बुधवार, 3 दिसंबर 2014

हिंदी का उन्नयन: समस्यायें और समाधान

हिंदी का उन्नयन: समस्यायें और समाधान

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है।  लोकतंत्र में जनमत के आधार पर नीतियां तय की जाती हैं। जो लोग जनप्रतिनिधित्व के इच्छुक होते हैं वह जनता के पास  जाते हैं और जनकल्याण हेतु अपना एजेंडा उनके सम्मुख  रखते हैं।  जिसका एजेंडा जनता को सही लगता है जनता उसे अपना प्रतिनिधि चुन लेती है। जाहिर है इस  व्यवस्था में जनता और जनप्रतिनिधि में व्यापक संवाद होता है। अब सवाल यह उठता है कि संवाद का  माध्यम क्या है? जनभाषा या किसी ऐसे देश की भाषा जिसे जनता समझती ही हो। अगर सत्ता की भाषा कुछ और है तो इसका मतलब लोकतंत्र है ही नहीं। फिर कौन सा तंत्र हिन्दुस्तान को चला रहा है जहां जनभाषा में संवाद ही नहीं होता। कुछ लोग यह प्रश्न कर  सकते हैं कि जनभाषा के क्या मायने हैं ? इसका उत्तर बिलकुल सरल है। एक ऐसी भाषा जिसे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और अटक से कटक के लोग समझते हों। फिर से यह पूछा जाएगा कि लगभग डेढ़ सौ भाषाओं और साढ़े पांच सौ बोलियाँ जिस देश में  प्रचलित हो वहां कोई एक भाषा क्या हो जिसे लोग समझें ? बात वाजिब है कोस कोस पे बदले पानी चार कोस पे बानी वाले देश में कोई एक भाषा जो सबको समझ में आती हो सभी बोलियों भाषाओं को साथ लेकर चलने में समर्थ हो, को ढूँढना सरल नहीं माना जाता किन्तु ऐसे में क्या यह बात सही है कि कोई विदेशी भाषा थोप दी जाय ?
मैं ज़रा लगभग २३०० साल पीछे एक घटना याद दिलाना चाहूंगा जब देवों के प्रिय अशोक ने जनता के साथ शिलालेखों के माध्यम से संवाद किया था। उन्होंने जनसम्पर्क भाषा का प्रयोग कर अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका तक अपने संदेशो को सफलता पूर्वक जनता तक पहुँचाया। 
इस प्रकार जनभाषा विभिन्न प्रकार के व्यवहारों, यातायात, पर्यटन, संपर्क, विभिन्न सामाजिक कार्यों प्रयोजनों में सरलता , सहजता,प्रभावपूर्णता और व्यापकता के साथ भावों की समझ और उसके प्रत्युत्तर का सशक्त माध्यम है। इस लिहाज से भारत की भाषाओँ का अवलोकन किया जाय  और अंगरेजी को भी इसमें शामिल कर लिया जाय तो हिंदी ही सबसे लोकप्रिय और सशक्त संपर्क भाषा के रूप में सामने आते है। इतना  ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हिंदी पर्याप्त प्रभावशाली भाषा के रूप में उभर कर आती है। जब १५० से अधिक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में यह पढ़ाई जाती है। अमेरिका जर्मनी इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया कनाडा मॉरीशस आदि देशो में बेस . करोड़ भारतियों के बीच संपर्क स्थापित करती है और वर्तमान भारत के प्रधानमंत्री द्वारा विश्वपटल पर हिंदी के जरिये लोगों से संपर्क स्थापित करने के सफल प्रयास नई: सन्देश हिंदी को सहज संपर्क भाषा सिद्ध करते है। 
वस्तुतः राजभाषा और राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा का विभेद ही गलत है। जो भाषा तकरीबन सम्पूर्ण राष्ट्र के साथ संवाद करती है वह भाषा ही एक साथ राजभाषा राष्ट्र भाषा और जनभाषा तीनों के रूप में एकसाथ उपयुक्त है। बाकी बोली और परिवेश अलहदा विषय है।  
इसी बात की पुष्टि १८२४ में एलफ़िन्स्टन की अध्यक्षता में बनाये गए शिक्षा पर मिनट करता  है। एलफ़िन्स्टन रिपोर्ट कहती है कि नैतिक और प्राकृतिक वज्ञानों की पुस्तकें 'भारत की आधुनिक भाषाओं' में तैयार करवाई जाये और उन्ही भाषाओं के द्वारा भारत की जनता  शिक्षित किया जाय।  किन्तु एलफ़िन्स्टन के इस प्रस्ताव को 'वार्डन ' ने नकार कर फिल्ट्रेशन  सिद्धांत को प्रस्तुत किया।

