शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

जब से बिजुली गयी गांव से सतयुग लौटा है

जब से बिजुली ली गयी गांव से 
समाजवाद लौटा है 
+++++++
टेपरिकाट के आगे.… 
मंगरू मिसिर करीवा चस्मा 
लाल रुमाल जैक्सनवा झटका 
(अब)
मुरई मरचा लगावत है 
मनै मन फगुवा गावत है 
+++++++
टीवी के आगे …
छोटकी काकी पिच्चर देखें
बिसरती से इसनो पौडर लेंवें
(अब)
जोन्हरी के चिरई उड़ावत है
मनै मन कका के गरियावत है
++++++++
किरकेट के आगे.…
जवनके तब पगलाय रहे
मैचवै में अंखिया गड़ाय रहे
(अब)
बाजा में कृषि जगत आवत है
गया भाय लोकगीत गावत है
+++++++++
चूल्हा बरा दुआरे पे
लकड़ी आवे पछवारे से
सुक्खू सोभा जोखू झूरी
घुरहू झुम्मू गाढ़ा सुग्गी
ऊदल पंडा छंगू बोलै
जउ जाई बिजुरिया ठेंगे से
टूट खंभवा ठेंगे से
सरकारी तार सरकारी खाद
लापटपवा टबलेटवा ठेंगे से
सरकारी पईसवा(पिनसिन औ भत्ता) ठेंगे से
++++++++++
बोल बहादुर जै चउरा मईया
जै जै भंईसी जै जै गईया
आपन गाऊं गिराऊ के जै हो
खेत अऊर खरिहान के जै हो
जोगीबीर से बडका गाटा
पीपल पोखर पनघट तलिया
मेंड़ मड़ईया कोलिया ठीहा
दीया बाती लिट्टी चोखा
रस माठा औ' लपसी ठोकवा
कजरी फगुआ चइता बिरहा
पायल छागल पियरी कजरा
आल्हा कीर्तन बन्नी बन्ना
चिल्होर पाती ओक्का बोक्का
मूसर ओखरी चक्की जांता
+++++++++++
नखलऊ डिल्लिया मुर्दाबाद
आपन जांगर जिंदाबाद
डीजल फीजल गै भट्ठा मा
तारा इनारा जिंदाबाद
लोनिया टेक्टर भाड़ में झोंको
हीरा मोती जिंदाबाद
++++++++++++
जै बोल महाबीर बाबा
जै बोल महाबीर बाबा
+++++++++++
जब से बिजुली गयी गांव से
समाजवाद लौटा है

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

"इस्सर बईठ दलिद्दर भागे "

आज के दिन का हमें बहुत इन्तजार रहता था।  जब भी ऊख के खेतों की ओर जाते तो  रसीले गन्ने देख कर उसे तोड़ने की  इच्छा करती किन्तु बाबूजी की हिदायत कि एकादशी से पहले उख तोडना पाप है, याद कर मन मसोस कर रह जाते।  आज के दिन गन्ने को सजाया जाता था और उनके बीच वैदिक रीति से विवाह कराया जाता।  फिर कुछ गन्नो को घर लाकर  उसके रस से ग्राम देवी "चउरा माई" का भोग लगाया जाता था। तत्पश्चात पटीदारों भाई  भैवादों  के साथ  गन्ने का आनंद लिया जाता था।

एकादशी से एक दिन पूर्व सूप की खरीददारी की  जाती थी।  सुबह चार बजे गांव की सारी महिलाये गन्ने से सूप पीटते हुए "इस्सर बईठ दलिद्दर भागे " कहती हुयी घर से खेत तक जाती थी।  हम बच्चो के बीच एक और मिथ (आप इसे बच्चो का सत्य भी कह सकते है ) था कि जिस बच्चे के मुह में दाने या कुछ और हो गया है अगर वो गांव की सबसे बुढ़िया का सूप छीन कर भागे तो बुढ़िया जितनी गाली देगी चेहरे की सुंदरता उतनी ही बढ़ेगी।  यह काम एक बार हमारे भाई नागा ने किया था।  सुबह बात पता चल गयी तो (बच्चे तब झूठ नही बोला करते ) उनकी इतनी पिटाई हुयी कि बेचारे काले से लाल हो गये।  

