बुधवार, 3 दिसंबर 2014

हिंदी का उन्नयन: समस्यायें और समाधान

हिंदी का उन्नयन: समस्यायें और समाधान

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है।  लोकतंत्र में जनमत के आधार पर नीतियां तय की जाती हैं। जो लोग जनप्रतिनिधित्व के इच्छुक होते हैं वह जनता के पास  जाते हैं और जनकल्याण हेतु अपना एजेंडा उनके सम्मुख  रखते हैं।  जिसका एजेंडा जनता को सही लगता है जनता उसे अपना प्रतिनिधि चुन लेती है। जाहिर है इस  व्यवस्था में जनता और जनप्रतिनिधि में व्यापक संवाद होता है। अब सवाल यह उठता है कि संवाद का  माध्यम क्या है? जनभाषा या किसी ऐसे देश की भाषा जिसे जनता समझती ही न हो। अगर सत्ता की भाषा कुछ और है तो इसका मतलब लोकतंत्र है ही नहीं। फिर कौन सा तंत्र हिन्दुस्तान को चला रहा है जहां जनभाषा में संवाद ही नहीं होता। कुछ लोग यह प्रश्न कर  सकते हैं कि जनभाषा के क्या मायने हैं ? इसका उत्तर बिलकुल सरल है। एक ऐसी भाषा जिसे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और अटक से कटक के लोग समझते हों। फिर से यह पूछा जाएगा कि लगभग डेढ़ सौ भाषाओं और साढ़े पांच सौ बोलियाँ जिस देश में  प्रचलित हो वहां कोई एक भाषा क्या हो जिसे लोग समझें ? बात वाजिब है कोस कोस पे बदले पानी चार कोस पे बानी वाले देश में कोई एक भाषा जो सबको समझ में आती हो सभी बोलियों भाषाओं को साथ लेकर चलने में समर्थ हो, को ढूँढना सरल नहीं माना जाता किन्तु ऐसे में क्या यह बात सही है कि कोई विदेशी भाषा थोप दी जाय ?
मैं ज़रा लगभग २३०० साल पीछे एक घटना याद दिलाना चाहूंगा जब देवों के प्रिय अशोक ने जनता के साथ शिलालेखों के माध्यम से संवाद किया था। उन्होंने जनसम्पर्क भाषा का प्रयोग कर अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका तक अपने संदेशो को सफलता पूर्वक जनता तक पहुँचाया। 
इस प्रकार जनभाषा विभिन्न प्रकार के व्यवहारों, यातायात, पर्यटन, संपर्क, विभिन्न सामाजिक कार्यों व प्रयोजनों में सरलता , सहजता,प्रभावपूर्णता और व्यापकता के साथ भावों की समझ और उसके प्रत्युत्तर का सशक्त माध्यम है। इस लिहाज से भारत की भाषाओँ का अवलोकन किया जाय  और अंगरेजी को भी इसमें शामिल कर लिया जाय तो हिंदी ही सबसे लोकप्रिय और सशक्त संपर्क भाषा के रूप में सामने आते है। इतना  ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हिंदी पर्याप्त प्रभावशाली भाषा के रूप में उभर कर आती है। जब १५० से अधिक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में यह पढ़ाई जाती है। अमेरिका जर्मनी इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया कनाडा मॉरीशस आदि देशो में बेस १.४ करोड़ भारतियों के बीच संपर्क स्थापित करती है और वर्तमान भारत के प्रधानमंत्री द्वारा विश्वपटल पर हिंदी के जरिये लोगों से संपर्क स्थापित करने के सफल प्रयास नई: सन्देश हिंदी को सहज संपर्क भाषा सिद्ध करते है। 
वस्तुतः राजभाषा और राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा का विभेद ही गलत है। जो भाषा तकरीबन सम्पूर्ण राष्ट्र के साथ संवाद करती है वह भाषा ही एक साथ राजभाषा राष्ट्र भाषा और जनभाषा तीनों के रूप में एकसाथ उपयुक्त है। बाकी बोली और परिवेश अलहदा विषय है।  
इसी बात की पुष्टि १८२४ में एलफ़िन्स्टन की अध्यक्षता में बनाये गए शिक्षा पर मिनट करता  है। एलफ़िन्स्टन रिपोर्ट कहती है कि नैतिक और प्राकृतिक वज्ञानों की पुस्तकें 'भारत की आधुनिक भाषाओं' में तैयार करवाई जाये और उन्ही भाषाओं के द्वारा भारत की जनता  शिक्षित किया जाय।  किन्तु एलफ़िन्स्टन के इस प्रस्ताव को 'वार्डन ' ने नकार कर फिल्ट्रेशन  सिद्धांत को प्रस्तुत किया।

