गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

क्या तुमने बसंत को आँचल से बाँध रखा है?













अधखिले  है गुलमोहर
और कोयल,
मौन प्रतीक्षारत है
फूटे नहीं
बौर आम के,
नए पत्तो के अंगारे
अभी भी
ओस से गीले है,
सांझ ने उड़ेल दिया  
सारा सिन्दूर
ढाक के फूलो में
पर, 
रक्तिम आभा ओझल है 
ओ सखी, 
क्या तुमने बसंत को 
आँचल से बाँध रखा है?

5 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

सांझ ने उड़ेल दिया
सारा सिन्दूर
ढाक के फूलो में
पर,
रक्तिम आभा ओझल है
ओ सखी,
क्या तुमने बसंत को
आँचल से बाँध रखा है?

वाह! सुन्दर बिम्बों के माध्यम से शानदार प्रस्तुतिकरण्।

Kailash Sharma ने कहा…

सांझ ने उड़ेल दिया
सारा सिन्दूर
ढाक के फूलो में
पर,
रक्तिम आभा ओझल है
ओ सखी,
क्या तुमने बसंत को
आँचल से बाँध रखा है?

....बहुत खूब! लाज़वाब अभिव्यक्ति..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

कमल कुमार सिंह (नारद ) ने कहा…

सुन्दर रचना ,
बधाई ,
सादर

ramji ने कहा…

प्यार भरे आँचल में बसंत की खुसबू है

महक से जीवन भर गया

प्रकृत को प्रिय से मिलाने फिर से ,

प्रेम का उपहार लिए ऋतुराज आ गया