आज जबकि ग्रेटर नॉएडा में ये बात मैं अपनी बेटी को बता रहा हु अजीब सी टीस मन में उठ रही है।  मन कर रहा है लपक कर गांव जाउ और सुक्खू कका के साथ ढेर सारी ऊखें काट कर लाऊ और चउरा माई को रस पिलाकर सारे गांव के साथ रस में सराबोर हो जाउ। 

मंगलवार, 25 जून 2013

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

अभी दो सूचनाये मिली 
१. 
"अभी पिछले दिनों जब मैंने फेसबुक पर एक अपडेट किया तो अनुमान नहीं था कि उसका एक खौफनाक  परिणाम सामने आ जाएगा .अविनाश वाचस्पति जी को लगा कि वह अपडेट मैंने उन पर किया है और उन्होंने अपने ब्लाग्स को हमेशा के लिए ब्लाक कर दिया और मात्र फेसबुक पर बने रहने की घोषणा कर डाली। "... डॉ अरविन्द मिश्र
२. 
"संतोष त्रिवेदी की टिप्पणी थी- फेसबुक की लत छूट चुकी है,ट्विटर पर यदा-कदा भ्रमण कर लेते हैं पर ब्लॉगिंग पर नशा तारी है ! जब तक खुमारी नहीं मिटती,लिखना और घोखना जारी रहेगा !
आज की स्थिति में ब्लॉग के प्रति आपका लगाव बरकरार है। और आपने लिखा भी -अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे हुए हैं मरघट में किसी का इंतजार करेंगे कयामत तक। संतोष त्रिवेदी उदीयमान ब्लॉगर से ब्लॉगिंग में अस्त से हो चुके हैं। फ़ेसबुक की लत दुबारा लगा गयी है।" ...अनूप शुक्ल  

अगर अविनाश  जी ने अगर अपने ब्लाग्स बंद कर दिए तो वाकई उन पर ठगी और बेईमानी का आरोप बनता है… क्योकि ब्लागिंग को  प्रोत्साहित करने के नाम पर जो कार्यक्रम किये गए जिन लोगो का सम्मान वगैरह किया गया था फर्जी निकला। जब खुदै का ब्लॉग ब्लाक कर दिहे तो दुसरे को ब्लॉग चलाने और प्रोत्साहित करने का अधिकार आपके पास नही। और रवीन्द्र प्रभात को चाहिये कि  संतोष जी से भी 'उदयीमान ब्लॉगर' का पुरस्कार छीन ले। अविनाश जी के इस कृत्य से लखनऊ वाले कार्यक्रम की पोल भी खुल गयी। जिनका ब्लागिंग के प्रति टुच्चा दृष्टिकोण था उन्ही को चुन चुन कर पुरस्कार सम्मान दिए गए(एकाध अपवाद को छोड़ दे).

ब्लागिंग  बड़े बड़े स्वनामधन्य  फौलादी, इस्पाती, पराक्रमी, सूरमा कितने छुई मुई और भीरु निकले। कहा हम जैसे झंडू आदमी  समझते रहे कि ये महामानव ब्लागिंग को नई दिशा देंगे मगर ये तो सद्दाम हुसैन निकले। बहरहाल मैंने पहले ही कहा था कि  कुलीन/ मठाधीश और स्वयम्भू/ब्रम्हा बनने के चक्कर मे त्रिशंकु की ही गति मिलती है। किसी के जाने से धरती घूमना बंद नही करती। ऐसे त्रिशंकुओ को कर्मनाशा मिले। 

.....काठमांडू जाने वालो सावधान हो जाओ!!!