दिनकर जी इस बात को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि जिन प्रश्नों को लेकर आज के नेता एवं विचारक बार बार माथा पच्ची कर रहे हैं उसी मुद्दे पर आज से पौने दो सौ साल पहले कैप्टन कैंडी ने पहचाना और भारत  लिए अंग्रेजी भाषा को महत्वहीन बताया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अंगरेजी का जरूरत से जयादा भरोसा करना बेकार है। भारतीयों की शिक्षा के कर्म में अंगरेजी केवल और केवल विषय दे सकती है माध्यम नही बन सकती।  जिस भाषा  शिक्षित  भाषा केवल  सकती है। लेकिन चार्ल्स ग्रांट और मैकाले के कारण कैंडी  रिपोर्ट भी लागू नही हो पायी और अंत में वुड डिस्पैच के माध्यम से फिल्ट्रेशन सिद्धांत को लागू कर दिया गया।  शिक्षा माध्यम की इस द्वैध नीति का परिणाम यह है कि आज तक भारत में शिक्षा का व्यापक प्रसार नही हो पाया।  कोठारी आयोग ने लगभग सवा सौ साल बाद भी उसी नीति पर अपनी मोहर लगा कर आने वाली पीढ़ियों के लिए हिन्दी वाले रास्ते को बंद कर  दिया।

हिंदी को आधुनिकता, विज्ञान, सामाजिक स्तर और समझ में उलझा कर इसके साथ अन्याय किया जा रहा। व्यवहार में हिंदी को लेकर लोगों ने जो समस्याएं व्यक्त की हैं उनको  मैं  बिन्दुवत रख रहा हूँ 
. हिन्दी के उपयोगिता क्या है ? तात्पर्य यह है कि तथाकथित साक्षात्कार अंगरेजी माध्यम में होता है तो उस जगह हिन्दी से पढ़कर आने वालो को वरीयता नही मिलती इससे सबक लेकर सभी अपने बच्चों को अंगरेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ाने लगते है और अंगरेजी को ज्ञान का पर्याय समझा जाने लगता है।  इस प्रवृत्ति के भयंकर दुष्परिणाम होने लगते है। और हिन्दी धीरे धीरे नेपथ्य में चली जाती है। तो मुद्दे की बात हिन्दी को पढ़ने या हिन्दी माध्यम  में पढ़ने से आम आदमी को क्या मिलेगा
. हिंदी भाषा को लेकर चारो ओर हीनता का माहौल बना दिया गया है।  मीडिया से लेकर फिल्मों तक ऐसा कर दिया गया है जिसमें हिंदी बोलने वाला मसखरा साबित हो जाता है।  हिंदी समाचार  पत्रों की शब्दावलियों  में   में ६०:४० के अनुपात में अंग्रेजी  के शब्दों को घुसेड़ दिया  गया ( उदाहरण के लिए नवभारत टाइम्स )   हैं।  आपको पढ़े लिखे    हिंदी को विशेष ढंग से  नाक के बल से बोलें और अंगरेजी शब्दों का अधिकतम प्रयोग करें। 
. हिंदी को बाहर से 'इनपुट' नही मिल रहा और जो हिंदी व्यवस्था में बनी है वो लोगों की जरुरत पूरा करने में कठिनाई महसूस कर रही है।  साथ ही उसे विकृत कर अनुपयोगी घोषित करवाने का पूरा पूरा प्रयास किया जा रहा है। 
. हिंदी भाषा के मानकीकरण पर प्रश्न चिन्ह लगता रहा है। 
. अनुवाद की भारी समस्या है।  अनुवाद को जानबूझ कर या अल्पज्ञ लोगों को इसमें शामिल कर अनुवाद को कठिन बोलचाल से दूर एवं मजाक बना दिया जाता है। भाषा को भावों के आधार पर अनुवाद करने की बजाय 'मच्छिकाम प्रमाणं ' की तकनीक का प्रयोग किया जाता है।  इसका उदाहरण संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में मिलता है।  जब स्टील प्लांट का अनुवाद इस्पाती पौधे के रूप में किया जाता है वहीँ हिंदी अपनी दुर्दशा से रूबरू हो जाती है। 
. हिन्दी प्रकाशन की उपेक्षा भी हिन्दी के राष्ट्र भाषा बनने में रुकावट है। 
. दक्षिण भारत की भाषाओं को उत्तर में यथोचित सम्मान मिलना भी हिंदी को सम्पूर्ण भारत स्वीकृत   मिलने का कारण बनता है। 
.  हिंदी में स्वयंसेवको की अत्यंत कमी है।  प्रूफ रीडिंग की बात हो या अनुवाद की हिन्दी को बिना शुल्क लिए सेवा करने वाले बहुत थोड़े हैं। 
उपर्युक्त समस्याएं आधारभूत हैं।  इन प्रश्नों के उत्तर और समाधान में ही हिंदी का विकास , प्रसार निहित है। समाधान निम्न लिखित रूप में प्रस्तुत हूँ। 

