रविवार, 2 अक्टूबर 2016

हिन्दी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता :हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य (रूस के सन्दर्भ में ) : ल्युदमीला ख़ख़लोवा


भारत और भारतीय भाषाओं के प्रति रूस में झुकाव पन्द्रहवीं शताब्दी में ही झलकने लगा था। जब रूसी विश्वयात्री अफ़नासी निकितिन ने भारत की यात्रा की थी। रूस के प्राचीन नगर त्वेर से वे 1468 में भारत के लिए रवाना हुए थे और काले सागर को पार कर अज़रबैजान और ईरान के रास्ते भारत पहुँचे थे। यह वह समय था, जब दुनिया अभी वास्को डिगामा को जानती भी नहीं थी, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि वास्को डिगामा ने ही भारत की खोज की थी। वास्को डिगामा तो अफ़ानासी निकितिन के 25 साल बाद भारत पहुँचे थे और उन्होंने यूरोपियन लोगों को भारत का रास्ता दिखाया था। अफ़नासी निकितिन  1468 से 1474 तक भारत में रहे थे। फिर भारत से वापिस रूस लौटते हुए रास्ते में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन भारत के बारे में उनकी डायरियाँ और संस्मरण सुरक्षित रह गए, जिन्हें आज हम रूस में'तीन समुद्रों के पार की यात्रा' के नाम से जानते हैं।
रूस में जो दूसरा स्रोत रूस-भारतीय सम्बन्धों का हमें मिलता है, वह हिन्दी या हिन्दुस्तानी भाषा से सीधे जुड़ा हुआ है। रूसी विद्वान गेरासिम लेबिदेव (1749-1817) बारह साल तक भारत में रहे थे। शुरू में कुछ वर्ष चेन्नै (मद्रास) में बिताने के बाद वे कोलकाता चले गए थे और लम्बे समय तक वहाँ रहे। मूल तौर पर गेरासिम लेबिदेव संगीतकार थे और उन्होंने यूरोपीय संगीत की परम्पराओं को भारतीय संगीत परम्पराओं से जोड़ने की कोशिश की थी। चूँकि संगीत और नाटक का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है, इसलिए उन्होंने भारत में, कोलकाता में एक थियेटर की भी स्थापना की थी। थियेटर के अलावा उन्होंने भारत की भाषाओं पर भी महत्त्वपूर्ण काम किया। वर्ष 1801 में लन्दन में उनकी एक क़िताब प्रकाशित हुई, जिसका शीर्षक था -- A grammar of the pure and mixed East Indian dialects... यानी शुद्ध और मिश्रित पूर्वी भारतीय भाषाओं का व्याकरण। अपनी इस क़िताब में गेरासिम लेबिदेव ने कोलकाता में बोली जाने वाली हिन्दुस्तानी भाषा के व्याकरण पर चर्चा की थी। यह वह भाषा थी,जो आम तौर पर कोलकाता के व्यापारी वर्ग के बीच इस्तेमाल की जाती थी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि सिर्फ़ कोलकाता के व्यापारी ही इस भाषा का इस्तेमाल करते थे। उनकी भाषा कई भाषाओं के शब्दों  की खिचड़ी भाषा थी, जिसमें मारवाड़ी, बांग्ला, अवधी भोजपुरी, मैथिली, फ़ारसी आदि भाषाओं के शब्दों की भरमार थी और जिनका व्याकरण भी इन्हीं सब भाषाओं के व्याकरण को मिलाकर तैयार हुआ था।
रूसी कवियों ने सबसे पहले जिस भारतीय कवि की रचनाओं का अनुवाद किया, वे कालिदास हैं। प्रसिद्ध रूसी कवि अलेक्सान्दर पूश्किन के पूर्ववर्ती कवि वसीली झुकोवस्की (1783-1852) ने सबसे पहले कालिदास की रचना 'नल और दमयन्ती' का रूसी भाषा में अनुवाद किया था। उनके बाद कालिदास की रचना  'शकुन्तला' का अनुवाद कंस्तान्तिन बालमन्त (1867-1942) ने किया। फिर उनके परवर्ती कवि ईगर सिविरयानिन (1887-1941) ने भी कालिदास के कई रचनाओं के अनुवाद किए। इस तरह हम देखते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में रूस में भारत के प्रति लगाव बढ़ता जा रहा था। रूसी लोग प्राचीन भारतीय संस्कृति, दर्शन, इतिहास और कला में गहरी रुचि ले रहे थे। इसीलिए रूसी भाषा में सबसे पहले कालिदास की रचनाओं के अनुवाद सामने आए। 19वीं सदी के अन्त में रूसी लेखकों अ० विगोरनित्स्की (1897), अ० फ़० गिल्फ़ेर्दिंग (1899) और इ० प० यागेल्लो (1902) ने 'हिन्दुस्तानी' भाषा के बारे में पहली पुस्तकें लिखीं। आरम्भ में ये व्यावहारिक पाठ्य-पुस्तकें थीं और इनमें भाषा के साधारण नियम ही दिए गए थे। लेकिन आज इन लेखकों और इन पुस्तकों को रूस में कोई याद भी नहीं करता।
रूस में 1917 की क्रान्ति के बाद आधुनिक भारतीय भाषाओं का गम्भीरता से अध्ययन शुरू हुआ। उससे पहले अट्ठारहवीं सदी  के आख़िर मे भारतीय भाषाओं के अध्ययन का प्रयास तो किया गया था, लेकिन व्यवस्थित रूप से उनके अध्ययन-अध्यापन की कोई व्यवस्था नहीं थी। रूस में सबसे पहले उर्दू का अध्ययन शुरू किया गया। अलेक्सेय बरान्निकफ़ (1890-1952) ने लेनिनग्राद (सेण्ट पीटर्सबर्ग) विश्वविद्यालय में हिन्दी या हिन्दुस्तानी  का अध्यापन शुरू किया। उन्हें रूस में भारतीय भाषाओं के अध्ययन और अध्यापन की परम्परा का संस्थापक कहा जा सकता है। 1934 मे' उन्होंने 'हिन्दुस्तानी' (हिन्दी व उर्दू) के व्याकरण की पहली पाठ्य-पुस्तक तैयार की। उन्होंने ही सबसे पहले रूस में हिन्दी-रूसी  और रूसी-हिन्दी  शब्दकोशों के निर्माण का काम शुरू किया।  इसके अलावा उन्होंने लल्लू जी लाल की रचना 'प्रेम सागरका  अध्ययन और विश्लेषण किया। उन्होंने ही तुलसी के 'रामचरित मानस' का रूसी भाषा में पहला अनुवाद किया। रामचरित मानस का अनुवाद करने में उन्हें दस साल का समय लगा था।  उनके इस काम को रूस में आगे बढ़ाने वालों में वीक्तर बालिन, वसीली बिस्क्रोव्नी, सिम्योन रूदिन, गिओर्गी ज़ोग्राफ़ और ततियाना कतेनिना का नाम प्रसिद्ध है। वसीली बिस्क्रोव्नी (1908-1978) ने दो खण्डों में जो हिन्दी-रूसी शब्दकोश बनाया था, उसका इस्तेमाल आज भी रूस में किया जाता है और उसे हिन्दी-रूसी भाषा का सर्वश्रेष्ठ शब्दकोष माना जाता है। वीक्तर बालिन ने हिन्दी साहित्य के इतिहास पर काम किया और मैथिली, अवधी और ब्रज भाषाओं के साहित्य का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने रूसी छात्रों के लिए हिन्दी साहित्य के इतिहास का विस्तृत पाठ्यक्रम  भी तैयार किया। वीक्तर बालिन को रूस में प्रेमचन्द के उपन्यासों और कहानियों के अनुवाद के लिए भी याद किया जाता है। उन्होंने प्रेमचन्द के 'निर्मला' , 'कर्मभूमिऔर  'रंगभूमि' जैसे  उपन्यासों का रूसी भाषा में अनुवाद किया था। प्रोफ़ेसर सिम्योन रूदिन (1929-1978)  आधुनिक भारतीय भाषाओं के ध्वनि-विज्ञान के क्षेत्र में अपने गहरे विश्लेषण के लिए मशहूर हैं। उन्हें भारतीय भाषाओं की ध्वनियों की इतनी ज़्यादा  जानकारी थी कि वे हिन्दी, बांग्ला और मराठी जैसी भारोपीय परिवार की भाषाएँ बड़ी आसानी से बोल लेते थे। गिओर्गी ज़ोग्राफ़ ने हिन्दी और उर्दू भाषाओं के इतिहास और भारतीय भाषाओं के आधुनिक रूप का तुलनात्मक अध्ययन किया तथा उत्तरी भारत के मुहावरों, लोकोक्तियों और भारतीय लोककथाओं पर बड़ा काम किया।
मास्को में भारतीय भाषाओं का अध्ययन और अध्यापन दूसरे विश्व-युद्ध के बाद शुरू हुआ। छठे दशक में मास्को विश्वविद्यालय में पूर्वी भाषा अध्ययन संस्थान की स्थापना की गई और उसमें 'हिन्दुस्तानी' भाषा पढ़ाई जाने लगी। 1957  में भारत से डा०  रामकुमार वर्मा को हिन्दुस्तानी के अध्ययन व अध्यापन के लिए कोर्स तैयार करने के लिए बुलाया गया था। उन्होंने दो-ढाई साल रूस में रहकर यह काम किया। लगभग उसी समय मास्को के अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान में भी पूर्वी भाषा अध्ययन केन्द्र की स्थापना की गई और वहाँ भी 'हिन्दुस्तानी' भाषा पढ़ाई जाने लगी। मास्को के  पूर्वी देश अध्ययन संस्थान नामक इंस्टीट्यूट में भी उन्हीं दिनों भारतीय भाषाओं और साहित्य का सक्रिय रूप से अध्ययन शुरू किया गया। येव्गेनी चेलिशेफ़, व्लदीमिर चेर्निशोफ़, तत्याना येलिजारिन्कवा और व्लदीमिर लिपिरोव्स्की हिन्दी के क्षेत्र में इस इंस्टीट्यूट के प्रमुख विद्वान माने जाते हैं।