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शुक्रवार, 3 मई 2013

ब्लागिंग के धन्धेबाज बनाम ट्रैवल एजेंट: एक विश्लेषण

आपने कभी ट्रैवल कम्पनियो का नाम सुना है? ये कम्पनिया एक निश्चित पैकेज पर आपको घूमने फिरने, होटलिंग, मौज करने का साधन मुहैया कराती है. विश्व मे कही घूमना हो इनसे सम्पर्क कीजिये और घूमिये. आजकल इन कम्पनियो से प्रेरणा प्राप्त कर साहित्य, समाजसेवी, ब्लागिंग के धन्धेबाज   लोग पैकेज बना कर 'एकेडेमिक' 'साहित्यिक' या 'सामाजिक' सरोकारो की आड लेकर पौ बारह कर रहे है. आपसे अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के नाम पर मोटी रकम वसूली जायेगी और फिर ट्रैवल एजेंटो से साठ गांठ कर के सस्ते मद्दे  मे घुम्मी करा दी जायेगी, ल्यो आप अंतर्राष्ट्रीय ठप्पा लगवा लिये.
आप भी महान होने का गुरु गम्भीर चेहरा लिये वापस आते है. फिर अपने उस 'प्रवास' का हवाला बात बात मे देने लगेंगे.वास्तव मे है क्या कि पेड कार्यक्रम और पुरस्कारो से नये लेखक या 'ईनाम' के लिये मुह बाये लोगो को लगने लगता है कि वे ही पूर्वजनम मे शेक्सपियर और कालीदास रहे होंगे. इसी चक्कर मे अपने को लुटवा कर सम्मानित लेखक का तमगा जडवा लेते है और उसे सीने से चिपकाये अईसे घूमते है जईसे कोई पगलेट कूडे  को लेके खुद से चिपकाये घूमता है और रद्दी को 'एसेट' समझता है.
लोभ लालच के चक्कर मे लोगो ने अपना बहुत नुकसान किया है और धन्धेबाजो ने इस भावना को पहचान कर इसका खूब दोहन भी किया है.ताजा मिसाल ब्लागिंग मे चल रहे 'पेड कार्यक्रमो' की है. ब्लागिंग के नये खलीफा लोग अंतराष्ट्रीय ब्लागिंग के नाम पर जो झोल तैयार कर रहे है उससे लगता है कि मुर्गे काफी फंसेगे, खास बात यह है कि ये मुर्गे अपनी खुशी से अपने को हलाल करवायेगे. तुलसी बाबा बहुत पहिले ही लिख गये थे कि जिसको दूसरे का धन हरण करने की विद्या आती है वही इक्कीसवी सदी का गुनवंत ज्ञानी होगा. तो आज उस  'परिकल्पना'  को सत्य सिद्ध होता हुआ हम देख सकते है.
बहरहाल कुलीन/ मठाधीश और स्वयम्भू/ब्रम्हा बनने के चक्कर मे त्रिशंकु की ही गति मिलती है. लोकतंत्र अपना रास्ता ढूंढ लेता है...
भगवान इन धन्धेबाजो और दलालो से ब्लागिंग साहित्य  को बचाये ऐसी कामना करता हू.


गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

रामलाल ! काठमांडु चलबे का रे?

डिस्क्लैमर: अगर ये आप अपनी बात समझ रहे तो मात्र सन्योग के अलावा कुछ नही :):):)















रामलाल! काठमांडु चलबे का रे?
काहे सामलाल? 
अरे उहाँ  इज्जत दी जायेगी सम्मान होगा. 
नाही रे! हमका लपूझन्ना समझे हौ का? हम एतना पईसा खरच करके इज्जत नाही लेबे.
अरे धुत बुडबक अबकी पईसा ना देवे के पडी.
काहे रे अबकी पईसवा कहा से आवा? 
चोप्प! एक त ससुरे के इज्जत देई जात है दूसरे कोश्चन करत बा. 
अरे रमललऊ ! सूचना के अधिकार त हमै सरकार दिहे बा. 
तोहरे जईसे डपोरसंख  गदहा केत मुहे नाही लागै चाहे अरे सरऊ जरमनी कबहू गये हो... नाही ना कहि रहे है हम तोहार नाम के गदहा सम्मान के खातिर प्रस्तावित कई दिहे हई तब्बौ तू एतना भाव खाये रहे हो. जरमनीके फीलिंग चोपचाप काठमांडु मे लेई लो... जब परसाद बांटा जाय रहा है तो दुईनो हाथ बटोरो... एहि बहाने..जादा पचर पचर किहे से का फायदा. 
भईया सामलाल फुनि ई बतावा हमे काठमांडु जायके पईसवा के दे? बडी मोस्किल से इंटरनेट के पैक भराई पाते है उहौ मेहरारू से बचाय के. 
तू सारे दुई कौडी के मनई जब मेहरारू से चोप्पे पैक भरा लेते हो तो एकाध गहना बेचि नही सकते? खेत बेंच,बाग बेंच गहना गुरिया बेंच, कुच्छौ कर पर काठमांडु चल.. ई अनतरराष्ट्रीय परोगराम हवे.
ए समललऊ! अब तू चोप होई जा नाही त देब खाई भर के, भग सारे हिया से. हम घर द्वार बेंचि के काठमांडु जाई. हमार दिमाक खराब बा का रे?  सारे निपुछिया हमके अऊर काम धाम नाही बा का?  हमका  परभात समझे हये का रे! लंगोटिया पे फाग थोरहू खेलबे... तू सरऊ भागिन जा हिया से नाही दे डंडा बोकला निकोल देब...