. हिंदी की उपयोगिता, उसमें कामकाज और रोटी रोजगार  सुस्पष्ट नीति बनें। 
. मीडिया मनोरंजन उद्योग में 'मिक्स्ड लैंग्वेज' के प्रयोग पर नियमन हो।   से प्रतिशत स्वाभाविक भाषायी लेन  देन  के अलावा सारे घुसेड़े शब्द   हिंदी को   कुचलते हैं।   
. बाहरी भाषा के शब्दों को यदि वे चलन में हों तो उन्हें मौलिक स्वरुप में ही प्रयोग में लाना चाहिए।  जैसे रेलगाड़ी को लौहपथगामिनी लिखने की जरूरत नही। 
. हिंदी में अनुवाद और  मानकीकरण  हेतु प्रभावकारी समिति बने और इन समितियों की गुणवत्ता की निगरानी और लक्ष्यपूर्ति का कड़ाई से ध्यान दिया जाय। ६० दशक में इस विषय पर शंभूरत्न त्रिपाठी, नगेन्द्र, रामधारी सिंह दिनकर आदि द्वारा अत्यंत मौलिक कार्य किये गए थे जिसे बाद में ठप कर दिया गया। 
. हिंदी भाषी क्षेत्रों में एक दक्षिण की क्षेत्रीय भाषा का  अध्यापन अनिवार्य कर  दिया जाय। 
. समस्त अधिकारियों और नेताओं  से अपने बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़वाने का शपथ पत्र भरवाया जाय। 
. जो व्यक्ति जिस भाषा में कौशल पूर्वक कार्य करने में समर्थ हो उसे उसी में कार्य करने दिया जाय। 
. हिंदी भाषा में विश्व स्तरीय अकादमिक सामग्री की उपलब्धि सौ प्रतिशत सुनिश्चित हो। 
. मानक भाषा के रूप में अंग्रेजी को ख़त्म किया जाय। 
१० क़ानून और शिक्षा में हिंदी के प्रयोग को वरीयता मिले। 
११. हिंदी में दवाईयों के नाम, लेबल  और बैंक में भी हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाय। 
इस प्रकार हिंदी का गौरव  उसकी गुणवत्ता से आम जन मानस से परिचित कराकर पूरे देश में इसकी स्वीकार्यता के  एहसास को सरकार तक पहुंचाकर  हम हिंदी को शीर्ष पर पहुंचा सकेंगे। 

डॉ पवन विजय


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

भूमंडलीकरण के अजगर ने बाजार के सहारे हमारी लोक संस्कृति को निगल लिया है।

अगहनी अरहर फूली है। पीली पंखुड़ियों की संगत नम खेतों में पके धान खूब दे रहे हैं।


अरहर के फूलो पे उतरी /कार्तिक की पियराई सांझ ।
लौटे वंशी के स्वर /बन की गंध समेटे /सिंदूरी बादल से /चम्पई हुयी दिशाएं 
हलधर के हल पर उतरी /थकी हुयी मटमैली सांझ।