दिनकर जी इस बात को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि जिन प्रश्नों को लेकर आज के नेता एवं विचारक बार बार माथा पच्ची कर रहे हैं उसी मुद्दे पर आज से पौने दो सौ साल पहले कैप्टन कैंडी ने पहचाना और भारत  लिए अंग्रेजी भाषा को महत्वहीन बताया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अंगरेजी का जरूरत से जयादा भरोसा करना बेकार है। भारतीयों की शिक्षा के कर्म में अंगरेजी केवल और केवल विषय दे सकती है माध्यम नही बन सकती।  जिस भाषा  शिक्षित  भाषा केवल  सकती है। लेकिन चार्ल्स ग्रांट और मैकाले के कारण कैंडी  रिपोर्ट भी लागू नही हो पायी और अंत में वुड डिस्पैच के माध्यम से फिल्ट्रेशन सिद्धांत को लागू कर दिया गया।  शिक्षा माध्यम की इस द्वैध नीति का परिणाम यह है कि आज तक भारत में शिक्षा का व्यापक प्रसार नही हो पाया।  कोठारी आयोग ने लगभग सवा सौ साल बाद भी उसी नीति पर अपनी मोहर लगा कर आने वाली पीढ़ियों के लिए हिन्दी वाले रास्ते को बंद कर  दिया।

