बुधवार, 30 जुलाई 2014

सेन्हुरहवा आम

'सेन्हुरहवा आम' 
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सेन्हुरहवा आम 
कुतरे ललकी ठोंड़ वाला सुग्गा 
कोइल किलहँटा चिरई चिरोमनि 
झब्बे पूंछ वाली गिलहरी। 

सेन्हुरहवा आम 
खाए दादी, बाबा, काकी, काका 
फूआ, फुफ्फा, मामी, मामा 

भईया भउजी अम्मा, बाबू।

सेन्हुरहवा आम
नेरें झूरें गांव जवार के सबन्ह
चबेल्ला चबेल्ली।

सेन्हुरहवा आम
से बनें सिरका, खटाई, अँचार
मुरब्बा, गुरम्मा, ठोकवा और अमावट।

सेन्हुरहवा आम
बारहो महीने रहे 'प्रिजर्व'
पुरखों की जादुई हांडी में।

सेन्हुरहवा आम
विरासत में मिला
पड़बाबा से बाबा को
फिर बाबू को।

आज 'स्लाइस' पीते
या कि कारबाइड में
पकाये गये 'मैंगो' खाते
समझ में आता है
फरक स्वाद का
विरासत और बाजार का।

मैं क्या छोड़ कर जाऊँगा? 

रविवार, 27 जुलाई 2014

बरसो रे बादल हरहरा के बरसो।

बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
सावन में धरती नें
खोल दिये केशराशि 
पोर पोर भिगो देना
अमृत बूंदों से,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
माटी की गंध लिये
नाचती है पुरवा
कांपती उंगलियों से
मालिनी ने छू लिया
देव के ललाट को,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
थिरकती शिप्रा की लहरें
कसमसाते से तटबन्ध
मांझी गीत गाया आज
अधरों ने फिर से,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
++pawan++

हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जी! हम १० साला परम्परा के वारिस बनने से इंकार करते हैं।

हे भारत की जनता के नए सेवक भाई नरेंद्र मोदी !

लोगों में शिकायत है कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला कठपुतली मात्र बन कर रह जाता है। हमने इतिहास में तुर्कों मुगलों के बहादुर शाह जफ़र टाइप से लेकर अंग्रेजों के वायसराय होते हुए डॉ मनमोहन तक के शासक देखें जिनके मुंह में जबान नहीं हुआ करती थी।

आपको चुना। दिल से चुना।

माना कि प्रशासन आप प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करने में लगे हुए हैं और सोशल साइट्स के माध्यम से अपनी बात रख रहें हैं। नगरों की ३० प्रतिशत जनता उसे देख रही है किन्तु ७० प्रतिशत जनता गांवों में है जो आपके ट्विटर और फेसबुक को नहीं पढ़ सकती। वह तो चौपाल लगाती जिसमे रेडिओ चलता है। चुनावो के दौरान सिंह गर्जना सुनने को आदी बनाने वाले हे मौन मोहन सिंह के वारिस जो १० साल से "कम्युनिकेशन गैप" की परम्परा थी कम से कम उसे जारी रखने के लिए वोट नही दिया गया था। आज हर जगह सौगंध मुझे इस मिटटी वाले गीत(जो कि एक करोड़ पति भाट ने पईसे लेकर लिखा होगा ) की जगह एक गांव जवार के कवि (नाम याद नहीं आ रहा ) की पंक्तियाँ हवाओं में तैर रही हैं।

पूँछ उठा के परजा नचलिन,
उछलिन कुदलिन खुस्स।
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राजा अईंली राजा अईंली
राजा कईंली फुस्स।।

इस हवा को महसूस करिये। ये उसी भारत की अवाम की आवाज है जिसने आपकी दहाड़ में अपने स्वाभिमान की गूँज सुनी थी। आज उसे वो आवाज सुनायी नहीं दे रही है। उसे अपनी आवाज वापस चाहिए। उसे आश्वस्ति चाहिए जो उसे पूर्व में " भाइयों बहनों" को सुनकर होती थी। हमें आप पर पूरा भरोसा है। पूरा समर्थन है। हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन १० साला परम्परा के वारिस बनने से इंकार करते हैं।

हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जी उम्मीद है कि आप जनभावनाओं से अवगत होंगे।

…पवन विजय

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

जोगी गोपीचंद हो



































जोगी बाबा आये हैं रे कक्का के हियाँ सिरिंगी बजा रहे ।

तौन आया है अम्मा ? मुन्नू पूछता है। जोदी आया है, हमता तहूँ धुछाय दे ए आजी। जोदिया झोली में भलि के हमते उथाय ले जाई।  छोटा मुन्नू अपनी दादी की गोद में घुट्टी मुट्टी मार के छुप जाता है। 

सारंगी के स्वर ऊंचे होते जा रहे। 

सीता सोचईं अपने मनवा 
मुंदरी कहँवा से गिरी 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
मुंदरी कहँवा से गिरी 
मुंदरी  कहँवा से गिरी 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं

कक्का के दुवारे भीड़ लगी है। औरतें जोगी से भभूत मांग रही तो  बच्चों में भय मिश्रित कौतूहल है। कक्का बोले , अरे सिधा पिसान लेई आउ रे !