आजकल  रूस में  हिन्दी शिक्षण के मुख्य केन्द्र मास्को, सेण्ट पीटर्सबर्ग तथा व्लदीवस्तोक में स्थित हैं। मास्को में तीन मुख्य केन्द्र हैं जहाँ हिन्दी बी०ए० और एम०ए० के स्तर तक पढ़ाई जाती है। ये केन्द्र हैं -- मास्को विश्वविद्यालय, मानविकी राजकीय विश्वविद्यालय तथा मास्को अन्तरराष्टीय सम्बन्ध विश्वविद्यालय। तीनों जगह छात्रों को अलग-अलग विषयों में बी०ए० और एम०ए० की डिग्रियाँ मिलती हैं। उदाहरण के लिये मास्को विश्वविद्यालय में भारतीय इतिहासभारतीय भाषाशास्त्र और साहित्य, भारतीय अर्थव्यवस्था तथा भारतीय राजनीति में डिग्री मिल सकती है। इन सब विषयों में डिग्री प्राप्त करने के लिये हिन्दी सीखना अनिवार्य है। हिन्दी के साथ दूसरे विषय भी पढ़ने अनिवार्य हैं। जो विद्यार्थी इतिहास चुनते हैं, उनके पाठ्यक्रम में दुनिया का इतिहास, भारतीय इतिहास इत्यादि विषय शामिल होते हैं। भारतीय भाषाशास्त्र सीखनेवालों को आधुनिकतम भाषा-विज्ञान के सिद्धान्त विस्तार से पढ़ने पड़ते हैं। साहित्यिक आलोचना में दिलचस्पी लेनेवाले छात्रों को आलोचना के प्रमुख सिद्धान्त और दुनिया भर के साहित्य का इतिहास पढ़ाया जाता है आदि-आदि। भारतीय इतिहासभारतीय भाषाशास्त्र और साहित्यिक आलोचना के छात्रों के लिये संस्कृत सीखना आवश्यक समझा जाता है। सभी छात्रों के लिये –  चाहे वे भारतीय समाजशास्त्र पढ़ रहे हों या भारतीय अर्थशास्त्र या भारतीय भाषाशास्त्र पश्चिमी भाषाओं के साथ-साथ (जिनमें अँग्रेज़ी मुख्य है) कम से कम दो भारतीय भाषाएँ सीखना ज़रूरी है। हिन्दी के साथ-साथ दूसरी भारतीय भाषा के रूप में तमिल, उर्दू, बांग्ला, मराठी, पंजाबी आदि भाषाएँ चुनी जा सकती हैं।
मास्को विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग का मैं यहाँ विशेष रूप से ज़िक्र करना चाहूँगी क्योंकि मैं वहीं पर पढ़ाती हूँ। भारतीय भाषा विभाग की स्थापना मिखाइल सोतनिकफ़ ने की थी। लेकिन विभाग के प्रसार में सबसे बड़ी भूमिका अनातोली अक्स्योनफ़ ने निभाई। आजकल हम मुख्य तौर पर हिन्दी, उर्दू और तमिल भाषाएँ पढ़ाते हैं। दूसरी भाषा के रूप में हम बांग्ला, मराठी, संस्कृत और पंजाबी भाषाएँ पढ़ाते हैं। हमारे भारतीय भाषा विभाग में कुल दस प्राध्यापक पढ़ाते हैं। प्राध्यापन के साथ-साथ ये लोग अनुवाद, आलोचना और भाषा वैज्ञानिक काम करते हैं। प्रोफ़ेसर ज़ख़ारिन संस्कृत, तेलुगु, कश्मीरी, पाली, हिन्दी और उर्दू के विद्वान हैं और आजकल भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष हैं। डा० अलेक्सान्दर दुब्यान्स्की तमिल भाषा के एसोसियेट प्रोफ़ेसर हैं। एसोसियेट प्रोफ़ेसर यूल्या अलेख़ानवा संस्कृत भाषा और साहित्य की विद्वान हैं और संस्कृत नाटक पर उन्होंने विशेष काम किया है। डा० गुज़ेल स्त्रिलकोवा मराठी और आधुनिक हिन्दी साहित्य की विद्वान हैं। डा० येकतिरिना अकीमुश्किना उर्दू भाषा और साहित्य की विद्वान हैं और हिन्दी भाषा भी पढ़ाती हैं। डा० येकतेरिना पानिना रूसी छात्रों को हिन्दी भाषा सिखाती हैं। डा० अनस्तसीया गूरिया की रुचि संस्कृत कविता और आधुनिक हिन्दी कविता में है। उन्होंने कुँवर नारायण, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, लीलाधर मण्डलोई तथा सुधीर सक्सेना जैसे हिन्दी कवियों का रूसी भाषा में अनुवाद किया है। मरीया दिदेन्का हमारे विभाग की सबसे युवा प्राध्यापिका हैं और अभी दो साल पहले ही उन्होंने हिन्दी पढ़ाना शुरू किया है। वे भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषज्ञ हैं। इनके अलावा हमारे विभाग में एक भारतीय प्राध्यापक अनिल जनविजय भी हैं, जो हिन्दी के कवि हैं और छात्रों को अनुवाद और हिन्दी साहित्य पढ़ाते हैं।
शिक्षा का माध्यम रूसी है। इसका मतलब यह है कि सारे विषय (जिनमें हिन्दी साहित्य का इतिहास भी शामिल है) रूसी भाषा में पढ़ाए जाते हैं। इसका कारण यह है कि रूसी छात्रों को हिन्दी एकदम शुरू से (यानी वर्णमाला से) सीखनी पड़ती है। इसलिए मास्को आदि विदेशी विश्वविद्यालयों में वैसा पाठ्यक्रम नहीं बनाया जा सकता है जैसा भारतीय विश्वविद्यालयों में बी०ए० और एम०ए० स्तर तक हिन्दी पढ़ाने के लिये लागू है। हमारे लक्ष्य भी दूसरे हैं। हमारे यहाँ यह परम्परा है कि भारतीय इतिहास, भारतीय समाजशास्त्र और भारतीय अर्थशास्त्र में बी०ए० करने वाले छात्रों को सिर्फ़ हिन्दी साहित्य ही नहीं, बल्कि अपने मुख्य विषयों की किताबें भी हिन्दी में पढ़नी चाहिए। वैसे तो अभी तक के हिन्दी शिक्षण के इतिहास में पढ़ने तथा पढ़ानेवालों के लक्ष्य बदलते रहे हैं।
सोवियत संघ के दौर में समझा जाता था कि हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाएँ सीखना-सिखाने के साथ-साथ एक प्रमुख लक्ष्य यह भी है कि छात्रों के बीच मार्क्सवादी लेनिनवादी विचारधारा, सोवियत रहन-सहन और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों का भी प्रचार किया जाए। इसलिये तीसरे ओर चौथे साल के छात्र अपना ज़्यादा समय हिन्दी में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यक्रम और कम्युनिस्ट पार्टी की हर काँग्रेस की कार्यसूची को ज़बानी याद करने में लगाते थे। हिन्दी के लेखकों तथा कवियों की रचनाएँ पढ़ने के लिये तब उनके पास बहुत कम समय बचता था। इण्टरनेट उस समय नहीं था, सिर्फ़ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का हिन्दी का अख़बार जनयुगही उन्हें देर-सवेर पढ़ने के लिए मिलता था।  हिन्दी की जो पाठ्य-पुस्तकें उस समय बनाई जाती थीं तो उनमें यही विचार प्रमुख रहता था कि रूसी अध्यापकों को यह अच्छी तरह मालूम है कि हिन्दी कैसी होनी चाहिए और अगर कोई हिन्दीभाषी कहे कि पाठ्य-पुस्तक में गलतियाँ हैं तो इसका मतलब यह है कि उसे ख़ुद हिन्दी नहीं आती है।
सोवियत संघ में भारतीय भाषाएँ सीखने-सिखाने के क्षेत्र में कमियों के साथ साथ ख़ूबियाँ भी थीं। लौह-पट के अन्दर रहते हुए बहुत कम लोगों को विदेश जाने का मौका मिलता था, इसलिए सारे रूसी लोग दूरस्थ रहस्यपूर्ण भारत के सपने देखा करते थे। हिन्दी के छात्रों को अपने सपने पर अमल करने का मौक़ा तभी मिल सकता था बशर्ते कि वे ख़ूब मेहनत करें और उन्हें परीक्षा में अच्छे नम्बर मिलें। इस तरह उनके मन में हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाएँ सीखने की प्रेरणा पैदा होती थी। दूसरी प्रेरणादायक बात यह थी कि हिन्दी आदि भारतीय भाषाएँ सीखने के बाद कोई अच्छी दिलचस्प नौकरी मिल सकती थी। मिसाल के तौर पर विदेश मंत्रालय में, मास्को रेडियो में, प्रगति प्रकाशन में या किसी शोध संस्थान में। उस समय लोग पैसा कमाने के बारे में नहीं सोचते थे और वैसे मौक़े भी कम मिलते थे। शोध करना प्रतिष्ठित काम समझा जाता था। सोवियत संघ के माहौल का एक और गुण यह था कि जो भारतीय लोग सोवियत संघ आते थे वे ज़्यादातर मार्क्सवादी प्रचार के धोखे में चले आते थे। सोवियत संघ आने वाले ज़्यादातर भारतीय सदाचारी और बुद्धिजीवी होते थे, इसलिये रूसी लोगों पर उनका बड़ा प्रभाव पड़ता था। मैं विस्तार से सोवियत वातावरण का वर्णन कर रही हूँ क्योंकि उस पर दूसरी सारी चीज़ें निर्भर करती थीं यानी भाषा कैसे सिखाई जाए, उस का उपयोग किन-किन क्षेत्रों में किया जाए, विद्यार्थियों में यह भाषा सीखने की इच्छा कैसे पैदा की जाए वगैरह-वगैरह।