बजड़ी, तिल, पटसन और पेड़ी वाली ऊख के खेतों को देख कर करेजा जुड़ा जाता है। पोखर की तली में बुलबुले छोड़ते शैवालों जैसे हम बच्चों के मन में भी खुशियों के बुलबुले उठते है आखिर दीवाली का त्यौहार जो आने वाला है। बँसवारी के उस पार बड़े ताल में डूबता सूरज धीरे धीरे पूरे गाँव को सोने में सान देता है।

आलू की बुवाई की तैयारियां चल रही हैं। भईया मिट्टी और पसीने से सने हेंगा घेर्राते हुये बैलों के साथ आते दिखाई देते हैं। मैं दौड़ कर उनके हाथ से 'पिटना' ले लेता हूँ। कई दिनों से मेरा बल्ला सिरी लोहार के यहाँ बन रहा है तब तक क्रिकेट खेलने के लिए उस 'पिटने' से ही काम चला रहा हूँ। पीछे पीछे छटंका और झोन्नर कहार भी आ रहे है। झोन्नर हल चलाते हैं और छटंका हराई में दाना बोती जाती हैं। अम्मा जल्दी से उनके लिए मीठा पानी की व्यवस्था करती हैं।

झोन्नर गुणा भाग करते है 'इस बार दिवाली में पीपल वाले बरम बाबा को सिद्ध करूँगा।' छटंका चुटकी काटती है 'उस बरम को मऊवाली तेली के दूकान में भेज देना बरम दूकान की रक्सा करेगा ई सारे बलॉक वाले उसका पईसा खा जाते हैं।' फिर दोनों हो हो हो कर हँसते है। तभी बड़के बाबू इनारा से आते हैं नऊछी से हाथ पोंछते बोले " का हो राजू सबेरे जल्दी उठि जाया अन्तरदेसी में भइकरा भोरहरे पहुंचे के लिखे रहेन।" भईया सिर हिला देते हैं।

कालि बाबू अईहै ना? हम अम्मा से पूछते हैं। अम्मा हमें कोरां में लेकर माथा चूम लेती हैं। 
यह परदेसियों के घर वापस लौटने का बखत है।

फूटी मन में फुलझड़िया पूरण होगी आस,
परदेसी पिऊ आ गए गोरी छुए अकास।



मतोली कोहार खांचा भर दियली, कोसा, घंटी, खिलौना, गुल्लक लिए दरवाजे बइठे हैं। बच्चों की रूचि बार बार घंटी बजाने और मिटटी के खिलौनों को देखने और छूने में है। बीच बीच में मतोली डपट लगाते जा रहे हां हां गदेला लोगन खेलौना जादा छू छा जिनि करा टूटि जाये । आवा हे मलिकिनीया हाली हाली लेई देई ला लम्मे लम्मे बांटे के बा। अम्मा दियली वगैरह लेकर उसे सिराने चली जाती हैं। मतोली का नाती खेत में धान के बोझ गिनने गया है। ग्रेजुएशन के दौरान समाजशास्त्री वाईजर की 'जजमानी प्रथा' पढ़ने से पहले ही इस किसिम की परंपरा से परिचय हो गया था।

सड़क पर प्रत्येक मोटर रुक रही है कोई न कोई परदेसिया उतर रहा है। हमारे गांव से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या सात गुजरता है। सड़क से होकर एक शारदा सहायक नहर मेरे गांव समेत कई गांवों को जोड़ती है। जैसे ही किसी के यहाँ का कोई नहर पर आता दिखाई देता है घर के सारे बच्चे दौड़ लगा देते हैं।