जोगी ने अपनी बड़ी बड़ी लाल आँखे खोली पगड़ी ठीक करते हुए एक तरफ का  होंठ बिचुका के बोला " हम गुदरी लेबे मिसिर "   आसमान देखते हुये जोगी हुचक हुचक सारंगी बजाते हुए गाने लगता है। 

माई मोर गुदरिया रे भईले 
जोगी गोपीचंद हो 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
हमरे बुढ़इया  के मोर बेटवा 
तू त जोगी गोपीचंद हो 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
तोहरे  बुढ़इया के दूसर बेटवा 
हम तो जोगी गोपीचंद हो। 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं

लावा मिसिराइन गुदरी। 

औरतों में खुसुर फुसुर।  जा रे बड़की कउनो पुरान धुरान लूगा उठाय ला। बिना गुदरी  लिहे माने ना ई नदिग्गाड़ा। दो तीन पुरानी साड़ियां जोगी के सामने पटक दी  जाती हैं। 

ऐ का मिसिर ? सोक्खे सोक्खे। 

कक्का बोले " मुन्नू के माई अई जा बीस आना ले आवा "  घूँघट के अंदर से भुनभुनाते मुन्नू की अम्मा बीस आने लाकर जोगी के कटोरे में दाल देती है। टन्न टन्न। 

जोगी ने अपने बड़े से झोले में धोतियाँ डाली एक जेब में पईसे। सब समेट समाट कर जैसे ही वह उठने को हुआ भीड़ से एक ढीठ  बच्चे ने कहा  हे जोगी माठा पियाय दा। 

जोगी मुसकाया और सारंगी उठायी 

हे सिरिंगी 
रें रीं 
माठा पीबू 
रां रां रीं रुं 
केतना 
रें  र रां 
दुई लोटा 
रुं रां रां 

बच्चे तालियां बजाने लगते हैं जोगी दूसरा घर देखता है। 





       


गुरुवार, 24 जुलाई 2014

हिंदुत्व: दो मिनट का विमर्श (Hindutva)

मैं धर्म को जीने के तरीके के रूप में देखता हूँ। जो मेरा जीने का तरीका है उसे दुनिया हिंदुत्व के नाम से जानती है। हिंदुत्व को समझने से पहले आप को पोस्ट मॉडर्निटी का कांसेप्ट समझना होगा। आप जितने सरल तरीके से हिंदुत्व को समझना चाहते हैं उतने सरल रूप में समझ सकते हो... 

परहित सरिस धरम नहि भाई। परपीड़ा सम नहि अधमाई। 

आपको जटिल पांडित्य में जाने की भी छूट है। पंडिज्जी पिंडा पारने तक पीछा नहीं छोड़ेंगे। आप ईश्वर को मानें न मानें, किसी को भी ईश्वर मान सकते हैं। खान पान, वेश भूषा, रीति रिवाज व्यक्तिगत रूप से भिन्न हो सकता है। सब कुछ यहाँ है।

दो बातें मुझे खटकती हैं

पहली कि सैद्धांतिक रूप से वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाले महज रसोई और जातियों में सिमटे हैं। जो हिंदुत्व की सबसे बड़ी ताकत थी (द्रवण पात्र ) वही कमजोरी समझी जा रही।

दूसरी हिंदुत्व धीरे धीरे सैन्यीकरण की ओर अग्रसर है। तलवार और कपट के जोर से हिंदुत्व पर निरंतर आघात हुए और हो रहे उसकी प्रतिक्रिया खतरनाक है। मैंने किसी हिन्दू को मिशनरी के रूप में धर्मांतरण कराने का उदाहरण या डरा धमका कर हिन्दू बनाने का कोई उदाहरण नही देखा। सिख धर्म के रूप में पहली प्रतिक्रिया हम देख सकते हैं जिसे बड़ी होशियारी से हिन्दूओं से अलग धर्म के रूप में बताया गया।

मुझे भय इस बात का है कि रिएक्शन करने वाले टुच्चे और गुंडे हैं जो अपने आकाओं को खुश करने के लिए चिल्ल पों मचाते हैं गाली गलौज करते हैं।