हिंदी को आधुनिकता, विज्ञान, सामाजिक स्तर और समझ में उलझा कर इसके साथ अन्याय किया जा रहा। व्यवहार में हिंदी को लेकर लोगों ने जो समस्याएं व्यक्त की हैं उनको  मैं  बिन्दुवत रख रहा हूँ 
१. हिन्दी के उपयोगिता क्या है ? तात्पर्य यह है कि तथाकथित साक्षात्कार अंगरेजी माध्यम में होता है तो उस जगह हिन्दी से पढ़कर आने वालो को वरीयता नही मिलती इससे सबक लेकर सभी अपने बच्चों को अंगरेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ाने लगते है और अंगरेजी को ज्ञान का पर्याय समझा जाने लगता है।  इस प्रवृत्ति के भयंकर दुष्परिणाम होने लगते है। और हिन्दी धीरे धीरे नेपथ्य में चली जाती है। तो मुद्दे की बात हिन्दी को पढ़ने या हिन्दी माध्यम  में पढ़ने से आम आदमी को क्या मिलेगा? 
२. हिंदी भाषा को लेकर चारो ओर हीनता का माहौल बना दिया गया है।  मीडिया से लेकर फिल्मों तक ऐसा कर दिया गया है जिसमें हिंदी बोलने वाला मसखरा साबित हो जाता है।  हिंदी समाचार  पत्रों की शब्दावलियों  में   में ६०:४० के अनुपात में अंग्रेजी  के शब्दों को घुसेड़ दिया  गया ( उदाहरण के लिए नवभारत टाइम्स )   हैं।  आपको पढ़े लिखे    हिंदी को विशेष ढंग से  नाक के बल से बोलें और अंगरेजी शब्दों का अधिकतम प्रयोग करें। 
३. हिंदी को बाहर से 'इनपुट' नही मिल रहा और जो हिंदी व्यवस्था में बनी है वो लोगों की जरुरत पूरा करने में कठिनाई महसूस कर रही है।  साथ ही उसे विकृत कर अनुपयोगी घोषित करवाने का पूरा पूरा प्रयास किया जा रहा है। 
४. हिंदी भाषा के मानकीकरण पर प्रश्न चिन्ह लगता रहा है। 
५. अनुवाद की भारी समस्या है।  अनुवाद को जानबूझ कर या अल्पज्ञ लोगों को इसमें शामिल कर अनुवाद को कठिन बोलचाल से दूर एवं मजाक बना दिया जाता है। भाषा को भावों के आधार पर अनुवाद करने की बजाय 'मच्छिकाम प्रमाणं ' की तकनीक का प्रयोग किया जाता है।  इसका उदाहरण संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में मिलता है।  जब स्टील प्लांट का अनुवाद इस्पाती पौधे के रूप में किया जाता है वहीँ हिंदी अपनी दुर्दशा से रूबरू हो जाती है। 
६. हिन्दी प्रकाशन की उपेक्षा भी हिन्दी के राष्ट्र भाषा बनने में रुकावट है। 
७. दक्षिण भारत की भाषाओं को उत्तर में यथोचित सम्मान न मिलना भी हिंदी को सम्पूर्ण भारत स्वीकृत  न मिलने का कारण बनता है। 
८.  हिंदी में स्वयंसेवको की अत्यंत कमी है।  प्रूफ रीडिंग की बात हो या अनुवाद की हिन्दी को बिना शुल्क लिए सेवा करने वाले बहुत थोड़े हैं। 
उपर्युक्त समस्याएं आधारभूत हैं।  इन प्रश्नों के उत्तर और समाधान में ही हिंदी का विकास , प्रसार निहित है। समाधान निम्न लिखित रूप में प्रस्तुत हूँ। 

१. हिंदी की उपयोगिता, उसमें कामकाज और रोटी रोजगार  सुस्पष्ट नीति बनें। 
२. मीडिया मनोरंजन उद्योग में 'मिक्स्ड लैंग्वेज' के प्रयोग पर नियमन हो।  २ से ५ प्रतिशत स्वाभाविक भाषायी लेन  देन  के अलावा सारे घुसेड़े शब्द   हिंदी को   कुचलते हैं।   
३. बाहरी भाषा के शब्दों को यदि वे चलन में हों तो उन्हें मौलिक स्वरुप में ही प्रयोग में लाना चाहिए।  जैसे रेलगाड़ी को लौहपथगामिनी लिखने की जरूरत नही। 
४. हिंदी में अनुवाद और  मानकीकरण  हेतु प्रभावकारी समिति बने और इन समितियों की गुणवत्ता की निगरानी और लक्ष्यपूर्ति का कड़ाई से ध्यान दिया जाय। ६० दशक में इस विषय पर शंभूरत्न त्रिपाठी, नगेन्द्र, रामधारी सिंह दिनकर आदि द्वारा अत्यंत मौलिक कार्य किये गए थे जिसे बाद में ठप कर दिया गया। 
५. हिंदी भाषी क्षेत्रों में एक दक्षिण की क्षेत्रीय भाषा का  अध्यापन अनिवार्य कर  दिया जाय। 
६. समस्त अधिकारियों और नेताओं  से अपने बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़वाने का शपथ पत्र भरवाया जाय। 
७. जो व्यक्ति जिस भाषा में कौशल पूर्वक कार्य करने में समर्थ हो उसे उसी में कार्य करने दिया जाय। 
८. हिंदी भाषा में विश्व स्तरीय अकादमिक सामग्री की उपलब्धि सौ प्रतिशत सुनिश्चित हो। 
९. मानक भाषा के रूप में अंग्रेजी को ख़त्म किया जाय। 
१० क़ानून और शिक्षा में हिंदी के प्रयोग को वरीयता मिले। 
११. हिंदी में दवाईयों के नाम, लेबल  और बैंक में भी हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाय। 
इस प्रकार हिंदी का गौरव  उसकी गुणवत्ता से आम जन मानस से परिचित कराकर पूरे देश में इसकी स्वीकार्यता के  एहसास को सरकार तक पहुंचाकर  हम हिंदी को शीर्ष पर पहुंचा सकेंगे। 