जब रूस में पेरेस्त्रोइका (पुनर्निर्माण या पुनर्गठन) शुरू हुआ तो एकदम सारा वातावरण बदल गया। अब भारत जाने के लिए यह ज़रूरी नहीं था कि कोई अच्छा और सफल विद्यार्थी भी हो। अब हर व्यक्ति  टिकट खरीद के भारत की यात्रा कर सकता था। भारत घूम कर लौटनेवाले छात्र एक दूसरे को यह बताने लगे कि वहाँ तो अँग्रेज़ी से भी काम चल जाता है। हिन्दी जानने की कोई ख़ास जरूरत नहीं है। विशेष रूप से किताबी हिन्दी जानने की तो बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। आपकी शुद्ध हिन्दी सुनकर भारत में लोग हँसते हैं। अब भारत से भी पहले वाले उदार बुद्धिजीवी कम्युनिस्टों की जगह बिल्कुल दूसरे क़िस्म के लोग रूस  आने लगे, जिनको भारतीय साहित्य और संस्कृति में इतनी दिलचस्पी नहीं थी, जितनी उनकी दिलचस्पी पैसा कमाने में थी। ऐसे लोगों से शादी-वादी की बातें करना उबाऊ बात थी। हिन्दी सीख कर नौकरी पाने की सम्भावनाएँ भी कम होती गईं क्योंकि नए रूस में हिन्दी तथा दूसरी भारतीय भाषाओं का उपयोग करने के क्षेत्र पहले से सीमित हो गए थे। रूस की नई सरकार न तो समाजवादी व्यवस्था की सफलताओं का प्रचार करने में रुचि रखती थी और न ही नई पूंजीवादी व्यवस्था का प्रचार करने में।  इसलिए मास्को रेडियो में धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं में प्रसारण कम होने लगा, प्रगति प्रकाशन में रूसी से भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने का काम बन्द कर दिया गया। हिन्दी में शोध करना भी इतना प्रतिष्ठित काम नहीं रह गया था क्योंकि ऐसे काम के लिये बहुत पैसे नहीं मिलते थे। इस के अतिरिक्त जब छात्रों को हिन्दुस्तान और पश्चिमी देशों में किए जानेवाले शोधकार्यों की जानकारी मिली तो उन्हें पता चला कि अर्थशास्त्र जैसे क्षेत्रों में ही नहींइतिहास और भाषाशास्त्र जैसे क्षेत्रों में भी अन्तरराष्ट्रीय स्तर के शोध-अनुसंधान ज़्यादातर अँग्रेज़ी में ही किए जा रहे हैं।
रूसी में हिन्दी के व्याकरण पर बहुत सी अच्छी किताबें हैं, उदाहरण के लिये व्लदीमिर लिपिरोवस्की की किताबें। उनको बुनियाद बनाकर तथा बहुवर्षीय हिन्दी पढ़ाने के अपने अनुभव का उपयोग करके कि हिन्दी सीखते समय रूसी छात्र किस प्रकार की ग़लतियाँ कर सकते हैंहमने रूपर्ट स्नेल और साईमन वाईटमन की किताब के हर पाठ के लिए व्याकरण की टिप्पणी तैयार की। लेकिन एक बात है व्याकरण का नियम समझाना और दूसरी बात है -- ऐसे अभ्यास कराना जिनके माध्यम से मातृभाषा में अनुपस्थित व्याकरण का अन्तर सीखी जानेवाली भाषा में स्वचालित आ जाए। अक्सर ऐसा होता है कि व्याकरण का नियम समझने पर भी विद्यार्थी बोलते और लिखते समय ग़लतियाँ करते हैं। वे ख़ुद अपनी ग़लतियाँ ठीक कर सकते हैं क्योंकि व्याकरण का नियम जानते हैं, लेकिन ग़लतियाँ न होने देने के लिए विशेष अभ्यास करना बहुत जरूरी है।
हमारी दृष्टि में सही हिन्दी बोलने और लिखने का अभ्यास कराने के लिए सबसे लाभदायक काम है रूसी से हिन्दी में अनुवाद करना।  इसलिए पाठय-पुस्तक के हर पाठ के लिये हमने बीस से लेकर पचास तक रूसी वाक्यों को अनुवाद के लिए तैयार किया। हिन्दुस्तान से दूर रहते हुए सबसे मुश्किल काम है छात्रों से बोलचाल का अभ्यास कराना। इसलिए हमारे पाठ्यक्रम में शुरू से ही विभिन्न विषयों पर बोलने की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। हम भरसक प्रयत्न करते हैं कि पहले ही पाठ से छात्र यह महसूस करने लगे कि वह हिन्दी बोल सकता है।
कुछ प्राध्यापकों का विचार है कि अगर विदेशी भाषा बोलनेवाले को रोककर उसकी गलतियाँ ठीक की जाएँगी तो वह घबरा जाएगा और अगर एक बार अटक गया तो फिर बाद में कुछ बोल नहीं पाएगा। ऐसे प्राध्यापकों का मानना है कि शुरू से छात्र चाहे जितनी गलतियाँ करके कुछ न कुछ बोले, बाद में उसे अपने आप ठीक हिन्दी आ जाएगी। हम ऐसे विचारों से सहमत नहीं हैं। हम सोचते हैं कि अपने आप कुछ नहीं आता। अगर प्यार से ग़लती ठीक करके फिर छात्र से सही वाक्य दोहराने के लिए कहा जाए तो वह जल्दी और अच्छी हिन्दी सीखेगा। हमारे छात्र हिन्दी की पढ़ाई के इस तरीके के आदी हो चुके हैं और अगर कोई बाहर का प्राध्यापक आकर ग़लतियाँ ठीक नहीं करता तो वे उसे लापरवाह समझते हैं।
हिन्दी की आधारभूत पाठ्य-पुस्तक की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद हम छात्रों को एक-दो हिन्दी फ़िल्में दिखाते हैं और एक जासूसी उपन्यास पढ़ाते हैं। फ़िल्म और जासूसी उपन्यास असली भारतीय संस्कृति का तो बहुत अच्छा उदाहरण नहीं देते, पर भाषा पढ़ाने के लिये वे इसलिए लाभदायक समझे जाते हैं कि उनकी शब्दावली सीमित होती है और छात्र बार-बार शब्दकोश का इस्तेमाल किए बिना उनको समझ सकते हैं। फ़िल्म देखने का एक और फ़ायदा यह है कि ध्वनि अभिलेखन समझने की आदत पड़ जाती है जो लिखित पाठ समझने से बहुत ज़्यादा मुश्किल होता है। जासूसी उपन्यास और फ़िल्में हँसते-खेलते पढ़ाई जाती हैं। छात्र उपन्यास या फ़िल्म के टुकडों को आधार बनाकर नए शब्दों का इस्तेमाल करके छोटे-मोटे नाटक बनाते हैं। जिन घटनाओं का या नायकों का वर्णन नहीं हुआ है, उनका वर्णन करते हैं। उदाहरण के तौर पर जासूस का अगला-पिछला खानदान क्या हो सकता है, वह जासूस कैसे बना, उपन्यास ख़त्म होने के बाद नायकों और खलनायकों को क्या हुआ आदि-आदि।
दूसरे साल से हम छात्रों को वास्तविक हिन्दी साहित्य भी पढ़ाना शुरू कर देते हैं। दूसरे, तीसरे तथा चौथे साल के विद्यार्थियों के लिये हमने कुछ प्रसिद्ध लेखकों की रचनाएँ इकट्ठी करके एक रीडर बनाई है। कहानियों का चुनाव करते हुए हम ने इस बात का ख़याल रखा कि उनके माध्यम से छात्रों को भारत की संस्कृति और भारत की आधुनिक समस्याओं की भी ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान प्राप्त हो सके। रीडर में कहानियों से पहले हर लेखक का परिचय और उसकी रचनात्मकता के बारे में एक संक्षिप्त टिप्पणी भी दी गई है। हर कहानी के अन्त में शब्दकोश और कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं। मुख्य अभ्यासों में निम्नलिखित प्रकार के अभ्यास शामिल हैं : कहानी में मिले नए शब्द उपयोग करके हिन्दी से रूसी में और रूसी से हिन्दी में अनुवाद करने का अभ्यास, हिन्दी की लोकोक्तियों और मुहावरों का इस्तेमाल करके वाक्य बनाना, नए शब्दों के समानार्थक और विपरीतार्थक शब्द लिखना, कहानी में शामिल शब्दों को उठाकर उन से कोई दूसरी काल्पनिक घटना या कहानी बनाना, मुख्य पात्रों के चरित्र का वर्णन करना आदि।
रीडर में कहानियों का क्रम ऐसा रखा गया है कि सरल भाषा में लिखी कहानियाँ आरम्भ में रखी गई हैं और जिन कहानियों की भाषा कठिन है उनको बाद में रखा गया है। इस तरह दूसरे साल के विद्यार्थियों को हम भीष्म साहनी, कृश्नचन्दर, अमरकान्त और महेश दर्पण की ऐसी कहानियाँ पढ़ाते हैं जो सरल भाषा में लिखी हुई हैं। तीसरे वर्ष के छात्रों के लिये हम मोहन राकेश, कमलेश्वर, काशीनाथ सिंह, प्रेमचंद, राजकमल चौधरी, पुष्पा सक्सेना आदि लेखकों की कहानियाँ चुनते हैं। चौथे साल के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिये हम निर्मल वर्मा, रघुवीर सहाय, कृष्ण बलदेव वैद, उदयप्रकाश आदि लेखकों की रचनाओं का प्रयोग करते हैं जिनकी भाषा थोडी कठिन होती है। एम०ए० के छात्रों को इन सब लेखकों के साथ साथ समकालीन नए लेखकों की रचनाओं का भी परिचय दिया जाता है।