रियेक्ट करने वालों का स्तर गुरु गोविन्द सिंह और शिवाजी जैसा होना चाहिए।

गैर हिन्दू धर्मों के विद्वानों को समझना होगा कि धर्म परिवर्तन/ हिन्दुओं के प्रति उपहासात्मक रवैया उनके टुच्चे पन को उघाड़ देता है। साथ ही नफरत के बीज बोता है।

हिन्दू स्वभाव से शांत और प्रेमी होता है। प्रेम ते प्रकट होईं भगवाना। और मैं चाहता हूँ इसके इस स्वभाव के साथ छेड़छाड़ न हो।



शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बलात्कार

यह बात सिर्फ लखनऊ या दिल्ली में हुये बलात्कार की नहीं, कही भी बलात्कार हो उसमें समाज के हर जिम्मेदार तबके/व्यक्ति की सहभागिता रहती है। भारत में भ्रस्टाचार और बलात्कार को अपराध नहीं माना जाता।  भ्रस्टाचार को चतुराई का नाम देकर उसे महिमामंडित किया जाता है उसी तरह बलात्कार को मर्दानगी साबित करने वाला कृत्य बताकर उसे ताकत और इज्जत के जाल में फांस कर रफा दफा करने का प्रयास किया जाता है। चाहे मीडिया में चल रहे ट्रेंड्स/विज्ञापन/फिल्म्स/समाचार हों या समाज एवं राज्य के चलन, हर जगह एक विशेष मानसिकता काम कर रही जो अंततः भ्रस्टाचार या बलात्कार के रूप में प्रस्फुटित होती है। 

बलात्कार जैसे अपराध के लिए माता पिता और शिक्षक ये तीन सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं।  साथ ही पूरक विषय के रूप में राज्य और सम्बंधित एजेंसियां आती हैं। कठोर कानूनों का अभाव, लेट लतीफ़ निर्णय, कानूनी दांवपेच, पीड़िता की समुचित सुरक्षा का अभाव इत्यादि बातें अपराधी के मनोबल को बढ़ाती हैं। समाज में रहने वाला वकील जो किसी बेटी का बाप भी हो सकता है अगर तय करे की वह बलात्कारी का केस नहीं लड़ेगा, समाज तय करे की वह बलात्कारी का बहिष्कार करेगा, माँ बाप भाई बहन बीवी सभी सामूहिक रूप से ऐसे व्यक्तियों से एक झटके में सम्बन्ध तोड़ ले, तभी जाकर इस अपराध पर लगाम लग पायेगा।  बाकी उत्तेजक माहौल से भी निपटा जाय। कामुकता पैदा करने वाले माहौल में कोई भी अनैतिक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित हो सकता है।  जरूरत है की ऐसे लोगों, ऐसी प्रक्रियाओं की लानत मलानत हो।  

अंत में एक बात कहना चाहूँगा।  पेट की आग सारे ज्वलंत मामलो से ज्यादा ज्वलनशील है। रोज की रोटी की हुज्जत में लगे लोगों के पास रोने के लिये ज्यादा वक्त नहीं होता। रोटी के इंतजाम के लिए बड़े से बड़े दुःख पर पत्थर धर कर जाते हुए लोगों को आप जिंदादिल कहिये जज्बे को सलाम करिये या संवेदनहीन कर कर गरियाइये, यह आप का दृष्टिकोण है। निर्भया से पहले वाले मसले बिला गए थे, निर्भया का भी बिला गया और निर्भया के बाद वाले भी बिला जाएंगे। जनांदोलन को बपौती और निजी हितों के लिए इस्तेमाल करने वाले जनांदोलन का  सामूहिक बलात्कार करते हैं। अपना अपना घर देखिये अपने अपने बच्चे देखिये। साथ ही साथ अपने को देखिये। स्व का अवलोकन उम्र भर चलने वाला आंदोलन है और इसकी कमान सिर्फ और सिर्फ आपके हाथों में है।