डॉ पवन विजय


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

भूमंडलीकरण के अजगर ने बाजार के सहारे हमारी लोक संस्कृति को निगल लिया है।

अगहनी अरहर फूली है। पीली पंखुड़ियों की संगत नम खेतों में पके धान खूब दे रहे हैं।


अरहर के फूलो पे उतरी /कार्तिक की पियराई सांझ ।
लौटे वंशी के स्वर /बन की गंध समेटे /सिंदूरी बादल से /चम्पई हुयी दिशाएं 
हलधर के हल पर उतरी /थकी हुयी मटमैली सांझ।

बजड़ी, तिल, पटसन और पेड़ी वाली ऊख के खेतों को देख कर करेजा जुड़ा जाता है। पोखर की तली में बुलबुले छोड़ते शैवालों जैसे हम बच्चों के मन में भी खुशियों के बुलबुले उठते है आखिर दीवाली का त्यौहार जो आने वाला है। बँसवारी के उस पार बड़े ताल में डूबता सूरज धीरे धीरे पूरे गाँव को सोने में सान देता है।

आलू की बुवाई की तैयारियां चल रही हैं। भईया मिट्टी और पसीने से सने हेंगा घेर्राते हुये बैलों के साथ आते दिखाई देते हैं। मैं दौड़ कर उनके हाथ से 'पिटना' ले लेता हूँ। कई दिनों से मेरा बल्ला सिरी लोहार के यहाँ बन रहा है तब तक क्रिकेट खेलने के लिए उस 'पिटने' से ही काम चला रहा हूँ। पीछे पीछे छटंका और झोन्नर कहार भी आ रहे है। झोन्नर हल चलाते हैं और छटंका हराई में दाना बोती जाती हैं। अम्मा जल्दी से उनके लिए मीठा पानी की व्यवस्था करती हैं।

झोन्नर गुणा भाग करते है 'इस बार दिवाली में पीपल वाले बरम बाबा को सिद्ध करूँगा।' छटंका चुटकी काटती है 'उस बरम को मऊवाली तेली के दूकान में भेज देना बरम दूकान की रक्सा करेगा ई सारे बलॉक वाले उसका पईसा खा जाते हैं।' फिर दोनों हो हो हो कर हँसते है। तभी बड़के बाबू इनारा से आते हैं नऊछी से हाथ पोंछते बोले " का हो राजू सबेरे जल्दी उठि जाया अन्तरदेसी में भइकरा भोरहरे पहुंचे के लिखे रहेन।" भईया सिर हिला देते हैं।

कालि बाबू अईहै ना? हम अम्मा से पूछते हैं। अम्मा हमें कोरां में लेकर माथा चूम लेती हैं। 
यह परदेसियों के घर वापस लौटने का बखत है।

फूटी मन में फुलझड़िया पूरण होगी आस,
परदेसी पिऊ आ गए गोरी छुए अकास।



मतोली कोहार खांचा भर दियली, कोसा, घंटी, खिलौना, गुल्लक लिए दरवाजे बइठे हैं। बच्चों की रूचि बार बार घंटी बजाने और मिटटी के खिलौनों को देखने और छूने में है। बीच बीच में मतोली डपट लगाते जा रहे हां हां गदेला लोगन खेलौना जादा छू छा जिनि करा टूटि जाये । आवा हे मलिकिनीया हाली हाली लेई देई ला लम्मे लम्मे बांटे के बा। अम्मा दियली वगैरह लेकर उसे सिराने चली जाती हैं। मतोली का नाती खेत में धान के बोझ गिनने गया है। ग्रेजुएशन के दौरान समाजशास्त्री वाईजर की 'जजमानी प्रथा' पढ़ने से पहले ही इस किसिम की परंपरा से परिचय हो गया था।