बड़े बाबूजी बरधा बाँध रहे लेकिन आँख कान सड़क की ओर है। मन ही मन बुदबुदाते जा रहे 'आजुकालि बसिया के कौनो निस्चित समे नाई रहिग। भेनसारे से दस बजिग अबे आयेन नाई।' अचानक उत्तर प्रदेश परिवहन की एक बस रूकती है। भईया चिल्ला उठते हैं ' बाबू आई गयेन'। हम में जो जहाँ था जो काम कर रहा था सब छोड़ कर नहर की और अपनी पूरी ताकत के साथ भागा हर कोई जल्दी से पिताजी के पास पहुँच कर बैग और सामान लेना चाहता था।

पूरे घर में रौशनी फ़ैल गयी थी। सबके चेहरे जगमगाने लगे। गुड और घी के अग्निहोत्री सुगंध वातावरण में संतुष्टि और समृद्धि के भाव लिए मन में खुशियाँ भरने लगती है।


अग्निहोत्र के बाद दियलियों को प्रकाशित किया जाता है। बड़के बाबू सारा निर्वाह करते हैं और हम सब उनका अनुसरण। पूजा के पश्चात परसाध। बड़े भईया घूरे पर जमराज के यहाँ दिया जलाने जाते हैं फिर सारे खेतों में दिया रखा जाता है। गौरीशंकर और चौरा धाम को भी दिए गए हैं। सबका ख्याल। आज के दिन हर कोने उजाला भेजने की कोशिश है। बिना पड़ाके के कैसी दीवाली। बच्चालाल के बम्म का जवाब एटमबम से देना है। सरगबान सीसी में डाल खूब छुड़ाये जा रहे। बहन को चुटपुटिया और छुड़छुड़ी वाले पटाखे दिए है हैं। कुछ कल दगाने के लिए बचा के रख लिए जाते हैं।

दसो दिशाओं में घुली भीनी-भीनी गंध,
कण-कण पुलकित हो उठे लूट रहे आनंद

आज के दिन सबको सूरन (जमींकन्द) खाना है। जो नहीं खायेगा वो अगले जनम में छछूंदर बनता है ऐसा दादी कहती थी। खाना पीना के बाद हम बच्चे विद्या जगाने के लिए किताब कापी लेकर बैठ जाते। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किये गए कार्यों का असर पूरे साल बना रहता है। रात में कजरौटा से ताजा काजर आँख में अम्मा लगाती थीं। फिर दीवाली के उजाले आँखों में बसाये हम सूरज के उजाले में आँख खोलते। 

दीवाली के अगले दिन पूरा आकाश एकदम नीला दिखाई देता। हम बच्चे दियली इकठ्ठा करते फिर उससे तराजू बनाते। क्या दिन थे जब हमारी परम्पराएँ हमें जीवन देती थीं। बाज़ार हमारी जरूरतों को पूरा करता था उन्हें बढ़ाता नहीं था। क्या दिन थे जब थोड़ी सी तनखाह में सबके पेट और मन भर जाते थे। क्या दिन थे जब परिवार माने ढेर सारे रिश्ते होते थे। क्या दिन थे जब मिठाईयां घर पर बनती थी। क्या दिन थे जब सब लोग अपने थे

दीवाली ने कर दिया ज्योतिर्मय संसार,
सबके आँगन में खिले सुख समृद्धि अपार

सच तो यह है कि दीवाली धन से ज्यादा आपसी प्रेम, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर आधारित त्योहार है ।गोवर्धन पूजा गोरू बछेरू के पालन पोषण और पर्वतो के संरक्षण से सम्बन्धित है। दीपोत्सव के धार्मिक निहितार्थ सामाजिक व्यवस्था और अध्यात्मिक उन्नति मे अत्यंत सहायक है । सभी मित्रो से करबद्ध निवेदन है कि प्रतीको को इतना महत्व ना दे कि किरदार ही बौना हो जाय।

भूमंडलीकरण के अजगर ने बाजार के सहारे हमारी लोक संस्कृति को निगल लिया है।अघासुर के वध की जरुरत है।


गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बड़भागी होकर आया हूँ।

धुली धूप और खिली जुन्हाई गाँव से लेकर आया हूँ, 
अम्बर भर आशीष लिए मैं माँ से मिलकर आया हूँ। 

कच्ची मिट्टी कच्चे पानी से ही फसलें पकती हैं, 
बाबा की यह बात पुरानी गाँठ बाँध कर लाया हूँ।


