैसे ?
बंधन यदि यम का यह होता तो भी उसे तोड़ मैं देता,
अनुबंधन वचनों के होते पल भर नही निर्वहन करता ।
किन्तु नेह के कच्चे धागे
उसे तोड़ कर जाऊं कैसे,
मेरे एकमात्र अधिकारी, तुम्हे छोड़ कर जाऊं कैसे?
मन पत्थर है पर विह्वल है एक तुम्हारी सुधियों से,
सिद्ध और समृद्ध तुम्ही से क्या करना अब निधियों से।
मेरे पथ के हर सिंगार 
मैं राह मोड़ कर जाऊं कैसे, 
मेरे एक मात्र अधिकारी, तुम्हे छोड़ कर जाऊं कैसे ?

बुधवार, 14 नवंबर 2018

तुम्हारे शक्ल जैसी एक लड़की रोज मिलती है

तुम्हारी ज़ुल्फ़ से गिरती मेरे कंधे भिगोती है,
बिना बादल बिना मौसम के ये बरसात कैसी है।

सियाही ख़त्म होती है मगर पन्ने नही भरते,
तुम्हे पाकर तुम्हे खोना कहानी बस ज़रा सी है।

उधर होंटों पे पाबन्दी इधर अल्फाज़ रूठे से ,
हमारे बीच खामोशी की इक दीवार उठती है ।

बना कर बाँध क्या करते नही इक बूँद पानी की,
कभी कोई नदी थी अब जहां पर रेत रहती है।

मुहब्बत फिर से हो जाए खता मेरी नही होगी,
तुम्हारे शक्ल जैसी एक लड़की रोज मिलती है।