बुधवार, 21 नवंबर 2012

ओ रे घटवारे, ओ रे मछवारे, ओ रे महुवारे.










ओ रे घटवारे
आना नही इस घाट रे
पानी नही बस रेत रे
बिचेगी नाव सेंत मे
सुना है फिर कही
बँधी है तेरी नदी.

ओ रे मछवारे

आना नही इस ताल रे
लगे है बडे जाल रे
घास पात उतरा रहे
तेरी बंसी मे नही
अब लगेगी सहरी.

ओ रे महुवारे

आना नही इस बाग रे
रस निचुड गये सारे
महुवे के फूल से
सुना है कही लगी
मदिरा की फैक्ट्री.



रविवार, 15 अप्रैल 2012

ऋषि कलाम ही अगले राष्ट्रपति हो. आप क्या सोचते है?

मै चाहता हू कि देश का राष्ट्रपति किसी राजनीतिक दल का पिछलग्गू ना हो ना ही किसी व्यक्ति विशेष का कृपापात्र. वह किसी नेता या नेती के यहा रसोईया या झाडू लगाने वाला ना हो. एक गरिमामयी शख्शियत का मालिक हो जिसकी वजह से देश का स्वाभिमान बढा हो. ऐसा कौन हो सकता है . सोचने वाली बात नही. ऋषि ए पी जे कलाम से बेहतर कौन हो सकता है
वायु पुराण में ॠषि शब्द के अनेक अर्थ बताए गए हैं-
"ॠषित्येव गतौ धातु: श्रुतौ सत्ये तपस्यथ्। 
एतत् संनियतस्तस्मिन् ब्रह्ममणा स ॠषि स्मृत:॥"      इस श्लोक के अनुसार 'ॠषि' धातु के चार अर्थ होते हैं- गति श्रुति सत्य तथा तपस्या. ये चारो गुण कलाम साहब मे है इसलिये मै चाहता हू कि देश का नेतृत्व वह पुन: सम्भाले आप क्या सोचते है?
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                                                                   कलाम को समर्पित
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आप मिसाइल मैन है या
एक मिसाल ,
जो हम जैसो के लिए बन गए है।
लेकिन,
आपकी सटीक परिभाषा दूंगा
एक मशाल के रूप में ।
आपने ता-उम्र जलकर
रोशनी दी है
सौ करोड़ से अधिक आत्माओं के लिए
आप बनगए है
अक्षय ऊर्जा स्रोत।
आपकी रहस्यमयी मुसकान
मुझे चुनौती देती है
और प्रेरित करती है
'दिया' बन जाने को
हताशा के अँधेरे में ,
और
भय की ठिठुरन में
'अग्नि' बन जाने को।

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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

क्या तुमने बसंत को आँचल से बाँध रखा है?













अधखिले  है गुलमोहर
और कोयल,
मौन प्रतीक्षारत है
फूटे नहीं
बौर आम के,
नए पत्तो के अंगारे
अभी भी
ओस से गीले है,
सांझ ने उड़ेल दिया  
सारा सिन्दूर
ढाक के फूलो में
पर, 
रक्तिम आभा ओझल है 
ओ सखी, 
क्या तुमने बसंत को 
आँचल से बाँध रखा है?

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

दियना करे उजास

















खेतों में बागो में दियना करे उजास,
मीठी सी लौ भर रही चारो ओर मिठास.

दसो दिशाओं में घुली भीनी-भीनी गंध,
कण-कण पुलकित हो उठे लूट रहे आनंद.

नयी फसल लेकर आयी घर में गुड औ धान,
लईया खील बताशों से अभिनंदित मेहमान.

गेरू गोबर माटी से लिपा पुता है गाँव,
घर से भगे दलिद्दर सर पे रखकर पाँव.

झांझ मजीरा ढोलक बाजे झूम रही चौपाल,
नाचे मन हो बावरा देकर ताल पे ताल.

फूटी मन में फुलझड़िया पूरण होगी आस,
परदेसी पिऊ आ गए गोरी  छुए  अकास.

दीवाली ने कर दिया ज्योतिर्मय संसार,
सबके आँगन में खिले सुख समृद्धि अपार.

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

"उम्मीदवार कैसा हो जिसे हम निश्चित वोट देगे" .