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ

जमुना पार करते ही बारिश शुरू हो गयी।  हेलमेट उतार दिया।  टिप्प टिप्प झर झर फिर तो कहना ही क्या हरहराती हुयी मंदाकिनी शिव की जटाओं पर। थोड़ी देर बाइक खड़ी कर इधर उधर देखा कोई नहीं था तो लगे  छपकोरिया करने।  मेघ पूरी ताकत के साथ बरस रहे थे।  प्यासी जमुना आँचल भर भर सारी बूंदो को सहेजने में लगी थी और आस पास के पेड़ अपनी पत्तियों और शाखों को फैलाये सारा जल पी जाने को आतुर। 
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तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ-साथ
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अचानक भीगते भीगते अपने खेत में पहुँच गये। देखा भभूती की दुलहिन कछाड़ मारे घुटनों को मोड़े धान लगा रही थी।  साथ में काम करने वालों को ललकारती जा रही थी ज़रा हाली हाली हाथ चलाओ पहँटा लंबा है। कुछ गाती भी जा रही थी..  
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मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी 
एक हाथ लेले हउवे बांस के चंगेरिया 
दुसरके तलवारिया रे छोटी ननदी  
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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सातो रे भइया के एक है दुलरिया 
देखि देखि कईसन बोले ई पापी बोलिया 
कटरिया ज्यों निकारो रे छोटी ननदी 
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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अचानक घुप्प अंधेरा।  छक छक बरसता काला पानी। मेरा छप्पर चूने लगा। हवाएँ तेज।  छप्पर दूसरी जगह से चू रहा।   मूँज वाली खटिया से लेवा समेट की कोशिश। कथरी लेवा समेत कर उस पर बैठ गया।  काला पानी पूरी ताकत के साथ छप्पर पर गिर रहा था। बिजली कड़की दूर किसी के चिल्लाने की आवाज " अरे माई  चिर्री पडी रे गोलारे के घरे पे... भीतिया त भहरान " टाटी से बारिश का झर्रा पूरी देह को तर किये जा रहा । कथरी पूरी गीली हो गई । रात भर भीगता सोच रहा कि हमारा बुद्धू बछवा  कईसे पूँछ दबाये कुड़कुड़ा रहा होगा।  चरनदास की गायें खुले में रहती है कैसे बचेंगी बारिश में।  

रात  भर सोया नहीं धरती से कस्तूरी फट पडी है आस पास उठती सोंधी खुशबू नथुनों से होती हुयी माथे तक पहुँच रही,ऐसा लगा किसी ने माथे पर महकती हथेली रख दी हो । एक भीगा सिमटा अक्स आँखों के सामने आ जा रहा। परवीन गा रही है। 
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बचपने का साथ, फिर एक से दोनों के दुख
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ-साथ

लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे अज़ीब
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ
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उसके काजल से पानी का रंग काला हो गया।  मेघ भी काले हो गए। रात काली हो गयी। 

ओह्ह यह क्या हुआ। 

उसने आँखें खोली सुब्बह हो गयी। 
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साहेब सुबह कब की हो गयी आज का कॉलेजवा नहीं जावोगे।  दूध वाला बाहर चिल्ला रहा था और मैं अभी तय नहीं कर पा रहा था कि जो देख सुन रहा वो ख्वाब है या जो देखा वो।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

एक कजरी गीत (Kajari)

एक कजरी गीत अभी लिखे है । हमारे गांव में इस समय महिलाये झूले पर बैठ कजरी गा रही होंगी। पेंग मारे जा रहे होंगे। हलकी बारिश में भीगे ज्वान नागपंचमी की तैयारी में अखाड़े में आ जुटे होंगे और मैं यहाँ ७०० किलोमीटर दूर कम्प्यूटर तोड़ रहा हूँ। खैर आप लोग लोकभाषा में लिखे इस गीत और भाव को देखिये। 
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हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

अलता टिकुली हम लगइबे 
मंगिया सेनुर से सजइबे, 

हमरे उँगरी में मुनरी पहिनावा पिया

नेहिया देखावा पिया ना
हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

हँसुली देओ तुम गढ़ाई
चाहे केतनौ हो महंगाई,

चलिके  सोनरा से कंगन देवावा पिया
हमका सजावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

बाला सोने के बनवइबे  

पायल चांदी के गढ़इबे,

माथबेनी औ' बेसर बनवावा पिया
झुमकिउ पहिनावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

गऊरी शंकर धाम जइबे
अम्बा मईया के जुड़इबे ,

इही सोम्मार रोट के चढावा पिया
धरम तू निभावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 





सोमवार, 14 जुलाई 2014

सारा पनघट रीत गया।

सब कुछ छूटा धीरे धीरे जीवन ऐसे बीत गया
सागर बनते बनते मन का सारा पनघट रीत गया। 

चाँद पे जा अँटका जो उछला सिक्का अपनी किस्मत का 
वक्त जरा दम ले लेने दे, मैं हारा तू जीत गया। 

ना दरिया में डूबा ना ही बदली से बरसात हुयी
फिर भी जाने कैसे जिस्म का, कतरा कतरा भीग गया।

सच कहने वालों को जबसे भूको मरते देखा है
ज़िंदा रहने की खातिर मैं झूठ बोलना सीख गया।