सात रंग के  बादल जब अमृत रस बरसाते हैं, 
सरसों के फूलों के रस गुड से मीठे हो जाते हैं। 

सूरज की थैली से जुगनू लिए उजाले फिरते हैं ,
मौसम की झोली से मैं भी कुछ दाने ले आया हूँ। 

मैनें देखा खेतों में खुशियों की बुआई होती है, 
मैनें देखा हर घर में रिश्तों की चिनाई होती है।  

श्रम के स्वेदकणों से मैनें अंचलगीत महकते देखे,
गाँव की माटी माथे रख बड़भागी होकर आया हूँ। 

 

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

मोरी जमुना जुड़इहें ना।

आज  डी एन डी पुल से  यमुना का जो मनोहारी रूप देखा रहा नही गया।  बाइक खड़ी  कर नीचे कछार में  कूद गया।  ठंडी जमुन जलधार को हथेली में लिया माथे लगाया। हल्की हल्की फुआर पड़ रही थी। कछार से निकल कर जब कॉलेज के लिए चला तो कुछ पंक्तियाँ अपने आप फूटने लगी जो आपके सामने हैं। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

मद्धिम मद्धिम जल बरसइहो 
मोरी जमुना अघइहें ना।  

कदम के नीचे श्याम खड़े हैं 
मुरली अधर लगाये  

बंसिया बाज रही बृंदाबन
मधुबन सुध बिसराये 

हौले हौले पवन चलइहो 
मोरी जमुना लहरिहें  ना।  

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

रस बरसइहो बरसाने में 
भीजें राधा रानी 

गोपी ग्वाल धेनु बन भीजें 
भीजें नन्द की रानी 

झिर झिर झिर झिर बुन्द गिरइहौ 
मोरी जमुना नहइहें ना। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 



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रविवार, 3 अगस्त 2014

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया (kajali)

पिछली लिखी कजली पर मिले प्यार से अभिभूत हूँ। उसे  कविता कोष के लोकगीत में शामिल किया गया है। मुझसे कई मित्रों ने एक और कजली लिखने की फ़रमाईश की थी जिसे आज मैं पूरी कर रहा हूँ।  प्रस्तुत कजली की धुन
पूर्व से अलग है। आनंद लीजियेगा।
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सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

घर में बाटी हम अकेली,
कउनो संगी ना सहेली
पापी पपिहा बोले बीचोबीच अटरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

चारो ओर बदरिया छाई
हरियर आँगन मोर झुराई
सजना पठये नाही कउनो  खबरिया 
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

छानी छप्पर सब चूवेला
देहिया भींज भींज फूलेला
अगिया लागे तोहरी जुलुमी नोकरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।


गुरुवार, 31 जुलाई 2014

"गुड़ुई" : नाग पंचमी

नाग पंचमी को हमारे यहां जौनपुर में   "गुड़ुई" भी कहा जाता है। गुड़ुई के एक दिन पहले हम लोग बेर की टहनियों को काट कर उसे हरे नीले पीले लाल रंगो से रंगते हैं । बहनें कपडे की गुड़िया बनातीं।  साल भर के पुराने कपडे लत्ते से सुंदर सुंदर गुड़िया बनाई जाती। गुड़िया बनाना एक सामूहिक प्रयास होता था। इस बहानें अम्मा अपनी गुड़िया बनाने की परम्परात्मक  कला का हस्तांतरण बहनों को करतीं। हम सब भाई इस फिराक में रहते कि मेरी बहन की गुड़िया सबसे सुंदर होनी चाहिए। गुड़िया सजाने के सारे सामान जुटाए जाते। गुड़िया तैयार होने के बाद एक बार बच्चों में फौजदारी तय होती थी कि तलैया तक कौन गुड़िया ले जायेगा। गुड़िया को खपड़े पर लिटा कर अगले दिन के लिए उसे ढँक दिया जाता था। उसके बाद  गोरू बछेरू को नहला धुला कर उनकी सींगों पर  करिखा लगा कर गुरिया उरिया पहना कर चमाचम किया जाता था। 