तीसरे साल से हम छात्रों को साहित्य के साथ-साथ अलग से राजनीतिक, आर्थिक, दार्शनिक और सामाजिक विषयों पर विभिन्न निबन्ध भी पढ़ाते हैं। निबन्ध इस आधार पर चुने जाते हैं कि उन में तात्कालिक समस्याएँ पेश की गई हों ताकि हम छात्रों के साथ उन समस्याओं के समाधान के तरीकों पर भी दिलचस्प वाद-विवाद कर सकें। हम सब भरसक प्रयत्न करते हैं कि छात्र कुछ सीख के यांत्रिक तौर पर उसे न दोहराएँ बल्कि प्राप्त किए हुए ज्ञान का रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल करें। इसलिए हम छात्रों को अपने विचार व्यक्त करने के लिये भी प्रोत्साहित करते हैं।
इस स्थिति में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में भी एकदम नई समस्याएँ पैदा हो गईं। सबसे बड़ी समस्या तो यह थी कि अब नई पीढ़ी के विद्यार्थियों को यह भी बताना पड़ता था कि हिन्दी सीखने के बाद  उनके लिए नौकरी पाने की कोई गारण्टी नहीं है। पहले हम सोचते थे कि इस नई दुनिया में बहुत कम लोग हिन्दी सीखने आएँगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकार की नीति बदलती रही, लेकिन युवा रूसी पीढ़ी पहले की तरह जिज्ञासु रही और भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता में रूसी लोगों की दिलचस्पी बढ़ती गई। धीरे-धीरे छात्रों को यह मालूम होने लगा कि इस नए वातावरण में भी ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ हिन्दी का इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर भारतीय भाषाशास्त्र के छात्रों के लिए हिन्दी में लिखे मानक हिन्दी के व्याकरण ही नहीं बल्कि हिन्दी बोलियों के व्याकरण पढ़ना भी जरूरी है। भारतीय समाजशास्त्र के छात्रों को आम लोगों से बात करने के लिए, टी०वी० आदि जनसम्पर्क साधनों द्वारा प्रसारित राजनीतिक वाद-विवाद को समझने के लिए अच्छी हिन्दी आनी चाहिए। हर छात्र को चाहे वह भारतीय अर्थशास्त्र का विशेषज्ञ बनना चाहता हो या प्राचीन भारतीय इतिहास सीखना चाहता हो भारतीय जनता की मानसिकता समझने के लिए,भारतीय जीवन को जानने-बूझने के लिए हिन्दी में लिखा गद्य और पद्य पढ़ना बहुत जरूरी है। और अन्ततः हिन्दुस्तानी लोग कितनी भी अच्छी अँग्रेज़ी क्यों न जानते हों उनके साथ तभी असली दोस्ती बनी रह सकती है, जब उनकी मातृभाषा में उनसे सम्पर्क और बातचीत होती है। इस तरह पेरेस्त्रोइका (पुनर्निर्माण या पुनर्गठन) के दौर के बाद भी रूस में हिन्दी सीखने के इच्छुक युवक-युवतियों की संख्या में कोई कमी नहीं हुई। उल्टा हिन्दी सीखनेवालों की तादाद कई गुणा बढ़ गई। लेकिन वक़्त के तकाज़ों के अनुसार और छात्रों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुकूल हिन्दी शिक्षण की विधि बदलनी पड़ गई।
सब से पहले पुरानी किताबें छोड़कर नई पाठ्य-पुस्तकें चुननी पड़ीं। हिन्दी शिक्षण के कुछ केन्द्रों में, मिसाल के तौर पर मास्को अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध विश्वविद्यालय में यह माना जाता है कि अपनी ही पाठ्य-पुस्तकें तैयार करके छात्रों को उन्हीं के माध्यम से हिन्दी पढ़ाई जानी चाहिए। परन्तु मास्को विश्वविद्यालय और मानविकी राजकीय विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों का ख़याल है कि अगर हम अपनी ज़रूरत के अनुसार किसी दूसरी मौजूद किताब को ले सकते हैं तो नई किताब बनाने की क्या ज़रूरत है? इसीलिए मास्को विश्वविद्यालय में हमने हिन्दी का आधारभूत कोर्स पढ़ाने के लिये रूपर्ट स्नेल और साईमन वाईटमन की किताब टीच योरसेल्फ़ हिन्दीऔर केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा प्रकाशित हिन्दी रिकार्ड / कैसेट की वाचन-पुस्तिकाको चुना। इसका मुख्य कारण यह है कि दोनों किताबों में लेखकों ने बोल-चाल की शब्दावली चुनने में कमाल किया है। लगता है कि उन्होंने शब्द आवृत्ति कोश का इस्तेमाल किया है। दूसरी बात यह है कि दोनों किताबें हिन्दी बोलने का अभ्यास कराने के लिये लाभदायक लगती हैं। दोनों किताबों में सम्वाद हैं जिन की बुनियाद पर छात्र अपने सम्वाद बनाकर पहले ही पाठ के बाद से आसानी के साथ हिन्दी में थोड़ी-बहुत बातचीत करने लगते हैं। मास्को विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार हमारे यहाँ पढ़ाई का माध्यम रूसी भाषा है इसलिए हर पाठ के अन्त में जो शब्दावली दी गई है उसका हमें रूसी में अनुवाद करना पड़ा।
व्याकरण का अनुवाद हमने नहीं किया क्योंकि रूपर्ट स्नेल और साईमन वाईटमन की किताब उन विद्यार्थियों के लिए लिखी है जिनकी मातृभाषा अँग्रेज़ी है। अँग्रेज़ी और रूसी बोलनेवाले छात्रों को हिन्दी भाषा सीखते समय अलग-अलग दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर रूसी छात्रों के लिये अपनाजैसे सर्वनाम का प्रयोग करना कठिन नहीं है क्योंकि रूसी में भी ऐसा सर्वनाम है जबकि अँग्रेज़ी बोलनेवाले विद्यार्थियों को समझाना पडता है कि यह सर्वनाम कैसे इस्तेमाल किया जाए। उल्टा अँग्रेज़ी व्याकरण में नियमित रूप से यह अन्तर प्रकट किया जाता है कि क्रिया का व्यापार करनेवाला ख़ुद कर्ता है या यह व्यापार किसी मध्यस्थ के जरिए किया जा रहा है। रूसी में ऐसा नहीं है। आदमी चाहे ख़ुद कुछ सीता है या किसी से सिलवाता है रूसी में एक ही क्रिया का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिये रूसी छात्रों के लिये व्याकरण बनाने से पहले हिन्दी और रूसी भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करना पड़ता है।
राजनीतिक, आर्थिक, दार्शनिक और सामाजिक विषयों पर वाद-विवाद करते समय कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सब से बड़ी समसया बोलचाल की भाषा की समस्या है। हिन्दी पढ़ाने के पाठ्यक्रमों में हमेशा लिखा होता है कि पहले बोल-चाल की भाषा सिखाई जाए और इस के बाद किताबीहिन्दी पर ज़ोर दिया जाए। आम तौर पर बोल-चाल की हिन्दी का मतलब होता है -- शादी-वादी, खाने-वाने की बातें करने की क्षमता, यानी अपने परिवार के बारे में बताना, परिचय करना-कराना, रास्ता पूछना आदि। ऐसी बातें सिखाने के लिये बहुत-सी किताबें लिखी जा चुकी हैं। लेकिन गम्भीर विषयों पर बातचीत करने के लिए अभी तक किसी ने कोई किताब नहीं लिखी है। अँग्रेज़ी की तरह रूसी में भी जो शब्द राजनीति पर लिखे निबन्ध में उपयोग किए गए वही शब्द दोस्ताना बातचीत में इस्तेमाल किए जाएँगे। इसलिए अगर हमारे छात्रों को अनुसूचित जातियाँ और जनजातियाँजैसा पारिभाषिक शब्द समाचार-पत्र में पढ़ने को मिलता है तो वही शब्द वे बातचीत में उपयोग करते हैं। जब हिन्दी बोलनेवाले उनकी भाषा कृत्रिम तथा किताबी समझते हैं तो छात्र परेशान होकर अध्यापक पर दोष लगाते हैं कि उन को ग़लत भाषा सिखाई गई थी। ऐसे किसी मामूली नियम से काम नहीं चलता कि सारे तत्सम शब्दों के बदले अँग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल करो क्योंकि कोड स्वीचिंग के नियम इतने आसान नहीं हैं। ये नियम समझने के लिये ज़्यादा अनुभव चाहिए। अफ़सोस की बात यह है कि ऐसा अनुभव प्राप्त करना आसान नहीं है क्योंकि पढ़े-लिखे लोग आम तौर पर गम्भीर विषयों पर अँग्रेज़ी में बात करते हैं और जिन लोगों को अच्छी शिक्षा नहीं मिली है, उनको गम्भीर बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है।