शुक्रवार, 20 जून 2014

आओ प्यार की भाषा बोलें। आओ हिंदी बोलें।

हिंदी की दशा उस माँ के जैसे हो गयी है जिसे  " थोपा हुआ " कह कर उसे बेघर कर दिया जाता है। तमिल और तेलुगू वालों की एक बात समझ में नहीं आती मुझे कि अंगरेजी बोलने से उनकी भाषायी अस्मिता पर कोई आघात नहीं लगता तो हिंदी बोलने से कैसे लग जाता है। घर में कुत्ता तो  पल जाएगा किन्तु बूढ़ी माँ थोपी हुयी लगती है। हिंदी माने उर्दू, हिंदी माने तमिल, हिंदी माने तेलुगू, कन्नड़, ओड़िया, बंगाली, मैथिली, डोगरी। 

भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाओ को पूर्ण स्वायत्तता  और सम्मान  के साथ लेकर चलने में यदि कोई भाषा समर्थ है तो वो हिंदी ही है। अंगरेजी की प्रकृति दमनकारी है। यह वर्गभेद का अहसास कराती है। मैंने अक्सर देखा कि लोग रुआब जमाने के लिए अंगरेजी गिटपिटाते हैं। 

हिंदी लड़ती  नही ,यह  दिलों को जोड़ती है। 

हिंदी है वही जिसे कहते तमिल तेलुगू, 
सांझी जबान में बसी है हिंद की खुशबू। 

आओ प्यार की भाषा बोलें।  आओ हिंदी बोलें। 


रविवार, 8 जून 2014

गीली खुशबुओं वाली भाप

पीले कनेर के फूल
असाढ़ की बारिश
भीगी हुयी गंध।
जी करता है 
अंजुरी भर भर पी लूँ
गीली खुशबुओं वाली भाप।
और चुका दूँ सारी किश्तें
चक्रवृद्धि ब्याज सी
बरस दर बरस बढ़ती प्यास की।
चूर चूर झर रही
चंद्रमा की धूल, कुरुंजि के फूलों पे
कच्ची पगडंडियों से गुजरती
स्निग्ध रात उतर जाती है।
स्वप्नों की झील में
कंपित जलतरंग, दोलित प्रपात
फूट रहे ताल कहीं राग भैरवी के।
ओह्ह …
यह परदा किसने हटाया ?
कि धूप में पड़ी दरार
घाम में विलुप्त ख्वाब
रेत हुआ मौसम
निर्जल वन में,
सूखे काठ सा मन ।

शनिवार, 7 जून 2014

बात सुनो पछुआ पवन


बात सुनो पछुआ पवन
बात सुनो पछुआ पवन
अर्जन के उत्सव में रहने दो शेष तनिक
रिश्तों की स्नेहिल छुवन
बात सुनो पछुआ पवन
परदेसी पाती के अक्षर में पाने को
घिरते हैं अर्थ कई नयनों में बावरे
दोपहरी ग्रीसम की राहों में टक बांधे
खोले है बनजारे मन के सब घाव रे
अंखियों में पड़ आई झाईं की टीस लिखो
और पढो गीले नयन
बात सुनो पछुआ पवन
पीपल के पत्तों में डोला है सूनापन
पनघट की पाटी पर संझा के पांव पड़े
शहरों ने छीन लिए बेटे जवान सभी
बुढ़िया-से झुके-झुके गुमसुम सब गाँव खड़े
जाओ ना और कोई बेटा तुम छीनकर
लाने का देखो जतन
बात सुनो पछुआ पवन ।

....आचार्य रामपलट दास 


मंगलवार, 11 मार्च 2014

दुलहा भी साले, बलहा भी साले, साले बरतिया वाले

आज मेरे साथ काम करने वाले चिखुरी राम  जी ताजा ताजा बियाह कई के आये है।  जौनपुरै के हैं।  मुझे तीव्र इच्छा थी कि सुबह कलेवा खाते समय मंडवे में गारी  खाये थे कि नही , जब पूछा तो बोले कैसी गाली किसी कि हिम्मत नही कि जो मुझे गाली दे।  मैंने पूछा रात में गरियाये गए थे कि नही ? बोले नही। मुझे समझ में आ गया कि अब ये "गारी" भी रेड डेटा बुक  में आ गयी है। 

जब दुलहा द्वारचार पर आता था खाने आता  था तब गारी गाने की रसम होती थी।  बड़ी मीठी मीठी गारिया महिलाये हाथ हिला हिला घुघुट लेकर गाती थी। 