सड़क पर प्रत्येक मोटर रुक रही है कोई न कोई परदेसिया उतर रहा है। हमारे गांव से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या सात गुजरता है। सड़क से होकर एक शारदा सहायक नहर मेरे गांव समेत कई गांवों को जोड़ती है। जैसे ही किसी के यहाँ का कोई नहर पर आता दिखाई देता है घर के सारे बच्चे दौड़ लगा देते हैं।

बड़े बाबूजी बरधा बाँध रहे लेकिन आँख कान सड़क की ओर है। मन ही मन बुदबुदाते जा रहे 'आजुकालि बसिया के कौनो निस्चित समे नाई रहिग। भेनसारे से दस बजिग अबे आयेन नाई।' अचानक उत्तर प्रदेश परिवहन की एक बस रूकती है। भईया चिल्ला उठते हैं ' बाबू आई गयेन'। हम में जो जहाँ था जो काम कर रहा था सब छोड़ कर नहर की और अपनी पूरी ताकत के साथ भागा हर कोई जल्दी से पिताजी के पास पहुँच कर बैग और सामान लेना चाहता था।

पूरे घर में रौशनी फ़ैल गयी थी। सबके चेहरे जगमगाने लगे। गुड और घी के अग्निहोत्री सुगंध वातावरण में संतुष्टि और समृद्धि के भाव लिए मन में खुशियाँ भरने लगती है।


अग्निहोत्र के बाद दियलियों को प्रकाशित किया जाता है। बड़के बाबू सारा निर्वाह करते हैं और हम सब उनका अनुसरण। पूजा के पश्चात परसाध। बड़े भईया घूरे पर जमराज के यहाँ दिया जलाने जाते हैं फिर सारे खेतों में दिया रखा जाता है। गौरीशंकर और चौरा धाम को भी दिए गए हैं। सबका ख्याल। आज के दिन हर कोने उजाला भेजने की कोशिश है। बिना पड़ाके के कैसी दीवाली। बच्चालाल के बम्म का जवाब एटमबम से देना है। सरगबान सीसी में डाल खूब छुड़ाये जा रहे। बहन को चुटपुटिया और छुड़छुड़ी वाले पटाखे दिए है हैं। कुछ कल दगाने के लिए बचा के रख लिए जाते हैं।

दसो दिशाओं में घुली भीनी-भीनी गंध,
कण-कण पुलकित हो उठे लूट रहे आनंद।

आज के दिन सबको सूरन (जमींकन्द) खाना है। जो नहीं खायेगा वो अगले जनम में छछूंदर बनता है ऐसा दादी कहती थी। खाना पीना के बाद हम बच्चे विद्या जगाने के लिए किताब कापी लेकर बैठ जाते। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किये गए कार्यों का असर पूरे साल बना रहता है। रात में कजरौटा से ताजा काजर आँख में अम्मा लगाती थीं। फिर दीवाली के उजाले आँखों में बसाये हम सूरज के उजाले में आँख खोलते। 

दीवाली के अगले दिन पूरा आकाश एकदम नीला दिखाई देता। हम बच्चे दियली इकठ्ठा करते फिर उससे तराजू बनाते। क्या दिन थे जब हमारी परम्पराएँ हमें जीवन देती थीं। बाज़ार हमारी जरूरतों को पूरा करता था उन्हें बढ़ाता नहीं था। क्या दिन थे जब थोड़ी सी तनखाह में सबके पेट और मन भर जाते थे। क्या दिन थे जब परिवार माने ढेर सारे रिश्ते होते थे। क्या दिन थे जब मिठाईयां घर पर बनती थी। क्या दिन थे जब सब लोग अपने थे।