कल एक मीटिंग के दौरान यह बात सामने आई की मतदाता मतदान के समय उम्मीदवार को भूल हवा के रुख के साथ अपना मत देता है.यह हवा मंडल कमंडल वादी, जातिवादी व्याक्तिमूलक या सत्ता विरोधी लहर जैसे स्रोतों से चलती है. निष्कर्ष यह है कि मतदाता मात्र साधन या माध्यम होकर रह जाता है. इस सन्दर्भ  में मैंने एक प्रयोग करने का निश्चय किया है. कानपुर की एक विधानसभा गोविन्द नगर मेरा अध्ययन क्षेत्र है. एक प्रश्नावली बना रहा हूँ  जो "उम्मीदवार कैसा हो जिसे हम निश्चित वोट देगे" के शीर्षक से है. इस प्रक्रिया में आपके सुझावों की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि  मेरा मानना है कि सीखने के क्रम में अनुभव बड़ा  काम आता है..अतः प्रश्नावली के प्रश्न कैसे हो अवगत कराईयेगा. समय सीमा २४ सितम्बर है.




गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

नीम का पेड़

खट्ट-खट्ट चिर्र-चिर्र की आवाजे अंततः आने लगी. नीम के पेड़ पर चल रही आरी मेरे दिल को चीरती जा रही थी. मैंने कान बंद कर लिए और घर के अन्दर जाकर अपना सामान  बांधने लगा. माँ ने देखा तो पूछा
ये कहा की तैयारी हो रही है?
वापस कानपुर जा रहा हूँ माँ.
क्यों?
अब मै इन कसाइयो के साथ नही रह सकता.
कसाई किसे कह रहा है तू?
यहाँ जितने लोग है सब कसाई हैं.
छी: ऐसी बाते न करो बेटा, माँ डाटते हुए बोली, जिन हाथों में तू पला बढ़ा अब पढ़ लिख कर उन्ही को कसाई बोल  रहा है.
ये कसाई नही तो और फिर क्या हैं? देखो न नीम को कैसे बेदर्दी से कटवाया जा रहा है. माँ इस पेड़ की आवाज़ सुनो इसकी कराह  और पुकार सुनो.माँ याद है जब मै छोटा था और मुझे "माता" आ गयी थी तब इसी नीम की लौछार तुम मेरे ऊपर फिरा-फिरा  कर शीतला देवी से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करती थी. तब क्या तुमने सोचा था कि  इसे ऐसे काट दिया जाएगा.माँ कम से कम तुम तो स्वार्थी मत बनो.माँ कुछ कहती तभी  बड़े भाईसाहब वह से गुजरे बोले,
माँ इससे मत उलझ.यह बौरा गया है.
हां भईया मै वाकई बौरा गया हूँ इसलिए कि मै स्वार्थी नही हूँ.इसी पेड़ पर दादी ने जीवनपर्यंत जल चढ़ाया. इसी पेड़ के नीचे शालीग्राम रखे गए थे धर्म की प्राथमिक शिक्षा तो हमने यही से पायी थी.
"अरे पगले तभी तो हम लोग  यहाँ मंदिर बनवा रहे है. मंदिर के सामने "नंदी" बैठाने के लिए जगह नही थी इसीलिये इसे काटना पडा.यह तो पुण्य कार्य है.
हुंह मंदिर की परिभाषा जो आपकी है भईया वो मेरी नही है.दसियों साल से इसी पेड़ के नीचे शिवजी (शालीग्राम) विराजमान रहे और पेड़ उनपर छाया करता रहा तो तब क्या यहाँ मंदिर नही था. आज आप कंकर पाथर जोड़ कर इन महादेव को दीवार में बंद कर रहे हैं तो अब ये मंदिर हो जाएगा.
अरे भाई साहब इससे कहा बहस करके अपना दिमाग खराब कर रहे हैं. ये तो शुरू से ही.....मेरे दूसरे भाई बड़े भाई को खीच कर ले जाने लगे
मै आवेश में चिल्ला कर बोला ये देखो मेरे दांत कितने मजबूत है. तुम्हारे भी, बड़े भईया के,पूरे घर के, दादा अस्सी साल के है लेकिन उनके भी दांत सलामत है ये सब इसी नीम की दातुन की वजह से है.