कुछ और समस्याएँ भी हैं जिनको हम सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान हमारे बस की बात नहीं है। यह है हिन्दी के उपयोग का विस्तार। जब हिन्दी का हर औपचारिक क्षेत्र में इस्तेमाल किया जाएगा, हमारे विद्यार्थियों को अपनी मेहनत का फल मिलेगा। कभी-कभी कहा जाता है कि जवान पीढ़ी नालायक है, उसको पैसे का लालच है, ज्ञान का नहीं। हमारे विद्यार्थी ऐसे नहीं हैं। वे भारत के बारे में ज़्यादा ज्ञान प्राप्त करने में बहुत रूचि लेते हैं इसलिए विश्वास से कहा जा सकता है कि रूस में हिन्दी का भविष्य उज्जवल है।

शनिवार, 24 सितंबर 2016

हिन्दी साहित्य का नया पडाव : टिप्पणीवाद

 बकौल गोपेश्वर सिंह हिन्दी में जिस विधा की सर्वाधिक दुर्गति हुई है, वह है पुस्तक समीक्षा। फिलहाल पुस्तक समीक्षा लिखने-लिखाने का आलम प्राय: जुगाड़ उद्योग-सा है। पत्र-पत्रिकाओं के इस जरूरी हिस्से में खानापूरी-सी की जाती है। पुस्तक समीक्षा अब सीखने-सिखाने के लिए नहीं, बल्कि किसी को उठाने-गिराने के लिए की जाती है। आलोचना के क्षेत्र में यही प्रक्रिया  पिछले दो  दशकों से निर्बाध रूप से साहित्य जगत में विद्यमान रही है। आचार्य राम चन्द्र शुक्ल से लेकर आचार्य नन्द दुलारे बाजपेयी, डॉ। राम विलास शर्मा, देवी शंकर अवस्थी, नलिन विलोचन शर्मा, साही और  नामवर सिंह जैसे कुछ गिने चुने नाम ही समीक्षा, आलोचना, समालोचना के नाम पर हिन्दी साहित्य  को मिले। इनकी कलम से हिन्दी को फणीश्वर नाथ रेणु , सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जैसे लेखक दिग्गज साहित्यकारों के रूप में स्थापित हुए। जाने अनजाने में यह बात  हिन्दी लेखकों और पाठकों को समझ में आने लगी कि फलां समीक्षक यदि फलां पुस्तक की समीक्षा में दो अच्छे शब्द लिखे तो पुस्तक जरुर पठन योग्य होगी। इस बात ने पाठकों को पुस्तक खरीदने में “चूजी” बना दिया। शुरुआत में नि:संदेह रूप से इस तथ्य का फ़ायदा पाठकों को मिला। उन्हें समीक्षा पढ़कर यह पता चल जाता था कि कौन सी पुस्तक कथ्य शिल्प और भाव के दृष्टिकोण से  रूचि के अनुसार पढ़ी जानी चाहिए। इस समय तक समीक्षक भी निर्भीकता और प्रामाणिकता के साथ पुस्तकों का निर्ममता के साथ विवेचन कर रहे थे किन्तु जैसे ही प्रारम्भिक समीक्षकों की पहली खेप ने साहित्य जगत को अलविदा कहा  उनकी जगह लेने वाले उस परम्परा के साथ न्याय नही कर पाए और गोपेश्वर सिंह को उपर्युक्त पंक्तियों में समीक्षा के प्रति अपने भाव व्यक्त करने पड़े।

 उससे सबसे ज्यादा नुकसान लेखक और लेखन को ही हुआ। समीक्षक, सम्पादक और रचनाकारों की मिलीभगत से आम जनता हिन्दी  पुस्तक पाठन से दूर होती चली गयी। लेखक और पाठक के बीच समीक्षक नामक जीवों की मठाधीशी से हिन्दी लेखन सिकुड़ता गया और जो हुआ भी उसके अपने व्यक्तिगत और  राजनीतिक निहितार्थ रहे। इन्टरनेट के आने के बाद आम जन ब्लॉगिंग तथा अन्य माध्यमों जिसे बाद में सोशल मीडिया कहा गया, से अपना मत रखने का साहस करने लगा। धीरे धीरे पांडित्यपूर्ण और भारी भरकम समीक्षाओं पर एक ब्लॉगर या फेसबुकिये की संक्षिप्त टिप्पणी  भारी पड़ने लगी। यही वह वक्त था जब लेखक और पाठक के बीच सीधा संवाद स्थापित  होना शुरू हुआ। सही मायनों में साहित्य में उत्तर आधुनिक प्रवृत्तियों का परावर्तन देखने को मिलने लगा जब वृहद् संरचनाओं की बजाय  सूक्ष्म संरचनाएं ज्यादा प्रभावकारी भूमिका निर्वहन करने लगीं। साहित्य जगत में खासतौर से हिन्दी लेखन में सोशल मीडिया पर सक्रिय रचनाकारों  ने  इस प्रवृत्ति को परम्परा के रूप में स्थापित किया।  स्याह –सफेद समीक्षा  लेखन अब तथाकथित  किसी भारी भरकम नाम का मोहताज न होकर एक सामान्य नाम होने की संभावना यथार्थ में परिवर्तित होने जा रही है ।

साहित्य की जीवन्तता तभी है जब  वह पाठक तक पहुचे और पाठक उसे पढ़ कर उस पर अपनी प्रतिक्रिया दे। पुस्तक के बारे में अच्छा बुरा जो भी लिखे। समीक्षा के क्या मानक है यह अलहदा विषय है। आम पाठक ने पुस्तक पढ़कर क्या लिखा यह महत्वपूर्ण है। दरअसल मानक स्थापित करने के क्रम  में फिर वही व्यक्ति विशेष के ठप्पे की आवश्यकता होती है और साहित्य केन्द्रित और संकुचित होता जाता है। इस मायने में  फेसबुक के माध्यम से पुस्तकों पर आई  टिप्पणियाँ और सपाट समीक्षाएं भविष्य में इस बात  के लिए जानी जायेगी कि उसने पाठक से सीधा संवाद कर साहित्य के विकेंद्रीकरण का रास्ता खोला।  मेरे ख़याल से  काव्य/कथा संग्रह या अन्य किसी विधा में लिखी गयी साहित्यिक कृति  पर आधारित समीक्षाओं ने  पुस्तकों को पढने मात्र अथवा  शेल्फ या पुस्तकालय की शोभा बढाने की बजाय उस पर अध्ययन करने की  नई प्रवृत्ति का सूचक है। 

अज्ञेय ने १९४३ में तार सप्तक के प्रकाशन के साथ हिन्दी में प्रयोग वाद को स्पष्ट आकार दिया जो छायावाद और प्रगतिवाद की रुढियों की प्रतिक्रिया का परिणाम था।  हिन्दी साहित्य के प्रयोगवादी दौर के पश्चात टिप्पणी वाद  युग की शुरुआत हो रही है जो कि साहित्य में उस लौह पिंजरे के विरुद्ध प्रतिक्रिया का परिणाम है जिसमे साहित्य एक विशेष वर्ग के केंद्र में जमा हो जाता है। यह टिप्पणी वाद कोई तयशुदा मानक बनाने के पक्ष में नही है यह तो उस धारा  की हिमाकत करता है  जिसके अंतर्गत  आम जनता बड़े से बड़े रचनाकार की रचना की समीक्षा कर उसे पठनीय या अपठनीय निर्धारित करेगी न कि कुछ विशेष लोग अपनी साहित्यिक रुचियों और समझ के आधार पर जनता पर अपनी राय आरोपित करेंगे। जनता जो राय बनाए उसके आधार पर साहित्यिक लोकतंत्र की स्थापना हो हिन्दी साहित्य को इससे बेहतर अवदान भला और क्या हो सकता है। 