रात के खाने के समय तो इतने " सीताराम " भजे जाते थे कि क्या कहने।  

सखी गाओ मंगलचार
लागे ला दुवरा के चार 
दुलहा के फूआ बड़ी सिलबिल्ली 
खोजे है बड़का सियार
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दुलहा भी साले 
बलहा भी साले 
साले बरतिया वाले हो कि 
सीताराम से भजो   

सुबह कलेवा खाने  जाता तो एक रसम होती थी " रिसियाने" की।  घर पर अम्मा दादी फूआ सब दुलहे को सिखा कर भेजती थी कि बिना सिकड़ी लिए कलेवा जूठा न करना।  खैर मान मनुव्वल होता।  उसके बाद जइसे ही दुलहेराम दही से मुंह जूठा करते महिलाये बज्जर गारी देना शुरू कर देती 
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जउ न होत हमरे भंइसी के दहिया 
काउ दुलहे खात काउ दुलहे अँचऊता 
माई >>>> खात बहिन >>>>> अँचऊता 

बेचारा दुलहा और सहिबालेराम जल्दी  जल्दी खा कर वहा से निकलने की कोशिश करते पर औरते खेद खेद कर गरियाती थी। 

और सुनने वाले हंस हंस कर लोट पोट। 

सम्बन्धो के पानी में ये गालियाँ गुड जैसे होती थी जो रस घोलने और सम्बन्धो को गाढ़ा करती थी।  
आज सम्बन्ध न तो रसीले रहे न गाढ़े।  इस लिए अब गारी का क्या काम ? सब लोग मॉडर्न हो गए।  ये सब हम जाहिल लोगो का फितूर है जो इसे आज भी याद करते है। 




शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

“बाबा भारती” का डर: आम आदमी पार्टी के जिम्मेदार सदस्यो से कुछ सवाल

अरविन्द केजरीवाल पर मै कुछ कहना नही चाहता था. वह मनमोहन सिह जैसे  एक ईमानदार व्यक्ति है. लेकिन आज जब मैने ये देखा कि वह व्यक्ति 14 फरवरी को भगत सिह के शहादत की सजा वाला दिन सोच करके उसी दिन इस्तीफा देकर खुद को शहीदेआजम  मैचिंग मैचिंग कर रहा है तो रहा नही गया. झूठ बोलने की कोई सीमा तय नही है क्या? या ”आप” इतने बडे मूर्ख है कि यह पता नही कि भगत सिह को सजा 7 अक्टूबर 1930 को सुनायी गयी थी. दिल्ली की जनता की समझ और जागरूकता की दाद देता हू कि उन्होने विकल्प के रूप मे इन लोगो को मौका दिया जो स्वघोषित “आम आदमी” थे. लेकिन अब एक डर समा गया है मुझमे, वही डर जो “हार की जीत” वाले “बाबा भारती” को था.
 मै आम आदमी पार्टी के सभी मेरे मित्रो से पूछता हू

1.क्या बाकी पार्टियो के सदस्य आम आदमी नही होते? मै भाजपा का समर्थन करता हू क्या मै इनके “आम आदमी” के पैरामीटर मे नही आता?
2.“आम आदमी” होने का मतलब आम आदमी पार्टी के समर्थन से ही तय होता है?
3.क्या मुख्यमंत्री आम आदमी होता है? विधायक आम आदमी होता है?
4.“आप” सिर्फ “रायता” फैलाना जानते है?
5.देश या समाज चलता है तो उसके लिये चीजो को सहेजना पडता है उस सहेजने की प्रवृत्ति कब आयेगी “आप” मे?

बहुत सारी बाते है किंतु मेरे कुछ मित्र ऐसे है जिनके लिहाज से मै सार्वजनिक रूप से उन बातो को लिख नही सकता किंतु एक अंतिम बात कहता हू कल मेरे पास सूचना आयी कि इस केजरीवाल जी का निर्देश था कि “शनिवार को पार्टी  के फंड मे हर हाल मे सद्स्य, उनके रिश्तेदार, जानने वाले पैसा जमा करे”. आखिर फंड को कई गुना बढा हुआ दिखाकर इस्तीफे को सही जो दिखाना था. इतनी नौटंकी क्यो भई? खैर नौटंकी ही तो ”आप” का एक्स फैक्टर है. किये रहो. अब “आप” का मुकाबला नरेन्द्र मोदी तो कर नही पायेंगे हा राखी सावंत से सावधान रहियेगा वो ”आप” का डब्बा गोल कर सकती है.

शुभकामनाये 
भगवान सब को सद्बुद्धि दे!