हा हा हा अब तो कोलगेट का जमाना है बच्चू कोलगेट किया करो. तू इतना पढ़ा लिखा होकर गंवारों की बात करता है. पता नही क्या पढता है.
वे लोग चले गये.माँ भी अपने काम में लग गयी. मै अपना बैग लेकर  पिछवाड़े के दरवाजे से बाहर निकल गया.








आधी रात में पूरे  चाँद की
उतरी थी चांदनी.
तुम्हारे फूलों पर,
और उन फूलों से होकर
 मेरे दिल में उतर गयी थी.
तुम्हारे आगोश में रखे,
शिव को देख कर प्रकृति में,
सृजनकर्ता को पहचाना.
और तुम्हारी चंवर डुलाती,
लौछारों के कोमल स्पर्श से,
प्रेम की अनुभूति जाना. 
ओ साथी !
आज मैने घर छोड़ दिया
तुम्हारी आने वाली
फस्लों को बचाने की खातिर











मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

एक महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दे

एक महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दे


















ब्लॉग  और पत्र पत्रिकाए साहित्य की दो अलग अलग विधाए है किन्तु दोनों का उद्देश्य एक है जहा इलेक्ट्रानिक माध्यम (ब्लॉग) में पाठको की प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है वही प्रिंट माध्यम में प्रतिक्रियाये न के बराबर मिलती है लेकिन प्रिंटेड साहित्य पढने का गुनने का अपना एक अलग आनंद होता है. इसीलिये हम सोचते है की हमारे द्वारा लिखी गयी रचनाओं को किसी पत्र या पत्रिका में स्थान मिले. "मीडिया और आप" की लोकप्रियता का शायद यह एक प्रमुख कारण है. इस बात को मद्देनज़र रखते हुए राष्ट्रीय हिंदी मासिक "माटी" जिसका कि मै प्रबंध सम्पादक हूँ , समस्त ब्लागर्स की   श्रेष्ठ रचनाये   आमंत्रित करती है. आपकी रचनाये कृतिदेव अथवा यूनीकोड  में टंकित होनी चाहिए आप उसे मेरे ई मेल pkmkit@gmail.com  पर भेज सकते है.

रविवार, 3 अप्रैल 2011

इस नवरात्रि पर मातारानी को सबसे अच्छी भेंट:माँ के नाम पर गाली देना बंद करे


इस नवरात्र के पावन अवसर पर मै सभी से एक बात कहना चाहता हूँ कि माता को प्रसन्न करने के लिए व्रत रतजगे कन्याभोज पूजा पाठ इत्यादि सब  तब तक व्यर्थ है, केवल पाखण्ड मात्र है जब तक मन साफ़ नही है इस नवरात्र में यदि आप अगर माता रानी की पूजा करना चाहते है तो सबसे पहले एक काम करिए  कि   माँ  को गाली देना बंद करे . नारी को लक्षित समस्त प्रकार की गालियों का उन्मूलन के अलावा कोई भी माध्यम नही है जिससे आपकी आराधना सफल हो . इस बार आप सब गाली न देने का व्रत करे और इसे पूरे जीवन पर्यंत निभाये इससे अच्छी पूजा और भेंट माँ  नवरात्री में और हो ही  नहीं सकती  


मेरी प्रार्थना 

अपनी दुर्बलताओ से जीतू शक्ति देना जगदम्बे
दुनियावी जालो  से निकलू संबल देना माँ अम्बे

जयकारा रतजगा जागरण कभी नहीं कर पाऊंगा
मन ही मन  में एक बार बस एक बार तुम्हे बुलाऊंगा

मेरी मद्धिम  सी पुकार पर तुमको आना होगा
मै सोया रहता हूँ माते  मुझे जगाना होगा

भले बुरे का परिचय देना और अंधेरो में ज्योति
गहरी पीड़ा से मुक्ति नहीं सहने की देना शक्ति

अंधियारों में दीपक बन  जल जाने की इच्छा है
मानवता की सेवा में बलि जाने की इच्छा है

सदा रहे आशीष तुम्हारा छोटी सी ये अर्जी  माँ
मुझमे मेरा जो कुछ है वो तेरा ही  निमित्त  है माँ

                            मुझमे मेरा जो कुछ है वो तेरा ही  निमित्त  है माँ


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

एक आह्लादकारी क्षण

 उत्तर प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा मेरे लिखे गए कुलगीत का विमोचन हुआ साथ ही साथ संगीत बद्ध प्रस्तुति भी. यह क्षण मेरे लिए आह्लादकारी  था. जब मेरी एक ग़ज़ल कविताकोष में सप्ताह की रचना चुनी गयी थी तब भी मन में ऐसे ही कुछ भाव थे.