शनिवार, 10 सितंबर 2016

"हिन्दी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता" : अभियान की अवधारणा ( प्रथम भाग)


जिस देश में  कोस कोस पे पानी और चार कोस पे बानी की बात कही जाती है, जहां १७९ भाषाओं ५४४ बोलिया हैं बावजूद इसके देश का  राजकाज सात समंदर पार एक अदने से देश की भाषा में हो रहा है , इस तथ्य पर मंथन होना चाहिए I भारतीय भाषायें अभी भी खुले आकाश में सांस लेने की बाट जोह रही हैं I हिन्दी को इसके वास्तविक स्थान पर स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि इसकी सर्वस्वीकार्यता हो I यह स्वीकार्यता आंदोलनों या क्रांतियों से नही आने वाला है I इसके लिए हिन्दी को रोजगारपरक भाषा के रूप में विकसित करना होगा साथ ही अनुवादों और मानकीकरण के जरिए इसे और समृद्धता  और परिपुष्टता की ओर ले जाना होगा I

हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं की  समृद्धता  को उपयोगिता में बदलकर ही हम उन्हें शेष विश्व से प्रतियोगिता के लिए तैयार कर सकते हैं I हिन्दी में सभी भाषाओं के समन्वय की विशेष क्षमता है लगभग ढाई लाख मूल शब्द हिन्दी में है जोकि किसी अन्य भाषा में नही हैI हिन्दी के  अकादमिक व्यावसायिक स्वरुप के मानकीकरण से ही आगे के रास्ते खुलेंगेI हिन्दी  का भाषाई और तकनीकी रूप से अन्य भाषाओं के साथ कोई विरोध नही हैI बल्कि यह तो सभी भारतीय भाषाओं को पिरोनी वाली माला के धागे के रूप में है जिसमे समस्त भारतीय बोली भाषा के फूल टाँके हुए हैंI

दूसरी भाषाओं के प्रति असुरक्षा का माहौल बना देना शुद्ध रूप से  राजनीतिक मसला हैI इस  मसले को दिल्ली के गलियारे से निकल कर   देश की जनता के सामने रखा जाना चाहिए  ताकि वह  इसे हल करने के लिए आगे आए I एक उदाहरण से इसे और स्पष्ट तरीके से समझ सकते हैं, जब चुनाव होते हैं तो हर नेता अपने क्षेत्र की जुबान में वोट मांगता हैI इसका मतलब है कि जनता से सीधे जुड़ाव उनकी अपनी भाषा में ही हो सकता हैI ठीक  यही कोशिश होनी चाहिए जिससे  आजादी के उनहत्तर   साल बाद देश को  उसकी कोई एक जुबान मिल जाए, यह देश अपनी भाषा में बोलने लग जाएI

भारत की भाषाओं को संवर्धित करने के लिए केंद्र और राज्यों ने अनेको संस्थाओं अकादमियों का गठन किया हुआ है किन्तु ये संस्थाएं कुछ निहित व्यक्तिगत  राजनीतिक कारणों के चलते भाषा को वह योगदान नही दे पायी जिसके लिए इन्हें स्थापित किया गया थाI आपस में समुचित तालमेल न होने के कारण इन संस्थाओं के मध्य संघर्ष की स्थिति बनी रही फलस्वरूप भाषा के मुद्दे कहीं पीछे छूटते गये I  मेरा स्पष्ट मत है कि   हिन्दी अकादमियों, क्रांतियों और आंदोलनों,  कवि सम्मेलनों, पुस्तक विमोचनों अथवा विभिन्न अनुदानों के सहारे मात्र से आगे नही बढ़ सकती है I बिना आधार के सुधार की कल्पना भी नही की जा सकती I हिन्दी की  सशक्तता इस के   रोजगार, विज्ञान और तकनीकी की भाषा होने में निहित  हैI हिन्दी की सम्पूर्ण भारत में सम्पर्क भाषा के रूप में स्वीकार्यता और क्षेत्रीय भाषाओं  के अधिकार को लेकर चेतनात्मक परिचर्चा का आयोजन न केवल चौदह सितम्बर बल्कि सम्पूर्ण वर्ष भर चलनी चाहिए I  विभिन्न बोलियों भाषाओं का परिरक्षण, संवर्धन और विकास करने, ज्ञान की विभिन्न शाखाओं से सम्बद्ध भारत तथा विश्व की विभिन्न भाषाओँ में उपलब्ध सामग्री का मानक हिंदी अनुवाद की व्यवस्था, सृजनात्मक साहित्य के प्रोत्साहन एवं प्रकाशन हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ ग्रन्थ बनाना इत्यादि  ऐसे आधार हैं जिन पर खड़ी होकर हिन्दी राष्ट्रभाषा के साथ विश्वभाषा का दर्जा प्राप्त कर सकती हैI   

हिन्दी को केन्द्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए देश भर में व्यापक संवाद हो  हिन्दी के प्रति जो भी पूर्वाग्रह फैले हैं या फैलाए गये हैं उन्हें ढूंढ कर उनका उन्मूलन अति आवश्यक है तभी हिन्दी भाषा की पुनर्स्थापना तभी हो सकती है I

 क्रमशः 




रविवार, 4 सितंबर 2016

भाषाई मुद्दे और आठवीं अनुसूची की प्रासंगिकता।


                                       

आठवीं  अनुसूची में भाषाओं को शामिल करने का वाकया जब पूर्व शिक्षामंत्री डॉ. कर्ण सिंह के समक्ष आया तो उन्होंने कहा कि संविधान में आठवीं अनुसूची होनी ही नही चाहिए। इससे खामखा बखेड़ा खड़ा होता है। उन्होंने देश की सारी  भाषाओं को वही अधिकार देने की बात कही जो किसी एक भाषा को प्राप्त है। डॉ केदारनाथ सिंह के हवाले से एक जानकारी मिली कि  एक छोटी सी भाषा जारवा, जिसे कुछ सौ लोग बोल रहे हैं,  आज पूर्णतया समाप्त होने के कगार पर है। यह अत्यंत दुर्भाग्पूर्ण स्थिति है क्योंकि  हम अभी भी यह तय नही कर पा रहे हैं कि किस भाषा को सबसे ज्यादा संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता है?  उसे जो कमजोर है, मरणासन्न है जो ज़िंदा रहने और अपने को बचाने की जद्दोजहद में है या उसे जो पक्षपाती सरकारी अनुदानों के खाद पानी की बदौलत अमरबेल की तरह छायी है और  अनावश्यक स्थान घेर रही है।

भाषाई मुद्दे पर पूर्व सरकारें कितनी उदासीन और लचर रही हैं यह इस बात से साबित होता है कि 1950 में बोलियों को अनुसूची में मान्यता देने के लिए कोई मापदण्ड तय नही किया था। इस अनुसूची 13 भाषाओं,  असमिया,बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु को रखने पर आम सहमति बनी तो पंडित जवाहरलाल नेहरु ने इसमें उर्दू को और जोड़ने को कहा और उसका आधार स्वयं को उर्दूभाषी के रूप में दिया इस तरह  जाने अनजाने में वह हिन्दी और उर्दू के बीच अलगौझे को संस्थात्मक रूप दे बैठे । अब यह अलगौझा विस्तृत आकार ले चुका है। सरकार को इस समस्या का फौरी समाधान भाषाई दबाव समूहों की बात  मानने में मिला और इस हेतु  वर्ष 2003  में आठवीं अनुसूची के अंतर्गत बोली भाषा उपभाषा विभाषा इत्यादि को शामिल करने के लिए करने के लिए डॉ. सीताकांत महापात्रा समिति का गठन किया। इस समिति की  संस्तुतियों को अंतर मंत्रालयी समिति को विचारणार्थ  भेजा जाता है जो  आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने हेतु प्रस्तावित भाषाओं के विकास एवं प्रयोग पर अध्ययन करके एक प्रतिवेदन सरकार को देती है। उसके बाद ही ये बोलियाँ,  भाषायें , उपभाषाएँ,  विभाषायें आठवीं अनुसूची में शामिल की जा सकती हैं। वर्तमान में भारत सरकार के पास इस संदर्भ में  भोजपुरी , छत्तीसगढ़ी, भोटी , लेप्चा , लिम्बू , कोड़व और टुलु, मिजो, राजस्थानी, टेंयीडी, भोटी समेत आठ आवेदन समीक्षा के लिए सरकार के पास पड़ें  हैं । किन्तु यह एक सैद्धांतिक बात थी परदे के पीछे की बात कुछ अलहदा रहे  जिसके निहितार्थ भाषा के व्याकरण उसके सौष्ठव के मापदंडों  से कहीं अलग थे।