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

मेरी कोशिश जारी है

रोटी दाल चला पाना अब, बहुत बड़ी ऐय्यारी है 
नून तेल की बंदोबस्ती दर्ज़े की फनकारी है। 

घीसू को घर मिला नया, होरी को कर्जा माफी 
इन बातो पर मत जाना ये विज्ञापन सरकारी है। 

पंचायत बैठाई है फिर, बेटो ने बंटवारे पर 
अम्मा को दो रोटी देना किसकी जिम्मेदारी है। 

आग लगी है पानी में, आज सियासी चालों से 
एहतराम के बाद पड़ोसी रामदीन की बारी है।

जुगनू सा ही सही मगर, मैं हूँ विरुद्ध अँधियारो के
तुम आओ ना आओ  लेकिन मेरी कोशिश जारी है।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

दिल ढूंढ लेता है













वीराना हो भला कितना ठिकाना ढूंढ लेता है, 
ग़मों को गुनगुनाने का तराना ढूंढ लेता है। 

कवायद खूब होती है मुझे मायूस करने की,
मगर दिल मुस्कुराने का बहाना ढूंढ लेता है। 

चटखते जेठ के दिन हो या हो बरसात सावन की,
सुलगती चांदनी में फिर महकती रात चंदन सी,

हज़ारों मील लम्बे रास्ते फूलों के कांटों के,
सफर कोई हो मौसम आशिकाना ढूंढ लेता है।

कभी पत्थर सा रहता है कभी पानी सा बहता है,
कभी कुछ बोल देता है कभी खामोश रहता है,

मुहब्बत में अदावत में तन्हाई और महफ़िल में,
तरन्नुम में ग़ज़ल इक शायराना ढूंढ लेता है।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

मोहग्रस्त नारद बनाम बन्दर मीडिया

इस समय मीडिया की अवस्था देखकर मुझे रामायण की एक कथा याद आती है जिसमे नारद एक सुन्दरी विश्वमोहिनी के रूप जाल में फंस कर अपने धर्म से विमुख होकर उसके स्वयंवर में एक उम्मीदवार बन कर दरबार में पहुँच जाते है तथा उसे आकर्षित करने के भाँती भाँती उपाय करते है।  कभी ठुमक कर उसके रास्ते में आ जाते है तो कभी जोर जोर से बोलकर ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करते है।  ठीक यही स्थित आज मीडिया की हो गयी है।  सत्ता सुन्दरी के चक्कर में मीडिया नारद बन गया है तब नारद का मुह बन्दर की तरह था आज मीडिया का मुह "अपाई " हो गया है।
साहब मज़ाल क्या कि केजरीवाल छींक दे और मीडिया उसे प्रसाद समझ कर मुख्या खबर न बना दे।  मैंने पिछले हप्ते का टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बारीकी से अध्ययन किया तो पता चला कि समाचारों में लगभग ५० से ६० प्रतिशत स्थान आ आ पा से जुडी खबरे घेरती है जबकि १५ से २० प्रतिशत स्थान  फ़िल्मी कलाकारों एवं उत्तेजना को समर्पित रहता है। बाकी में विज्ञापन और अन्य खबरे रहती हैं।  उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने जब एक हेल्पलाइन नंबर जारी किया तो सामान्य खबर के तरह नीचे पट्टी पर चला दिया गया जबकि केजरीवाल ने जब यही किया तो बाकायदा सजीव प्रसारण सारे चैनलो पर हुआ और आज टाइम्स ऑफ़ इंडिया की हैडलाइन भी यही खबर बनी।

इन सब बातो से कुछ प्रश्न बनते है

क्या मान लेना चाहिए कि जल जंगल जमीन से जुड़े मुद्दे अब अर्थहीन हो गये ?
क्या मान लेना चाहिए कि सामान्य व्यक्ति की दुश्वारियां अब अर्थहीन हो गयी? 
क्या मान लेना चाहिए कि मीडिया बन्दरत्व को प्राप्त हो गया है?

यदि हाँ तो हमें नये विकल्पों को शिद्दत से ढूंढना होगा और यदि नही तो जो दिख रहा है उसे किस रूप में परिभाषित किया जाय ? समाचार या बंदरबाजी ?