मैंने कविताये १३ वर्ष की उम्र से लिखना शुरू किया. मुझे याद है की मै अपने गेहू के खेत में लोट लोट कर नीला आसमान निहारता था और मन में एक एक अजीब किस्म की अनुभूति महसूस करता.
मेरा गाँव जहाँ मेरा बचपन बीता हरियाली से पटा हुआ है वही हरियाली मेरी रचनाओं में मुखर होती है.
 अब जबकि मै कंक्रीटों के जंगल में रहने लगा हूँ मुझे वही दिन हूक हूक कर याद आते है.और मुझमे कविता फूटने लगती है.मेरी पहली कविता बसंत ऋतु पर थी. इसके बाद मैंने जीवन की विषमताओ, देशकी स्थिति पर तमाम रचनाये की.
तरुणाई का असर मेरी लेखनी पर भी पडा जिनसे मेरे पाठक गण अच्छी तरह रूबरू है.  कविता या गजल  के अतिरिक्त मैंने गद्यसर्जन भी किया  है जो अभी तक एकाध जगह के अलावा कही मैंने पोस्ट नही किया है.  भविष्य में अवश्य करूंगा.
 बस  आप सब का स्नेह और प्यार ऐसे मिलता रहे ईश्वर से ऐसी कामना करता हूँ.


शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

क्या तुमने बसंत को आँचल से बाँध रखा है?










अधखिले  है गुलमोहर
और कोयल मौन प्रतीक्षारत है
फूटे नहीं बौर आम के
नए पत्तो के अंगारे
अभी भी ओस से गीले है
सांझ ने उड़ेल दिया  
सारा सिन्दूर ढाक के फूलो में
पर रक्तिम आभा ओझल है
ओ सखी,
क्या तुमने बसंत को
आँचल से बाँध रखा है?



रविवार, 23 जनवरी 2011

कागजो से शौच बनाम पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली का आयोजन run for saving environment

                                                                  
मैंने अपने नए ब्लॉग http://haridhari.blogspot.com/ जो पर्यावरण संक्षण के लिए समर्पित है पर इस पोस्ट को छपा था किन्तु तकनिकी कारणों से यह हमारीवानी पर दिखाई नहीं दे रही है अतः सुधी पाठको के लिए इसे यहाँ दे रहा हूँ.
 आजकल पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली निकालने का बड़ा चलन है. सवाल यह है कि इस दौड़ में भाग कौन लेता है? इसमें बड़े बड़े पूजीपति उद्योगपति अभिजात्य तबके के लोग जोर शोर से भाग लेते है. ये लोग खुद तो दौड़ कर क्या दिखाना चाहते है. हरी धरती के सबसे बड़े शत्रु यही लोग है. शौच के लिए पानी नहीं उत्तम कोटि के कागजो का प्रयोग करते है फिर पेड़ो को बचाने के लिए रैली का आयोजन करेगे.
दुनिया में मात्र ७ % अभिजात्य देशो से ५० % कार्बन का उत्सर्जन होता है. सच यह है कि सुविधाभोगी वर्ग प्रजातंत्र के सहारे सामान्यजन को अपराधबोध से ग्रस्त करता है. और इस शोर शराबे में मूल प्रश्न दबे रह जाते है.
पर्यावरणीय समस्या की गहन पड़ताल अंततः स्थापित तत्कालीन व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है. यह स्वाभाविक है कि ऐसा कोई भी प्रयास स्थापित शक्तिकेंद्रो(सरकारे) के हितो के अनुकूल नहीं हो सकता. ऐसी स्थिति में ये शक्तिकेंद्र या तो पड़ताल की दिशा मोड़ने का कार्य करते है या दमन का सहारा लेते है. वर्तमान पर्यावरणीय विमर्श में ये दोनों स्थितिया देखी जा सकती है.
हरी धरती शौच हेतु या जहा कपडे का या जल के प्रयोग प्रयोग से काम होता है वहा इस प्रकार के कागजो के प्रयोग न करने का आवाहन करती है. क्योकि इन कागजो को बनाने में जितना पानी खर्च होता है जितने पेड़ काटे जाते है उसका दसवा हिस्सा पानी भी इन कार्यों  में खर्च नहीं होता है.