भारत की जनगणना के अनुसार हिन्दी के अन्तर्गत 49 भाषा-बोलियां आती हैं। वर्तमान में जो हालात बन रहे हैं उनको देखकर लगता है कि आठवी अनुसूची को भोजपुरी राजस्थानी और भोटी भाषाएं मिलने जा रही हैं किन्तु इस मान्यता के साथ ही एक बड़ा आन्दोलन भी फूटने के कगार पर है अवधी,  बुंदेली को भी इस अनुसूची में शामिल करने की मांग धीरे धीरे जोर पकड रही है। बिहार में उमेश राय ने मैथिली और भोजपुरी के साथ-साथ बिहार की बज्जिका, अंगिका, और मघई को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की है। छत्तीसगढ़ी के लिए भी ऐसी ही मांग की जा रही है।  यह कहना कठिन नहीं कि ऐसी ही मांग कन्नौजी, ब्रज, पहाड़ी, गढ़वाली, कुम़ांऊनी तथा हरियाणवी भाषा भाषी अथवा उनके रहनुमाओं  के मन में पल रही  होगी। चुनावी राजनीति को देखते हुए तमाम भाषाई दबाव समूह भाषागत मुद्दे को लेकर सरकार से सौदेबाजी करेगे यह  तय है और सरकार को कोई न कोई  आश्वासन भी देना पडेगा साथ ही  अमल भी करना पडेगा  किन्तु असली सवाल तो तब भी यही है कि जारवा जैसी भाषाओं के  जिनके कुछ सौ वोट  हैं लेकिन जिनकी भाषा संस्कृति हजारों हजार साल पुरानी है उनके लिए सरकार क्या करेगी?

तुष्टिकरण किसी समस्या का समाधान नही वरन अपने आप  में ही  समस्याओं का बड़ा स्रोत है । कल्याणकारी राज्य की अवधारणा  तुष्टिकरण में  नही बल्कि समष्टिकरण में निहित है। भोजपुरी भाषा या किसी भी क्षेत्रीय भाषा को अनुसूची में शामिल करने को लेकर चले आन्दोलन को मुकाम तक पहुँचते देख तमाम  भाषाविदों की ओर से हिन्दी को बांटने और कमजोर करने के दिए गये तर्क अप्रासंगिक और आधारहीन हैं। निश्चित रूप से इस आन्दोलन से अन्य बोली भाषाओं को एक नई ऊर्जा मिलेगी जैसा कि मैंने पहले भी कहा पर रूपये और वोट से भाषाओं में समृद्धता आएगी यह एक अस्वीकार्य तथ्य है। आज सबसे ज्यादा आवश्यकता जिस बात  की है वह यह है कि आठवीं अनुसूची के विशेषाधिकार को समाप्त कर  सभी बोली भाषाओं के लिए “एक समान भाषा नीति” का निर्माण हो और उनकी जरूरत के हिसाब से सुविधाएं मुहैया करवाई जाएँ चाहे उस भाषा को एक व्यक्ति बोल रहा हो या एक करोड़। प्रजातांत्रिक व्यवस्था न्यायपूर्ण  और समान  वितरण के आधार पर निर्मित होता है। अगर सरकार को लगे कि किसी बोली भाषा को बचाने के लिए अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए तो उसके लिए भाषाई आरक्षण की व्यवस्था भी सुनिश्चित कि जानी चाहिए। लेकिन इस आरक्षण का आधार तार्किक और तात्कालिक हो।
हिन्दी को केन्द्रीय भाषा के रूप दर्जा  अधिकार दिया जाए ताकि पूरे देश में हिन्दी को राजकाज की भाषा, न्याय की भाषा, व्यापार, रोजगार  और शिक्षा की भाषा के रूप में लिखा पढ़ा जाए साथ ही साथ क्षेत्रीय भाषाओं को अधिकार मिले ताकि उनको विस्तृत आकार लेने का आकाश उपलब्ध हो। इससे हिन्दी को और भी विस्तार मिलेगा। भारत की सभी लिखित परीक्षाओं  एवं साक्षात्कार में अंग्रेजी की वरीयता ख़त्म हो एवं देश में हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं के लिये समुचित रोजगार व्यवस्था विद्यार्थियों के लिए सुनिश्चित किया जाय I अब वक्त आ गया है कि सरकार इस संदर्भ कुछ ठोस कदम उठाये नही तो देश भाषाई आधार पर एक और त्रासदी के  मुहाने पर खडा है। 






शनिवार, 27 अगस्त 2016

शैक्षिक गुणवत्ता बनाम निजी भागेदारी।

शैक्षिक गुणवत्ता बनाम निजी भागेदारी।

तमिलनाडु के एक चिकित्सा महाविद्यालय की फीस २ करोड़ होने की खबर से नयी शिक्षा नीति निर्माताओं को सबक लेनी चाहिए। शिक्षा को धंधेबाजों के हाथों में देने से शिक्षा का भला नही होने वाला। सरकार को चाहिए कि शैक्षणिक संस्थान खोलने वाले के चाल चलन से लेकर योग्यता, क्षमता, नीयत की ठोक बजाकर परख करे। किसी न किसी किसिम की परीक्षा रखे फिर उन्हें अनुमति दे। कॉर्पोरेट घराने शिक्षा के हितैषी नही है इनको केवल पैसा पैदा करना है।

पिछले एक दशक से तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता और फैलाव के नाम पर जो इंजीनियरिंग कॉलेजों को कुकुरमुत्तों के माफिक खोला गया था उनमे तकरीबन पौने दो लाख सीटें खाली पड़ी हैं।  कहाँ गयी शिक्षा और इसके पैरोकार ? वे सब के सब दलालों की कदमबोसी करते दिख रहे कि एडमिशन करवा दो।  इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार लगभग ९० प्रतिशत उत्तीर्ण छात्र रोजगार के लायक नही।  पूरा का पूरा सिस्टम भरभरा रहा है।  एक बार में १० लाख का निवेश करने वाले माँ बाप बच्चे की १० हजार की नौकरी के लिए १० लाख की रिश्वत देने को अभिशप्त हैं।   निजी शिक्षण संस्थानों और सी बी इस ई का एक और खेला है।  जो टापर छात्र होते हैं वे अक्सर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में जगह पाने को व्याकुल रहते और पा भी जाते । औसत बच्चा मोटी केपिटैशन फीस देने को और निजी कॉलेज में एडमिशन को बाध्य हो जाता है ।
कहीं पढ़ा था कि आठवें दशक के अवसान तक गांवों-कस्बों से कनस्तर में  उदरपूर्ति और कंधे पर बिस्तरबंद में ओढ़ने-बिछाने का सामान लेकर घर से निकलते थे और उन्ही छात्रों को ही जिस सरकारी शिक्षा ने वैज्ञानिक, डाक्टर और इंजीनियर आर्थिक लाचारियों के बावजूद गढ़े थे, वहीं शिक्षा जब निजी संस्थानों के हवाले कर दी गर्इ तो डाक्टर, इंजीनियर बनने के लिए प्रतिस्पर्धा योग्यता की बजाए, पच्चीस-पचास लाख रूपये धनराशि की अनिवार्य शर्त हो गर्इ। राजनेताओं और नौकरशाहों ने भूमफियाओं शराब माफियाओं और चिट फण्ड कंपनियों के साथ मिलकर केंद्रीय विश्वविद्यालय और चिकित्सा, इंजीनियंरिंग व प्रबंधन के महाविद्यालय तक खोल उच्च शिक्षा को चौपट करने का काम कर दिया। क्या ऐसी मानसिकता वाले शिक्षा संचालक शिक्षा में गुणवत्ता लाने का काम कर सकते हैं ? उन्होंने तो पैसे से डिग्री बेचने का गोरखधंधा उच्च शिक्षा को मान लिया है। यही मुख्य वजह है कि आज शत-प्रतिशत शिक्षा ज्ञानोन्मुखी होने की बजाए केवल कंपनियां में नौकरी पाकर  अर्थोन्मुखी होकर रह गर्इ है। जो वास्तव में नवाचारी प्रतिभांए हैं, वे तो अर्थाभाव के चलते उच्च शिक्षा से पूरी तरह वंचित ही हो गर्इ ? ऐसे विश्वविद्यालयों से हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दुनिया के दो सौ शीर्शस्थ विवि की कतार में शामिल हो जांए। वे तो पैसा कमाने की होड़ में शामिल हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था "विदक्षता" के दुष्चक्र में फंस गयी है। शैक्षिक प्रसार के नाम पर पूरी  व्यवस्था  को निजी संस्थाओं के हवाले किया जा रहा है। ऐसे में शैक्षिक गुणवत्ता का स्थान मुनाफे ने ले लिया है। येन केन प्रकरेण मुनाफा प्राप्त करना ही संस्थाओं का अंतिम उद्देश्य बन चुका है। कोई भी शराब बनाने वाला, मिठाई बनाने वाला,कबाड़ व्यापारी, माफिया, नेता, अपराधी  देश हित या समाज हित को आड़ बनाकर पैसे के जोर से शिक्षाविद बन जाते है और महज पैसा बनाने के लिए स्कूल कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोल लेते है। लग्जरियस इंफ्रास्ट्रक्चर, फर्जी आंकड़े, फर्जी सूचनाओं एवं दलालो के सहारे कालाबाजारी कर "इन्टेक" पूरा करते है। इस प्रक्रिया में दूर दराज के छात्रों को बहला फुसलाकर उन्हें सुनहरे सपने दिखा कर उन्हें संस्थाओं में एजेंट को मोटी  रकम देकर एडमिट किया जाता है . फिर उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए अकुशल शिक्षक ( हालांकि कागजी  आंकड़ों में ये संस्थान हाई क्वालिफाइड टीचर्स दिखाते है जो अधिकतर उस संस्थान के निरीक्षण के समय भौमिक सत्यापन हेतु मौजूद रहते है और निश्चित रकम लेते है) रखे जाते है।ये अकुशल शिक्षक या तो " फ्रेशर" होते है अल्प जानकारी रखने वाले या कम वेतन पर काम करने को "विवश" लोग। मजे की बात तो यह है कि निजी संस्थाओं में हाई डिग्री होल्डर के ऊपर हमेशा निकले जाने की तलवार लटकती रहती है क्योंकि संस्थान के मालिक को मनोवैज्ञानिक भय होता है की हाई प्रोफाइल टीचर उसके कंट्रोल में नही आएगा और अधिक वेतन की मांग करेगा। इसलिए ये लोग साक्षात्कार के दौरान ही हाई क्वालिफाइड कैंडिडेट को पहले से बाहर कर देते हैं। इस प्रकार एक अकुशलता का चक्र बनता है।  अकुशल शिक्षक के अध्यापन से जो छात्र तैयार होंगे वो भी गुणवत्ता विहीन होंगे और जब ये क्षेत्र में काम करने जाएंगे चाहे वह उत्पादन हो या सेवा क्षेत्र वहाँ  भी गुणवत्ता मानको से नीचे ही रहेगी।  परिणाम यह होगा कि इनके द्वारा
निर्मित उत्पाद या दी गई सेवा राष्ट्रीय/ अंतराष्ट्रीय मानको पर खरी नही उतरेगी और प्रतिद्वंदिता में कही पीछे छूट जाएगी।  इसका असर अर्थव्यवस्था पर पडेगा और अर्थव्यवस्था दबाव में आ जाएगी। पुनश्च बड़े पैमाने पर छंटनी की प्रक्रिया में ये अकुशल लोग भारी मात्र में निकाले जाते है जो एक्सपीरियंस के आधार पर किसी न किसी  निजी शैक्षणिक संस्था में फिर पढ़ाने का कार्य करने लगते है वो भी कम वेतन पर। इस प्रक्रिया में अच्छे शिक्षको को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। यह ठीक उसी तरह से है कि ब्लैक मनी वाइट मनी को चलन से बाहर कर देता है।