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

इकतीस दिसम्बर की भीगती शाम















इकतीस दिसम्बर की 

भीगती शाम, 
बारिश से धुली हवायें 
और उनमे घुलती बर्फ 
ज़िस्म में उतर जाती है। 
++++++
नि:शब्द सर्द मौसम
बीते दिनों की कहानी
फिर कह जाता है
कुहासे की खिड़की से
एक ख़त फेंक जाता है।
++++++

जिसमें लिखा है
"तुम कैसे हो"
कुछ बूंदे भी पड़ी है
वहीं दस्तखत के साथ

इकतीस दिसम्बर की 
भीगती शाम। 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

जब से बिजुली गयी गांव से सतयुग लौटा है

जब से बिजुली ली गयी गांव से 
समाजवाद लौटा है 
+++++++
टेपरिकाट के आगे.… 
मंगरू मिसिर करीवा चस्मा 
लाल रुमाल जैक्सनवा झटका 
(अब)
मुरई मरचा लगावत है 
मनै मन फगुवा गावत है 
+++++++
टीवी के आगे …
छोटकी काकी पिच्चर देखें
बिसरती से इसनो पौडर लेंवें
(अब)
जोन्हरी के चिरई उड़ावत है
मनै मन कका के गरियावत है
++++++++
किरकेट के आगे.…
जवनके तब पगलाय रहे
मैचवै में अंखिया गड़ाय रहे
(अब)
बाजा में कृषि जगत आवत है
गया भाय लोकगीत गावत है
+++++++++
चूल्हा बरा दुआरे पे
लकड़ी आवे पछवारे से
सुक्खू सोभा जोखू झूरी
घुरहू झुम्मू गाढ़ा सुग्गी
ऊदल पंडा छंगू बोलै
जउ जाई बिजुरिया ठेंगे से
टूट खंभवा ठेंगे से
सरकारी तार सरकारी खाद
लापटपवा टबलेटवा ठेंगे से
सरकारी पईसवा(पिनसिन औ भत्ता) ठेंगे से
++++++++++
बोल बहादुर जै चउरा मईया
जै जै भंईसी जै जै गईया
आपन गाऊं गिराऊ के जै हो
खेत अऊर खरिहान के जै हो
जोगीबीर से बडका गाटा
पीपल पोखर पनघट तलिया
मेंड़ मड़ईया कोलिया ठीहा
दीया बाती लिट्टी चोखा
रस माठा औ' लपसी ठोकवा
कजरी फगुआ चइता बिरहा
पायल छागल पियरी कजरा
आल्हा कीर्तन बन्नी बन्ना
चिल्होर पाती ओक्का बोक्का
मूसर ओखरी चक्की जांता
+++++++++++
नखलऊ डिल्लिया मुर्दाबाद
आपन जांगर जिंदाबाद
डीजल फीजल गै भट्ठा मा
तारा इनारा जिंदाबाद
लोनिया टेक्टर भाड़ में झोंको
हीरा मोती जिंदाबाद
++++++++++++
जै बोल महाबीर बाबा
जै बोल महाबीर बाबा
+++++++++++
जब से बिजुली गयी गांव से
समाजवाद लौटा है

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

"इस्सर बईठ दलिद्दर भागे "

आज के दिन का हमें बहुत इन्तजार रहता था।  जब भी ऊख के खेतों की ओर जाते तो  रसीले गन्ने देख कर उसे तोड़ने की  इच्छा करती किन्तु बाबूजी की हिदायत कि एकादशी से पहले उख तोडना पाप है, याद कर मन मसोस कर रह जाते।  आज के दिन गन्ने को सजाया जाता था और उनके बीच वैदिक रीति से विवाह कराया जाता।  फिर कुछ गन्नो को घर लाकर  उसके रस से ग्राम देवी "चउरा माई" का भोग लगाया जाता था। तत्पश्चात पटीदारों भाई  भैवादों  के साथ  गन्ने का आनंद लिया जाता था।

एकादशी से एक दिन पूर्व सूप की खरीददारी की  जाती थी।  सुबह चार बजे गांव की सारी महिलाये गन्ने से सूप पीटते हुए "इस्सर बईठ दलिद्दर भागे " कहती हुयी घर से खेत तक जाती थी।  हम बच्चो के बीच एक और मिथ (आप इसे बच्चो का सत्य भी कह सकते है ) था कि जिस बच्चे के मुह में दाने या कुछ और हो गया है अगर वो गांव की सबसे बुढ़िया का सूप छीन कर भागे तो बुढ़िया जितनी गाली देगी चेहरे की सुंदरता उतनी ही बढ़ेगी।  यह काम एक बार हमारे भाई नागा ने किया था।  सुबह बात पता चल गयी तो (बच्चे तब झूठ नही बोला करते ) उनकी इतनी पिटाई हुयी कि बेचारे काले से लाल हो गये।  

आज जबकि ग्रेटर नॉएडा में ये बात मैं अपनी बेटी को बता रहा हु अजीब सी टीस मन में उठ रही है।  मन कर रहा है लपक कर गांव जाउ और सुक्खू कका के साथ ढेर सारी ऊखें काट कर लाऊ और चउरा माई को रस पिलाकर सारे गांव के साथ रस में सराबोर हो जाउ।