दीवाली ने कर दिया ज्योतिर्मय संसार,
सबके आँगन में खिले सुख समृद्धि अपार।

सच तो यह है कि दीवाली धन से ज्यादा आपसी प्रेम, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर आधारित त्योहार है ।गोवर्धन पूजा गोरू बछेरू के पालन पोषण और पर्वतो के संरक्षण से सम्बन्धित है। दीपोत्सव के धार्मिक निहितार्थ सामाजिक व्यवस्था और अध्यात्मिक उन्नति मे अत्यंत सहायक है । सभी मित्रो से करबद्ध निवेदन है कि प्रतीको को इतना महत्व ना दे कि किरदार ही बौना हो जाय।

भूमंडलीकरण के अजगर ने बाजार के सहारे हमारी लोक संस्कृति को निगल लिया है।अघासुर के वध की जरुरत है।


गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बड़भागी होकर आया हूँ।

धुली धूप और खिली जुन्हाई गाँव से लेकर आया हूँ, 
अम्बर भर आशीष लिए मैं माँ से मिलकर आया हूँ। 

कच्ची मिट्टी कच्चे पानी से ही फसलें पकती हैं, 
बाबा की यह बात पुरानी गाँठ बाँध कर लाया हूँ।


सात रंग के  बादल जब अमृत रस बरसाते हैं, 
सरसों के फूलों के रस गुड से मीठे हो जाते हैं। 

सूरज की थैली से जुगनू लिए उजाले फिरते हैं ,
मौसम की झोली से मैं भी कुछ दाने ले आया हूँ। 

मैनें देखा खेतों में खुशियों की बुआई होती है, 
मैनें देखा हर घर में रिश्तों की चिनाई होती है।  

श्रम के स्वेदकणों से मैनें अंचलगीत महकते देखे,
गाँव की माटी माथे रख बड़भागी होकर आया हूँ। 

 

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

मोरी जमुना जुड़इहें ना।

आज  डी एन डी पुल से  यमुना का जो मनोहारी रूप देखा रहा नही गया।  बाइक खड़ी  कर नीचे कछार में  कूद गया।  ठंडी जमुन जलधार को हथेली में लिया माथे लगाया। हल्की हल्की फुआर पड़ रही थी। कछार से निकल कर जब कॉलेज के लिए चला तो कुछ पंक्तियाँ अपने आप फूटने लगी जो आपके सामने हैं। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

मद्धिम मद्धिम जल बरसइहो 
मोरी जमुना अघइहें ना।  

कदम के नीचे श्याम खड़े हैं 
मुरली अधर लगाये  

बंसिया बाज रही बृंदाबन
मधुबन सुध बिसराये 

हौले हौले पवन चलइहो 
मोरी जमुना लहरिहें  ना।  

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

रस बरसइहो बरसाने में 
भीजें राधा रानी 

गोपी ग्वाल धेनु बन भीजें 
भीजें नन्द की रानी 

झिर झिर झिर झिर बुन्द गिरइहौ 
मोरी जमुना नहइहें ना। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 



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रविवार, 3 अगस्त 2014

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया (kajali)

पिछली लिखी कजली पर मिले प्यार से अभिभूत हूँ। उसे  कविता कोष के लोकगीत में शामिल किया गया है। मुझसे कई मित्रों ने एक और कजली लिखने की फ़रमाईश की थी जिसे आज मैं पूरी कर रहा हूँ।  प्रस्तुत कजली की धुन
पूर्व से अलग है। आनंद लीजियेगा।
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सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

घर में बाटी हम अकेली,
कउनो संगी ना सहेली
पापी पपिहा बोले बीचोबीच अटरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

चारो ओर बदरिया छाई
हरियर आँगन मोर झुराई
सजना पठये नाही कउनो  खबरिया 
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

छानी छप्पर सब चूवेला
देहिया भींज भींज फूलेला
अगिया लागे तोहरी जुलुमी नोकरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।