यहाँ एक बात और गौर   करने लायक है कि इन संस्थाओं में कार्यरत शिक्षक एवं संस्था प्रमुख के बीच सामंत और दास जैसा रिश्ता होता है शिक्षक चाहे कितना भी प्रशिक्षित और योग्य हो संस्था प्रमुख हमेशा उसे हिकारत से देखता है  कई बार उसे उसकी हैसियत याद करवाता है। सारा का सारा खेल मुनाफे का है कुल मिलाकर चाटुकारिता भ्रष्टाचार के सहारे पूंजीपतियों ने शिक्षा व्यवस्था को अत्यंत दूषित एवं भ्रष्ट  कर दिया है जो पूरे देश में फैले भ्रष्टाचार और बिगड़ी अर्थव्यवस्था का मूल कारण है।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत के राज्य के हर गाँव, कस्बों पहाड़ी इलाका आदिवासी,इलाका, पिछडा इलाका, जहां शिक्षा की समुचित व्यवस्था न हो, जहां बिजली की व्यवस्था न हो, जहां के बच्चे लालटेन के नीचे पढते हों या लालटेन भी नसीब न हो, उनकी शिक्षा और भारत की राजधानी के कान्वेंट में पढने वाले बच्चे की शिक्षा समान हो।   कपडे बदल दीजिये इमारते बदल दीजिये लेकिन किताबें मत बदलिए यह समान शिक्षा पूरे भारत में लागू हो ।  बिना समान शिक्षा के लोकतंत्र मत्स्यतंत्र के समान है।  सरकार का शिक्षा पर नियन्त्रण शैक्षिक सुधारों की दिशा में पहला कदम होगा ।
डॉ पवन विजय (आई पी विश्वविद्यालय से जुड़े कॉलेज में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर)
09540256597

रविवार, 3 जुलाई 2016

बाज़ार में।

बिकने लगी है दुनिया अब तो बाज़ार में।
पैसे हैं जेब में तो आओ बाज़ार में।।

बदली हुई सूरत में हर शक्ल दिखेगी।
देखा नहीं जो अब तक देखो बाज़ार में।।

जो दिन के उजाले में हैं दिख रहे ख़ुदा।
खुलती हैं उनकी गलियाँ शब को बाज़ार में।।

वीरान गुलिस्ताँ में मरघट सी खा़मुशी।
भंवरों ने बेच डाला गुल को बाज़ार में।।

किस्मत तो देखिए कि बाज़ार का मालिक।
नीलाम हो रहा है अब वो बाज़ार में।।

घर जिनके अंधेरों में हर रोज़ हैं डूबे।
उनके ही दम उजालों! तुम हो बाज़ार में।।

पीले कनेर के फूल












पीले कनेर के फूल 
असाढ़ की बारिश
भीगी हुयी गंध।
जी करता है,
अंजुरी भर भर पी लूँ
गीली खुशबुओं वाली भाप।
और चुका दूँ सारी किश्तें
चक्रवृद्धि ब्याज सी
बरस दर बरस बढ़ती प्यास की।
चूर चूर झर रही
चंद्रमा की धूल, कुरुंजि के फूलों पे
कच्ची पगडंडियों से गुजरती
स्निग्ध रात उतर जाती है।
स्वप्नों की झील में
कंपित जलतरंग, दोलित प्रपात
फूट रहे ताल कहीं राग भैरवी के।
ओह्ह …
यह परदा किसने हटाया ?
कि धूप में पड़ी दरार
घाम में विलुप्त ख्वाब ।
रेत हुयी तुहिन बिंदु
ऐंठती हैं वनलताएं निर्जली प्रदेश में
सूखे काठ सा हुआ मन।
कौन है यवनिका?

डॉ पवन विजय के मुक्तक।





मन पर कितने घाव लगे हैं तुम्ही कहो मैं किसे दिखाऊं।
शब्दों पर भी दांव लगे  हैं तुम्ही  कहो मैं  किसे बताऊँ ।
पीड़ा का   चरणामृत   पीते  कथा  बांच  दी जीवन की
व्यथा कंठ पर पांव रखे है तुम्ही कहो मैं  किसे  सुनाऊँ।



बादल बिजली धरती अम्बर गीला कर बरसातें भींगी,
आपस में कुछ व्यथा कथा कह के दो जोड़ी आँखें भींगी। 
एक ज़माना बीत गया जब चाँद लिपट कर रोया था,
तब से कितने दिन भीगे और जाने कितनी रातें भींगी।



सुमिरन  छूटा   माला  रूठी मनके टूटे जापों में।
आशीषों ने मुँह फेरा तो ठौर मिला अभिशापों में।
गंगा में कर दिया प्रवाहित पुन्यों की बोझिल गठरी,
लो! मैं साझीदार  हुआ   हूँ आज तुम्हारे पापों में।




धूप खिली लाज की सांवरी अब क्या करे।
गंध हुयी अनावृत्त पांखुरी अब क्या करे।
सांकले खुलीं हैं आज सारी वर्जनाओं की,
अधर कांपते  रहे  बांसुरी  अब  क्या करे।


हवाएं मुझसे होकर तुम तलक तो जा रही होंगी
तुम्हारे द्वार पर सावन को फिर बरसा रहीं होंगी।
उन्हें छूकर समझ लेना हृदय की अनकही बातें,
कभी जो कह नहीं पाया वही बतला रही होंगी।

सोमवार, 9 मई 2016

डॉ पवन विजय के मुक्तक



मुक्तक 

  १. 
मैं बांच भागवत देता हूँ तुम मौन में जो कुछ कहती हो।
मैं विश्वरूप बन  जाता  हूँ मेरे आस पास जो रहती हो।
संतापित  मन मेघ बन  गया सुनकर के मल्हारी गीता,
मैं अर्जुन सा हो जाता हूँ  तुम  माधव जैसी लगती हो।


२. 
लहर पर बिछलाती है नाव।
धूप पर  बादल   डाले छाँव।
दिन असाढ़ के भीग रहे जैसे,
तुम्हारे  पायल  वाले  पाँव।।


३. 
पानियों में सिमटती रहीं बिजलियाँ।
मेरे छत पर सुलगती रहीं बदलियाँ।
अबके सावन की बूंदों में है खारापन,
बारिशों को भिगोती रहीं सिसकियाँ।


४. 
स्वाभिमान से  जीना  है तो लाचारी से दूर रहो 
रोटी   दाल  भली है पूड़ी  तरकारी से   दूर रहो 
चैन मिलेगा पैर पसारो जितनी लम्बी चादर है, 
उम्मीदों सपनों  को बेंचते   व्यापारी से दूर रहो