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

ऋषि कलाम: मेरे हीरो

'कलाम' शब्द की ऊर्जता से  मै अपनी चेतना के प्रारंभिक दिनों से ऊर्जित होता आया हूँ. यह शब्द मुझे गीता के श्लोक  और कुरआन की आयतों की तरह पवित्र और आह्लादकारी लगता है. मै कलाम साहब  लिए 'ऋषि' शब्द का प्रयोग करता हूँ. मुझे मार्गदर्शन देते हुए मेरे हीरो अव्यक्त रूप में हमेशा मेरे पास रहते है. मै इन पर ज्यादा कुछ लिख नहीं पाऊंगा. लेखन से परे का शब्द है 'कलाम'. मै इस समय गुड खाने वाले गूंगे के सरीखा हूँ जो मिठास बता नहीं पायेगा.  लेखनी अपने आप डोली है जिसे नीचे पिरो दिया है.

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आप मिसाइल मैन है या
एक मिसाल ,
जो हम जैसो के लिए बन गए है।
लेकिन,
आपकी सटीक परिभाषा दूंगा
एक मशाल के रूप में ।
आपने ता-उम्र जलकर
रोशनी दी है
सौ करोड़ से अधिक आत्माओं के लिए
आप बनगए है
अक्षय ऊर्जा स्रोत।
आपकी रहस्यमयी मुसकान
मुझे चुनौती देती है
और प्रेरित करती है
'दिया' बन जाने को
हताशा के अँधेरे में ,
और
भय की ठिठुरन में
'अग्नि' बन जाने को।
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सोमवार, 29 नवंबर 2010

तुम्ही से रूठना तुमको मनाना अच्छा लगता है













अकेले में तुम्हारी याद आना
अच्छा लगता है,
तुम्ही से रूठना तुमको मनाना
अच्छा लगता है।

धुन्धलकी शाम जब मुंडेर से
पर्दा गिराती है,
सुहानी रात अपनी लट बिखेरे,
पास आती है,
तुम्हारा चाँद सा यूँ छत पे आना,
अच्छा लगता है।

फिजाओं में घुली रेशम नशीला
हो रहा मौसम,
ओढ़कर फूल का चादर सिमटती
जा रही शबनम,
हौले से तुम्हारा गुनगुनाना
अच्छा लगता है।

अकेली बाग़ में बुलबुल बिलखती है
सुलगती है,
रूमानी चांदनी मुझपर घटा बनकर
पिघलती है,
तुम्हारा पास आना मुसकराना
अच्छा लगता है

अकेले में तुम्हारी याद आना
अच्छा लगता है।

बुधवार, 9 जून 2010

प्री-टेक्निक युग की खुदाई


नीम का पेड़
छोटे -छोटे शालिग्राम
कुए का ठंडा पानी
और  पीपल की नरम छांह
सुबह का कलेवा
'अग्गा राजा दुग्गा दरोगा'
गन्ने का रस और दही
साथ में आलू की सलोनी
गेरू और चूने से
लिपे पुते   घर में
आँगन और तुलसी
दरवाजे की देहरी
ताख में रखा दिया
उजास का पहरिया
बाबा की झोपड़ी
और मानस की पोथी
लौकी की बेले
छप्पर पर आँखमिचौनी खेले
आमो का झूरना
महुए  का बीनना
अधपके गेहू की  बाली का चूसना
बगल के बांसों की
बजती बांसुरी
खेत खलिहान में काम करते
बैल हमारे परिवार के
और पास में चरते गोरू बछेरू  घर के
प्री-टेक्निक युग की खुदाई में
मिली ये सारी वस्तुए
जिनको मैंने खोया था
कई बरस पहले
कई बरस पहले...............

सोमवार, 7 जून 2010

मेरी धरती



                                  
                                
  तुम जलती हो ,
 जो धूप मै देता हूँ.
तुम भीगती हो,
जो पानी मै उडेलता हूँ.
तुम कांपती हो,
जो शीत मै फैलता हूँ.
सबकुछ समेटती हो,
जो मै बिखेरता हूँ.
तुम सहती हो
बिना किसी शिकायत के


मेरी धरती,
तुम रचती हो,
सृष्टि  गढ़ती हो
और मै तुम्हारा आकाश
तुम्हे बाहों में भरे हुए
चकित सा देखता  रहता हूँ
तुम हसती हो
निश्छल  हसती जाती हो
हवाए महक जाती है
रुका समय चल पड़ता है
और ज़िन्दगी नए पड़ाव
तय करती है.