गुड़ुई के दिन ' पंडा वाले तारा' पर हम सब भाई बहिन जाते थे। बहिने गीत गाते जोन्हरी की 'घुघुरी' लिए ताल के पास पहुँचती थी। वहाँ जैसे ही गुड़िया तालाब में फेंकी जाती हम  सब डंडा ले   गुड़िया  पर पटर पटर करने लगते। इस खेल में एक नियम था कि डंडे को आधे से तोड़ कर एक ही डुबकी में गुड़िया सहित डंडे को तालाब में गाड़ देना है। जो यह कर लेता वह राजा। खैर इस चक्कर में हम सब सांस रोकने का अच्छा अभ्यास कर लेते।

 डाली पर झूला पड़ा है।  बहिनें गा रहीं 

हंडिया में दाल बा गगरिया में चाउर.. 
हे अईया जाय द कजरिया बिते आउब.... 

कोल्हुआ वाली फुआ ने कहा .... हे बहिनी अब उठान गावो चलें घर में बखीर बनावे के है। 

उठान शुरू 

तामे के तमेहड़ी में घुघुरि झोहराई लोई ....

इधर हम सब अखाड़े पहुँच जाते। मेरे तीन प्रिय खेल कुश्ती, कूड़ी (लम्बी कूद ) और कबड्डी। कूड़ी में उमाशंकर यादव के बेटवा नन्हे का कोई जोड़ नही था। ज्वान उड़ता है । वह दूसरे गांव का है । हमारे यहाँ के लड़के क्रिकेट खेलते थे इसलिए नन्हे से कोई कूड़ी में जीत नही पाता। हाँ कुश्ती को हमारे गाँव में श्रेय बच्चेलाल  पहलवान को  को जाता है। बच्चेलाल के एक दर्जन बच्चे थे। वह अपने बच्चों को खूब दांव पेच सिखाते थे। धीरे धीरे गाँव में कुश्ती लोकप्रिय हो गयी।  मैं अपने बाबू (ताउजी)  से कुश्ती सीखता था। गुड़ुई वाले दिन कुश्ती होनी होती है । सारा गाँव जवार के लोग जुटते हैं। जोड़ पे जोड़ भिड़ते भिड़ाये जाते हैं। 

मार मार धर धर
पटक पटक 
चित कर चित कर 
ले ले ले 

फिर हो हो हो हो हाथ उठकर विजेता को लोग कंधे पर बैठा लेते। अचानक गाँव के सबसे ज्यादा हल्ला मचाऊ मोटे पेलवान सुग्गू ने मेरा हाथ उठाकर कहा 'जो कोई लड़ना चाहे रिंकू पहलवान से लड़ सकता है!' बाबू सामने बैठे थे। मैंने भी ताव में आकर कह दिया ' जो  दूध  माई का लाल हो आ जाए'  मेरी उमर लगभग पंद्रह बरिस रही होगी उस समय मेरी उमर के सभी लड़के मुझसे मार खा चुके थे सो कोई सामने नही आया। अचानक कोहरौटी से हीरालाल पेलवान ताल ठोकता आया बोला मेरी उमर रिंकू से ज्यादा है लेकिन अगर ये पेट  के बल भी गिरा देंगे तो पूरे कोहरान की ओर से हारी मान लूँगा। सुग्गु ने हल्ला मचाया। अखाड़े में हम दोनों आ डटे। हीरा मुझे झुला झुला फेंकता।  बाबू की आखों में चिंता के डोरे दिखने लगे। हीरा ने मेरी कमर पकड़ी और मेरा सर नीचे पैर ऊपर करने लगा। जैसे ही मेरा पैर ऊपर गया मैंने पूरी ताकत से हीरा के दोनों कान बजा दिए। हीरा गिरा धड़ाम से। मैंने धोबीपाट मारा।  सुग्गु हो हो हो करते मुझे कंधे पर लाद लिए। फिर तो नागपंचमी वाला दिन मेरा। 

अखाड़े से वापस आने के बाद अम्मा ने बखीर(चावल और गुड से बनता है ) बनाया था साथ में बेढ़नी (दालभरी पूड़ी) की रोटी भी खाई गयी । रात में गोईंठा (उड़द से बनता है ) भी बना था जिसको बासी  खाने का मजा ही कुछ और होता था। 

शाम को कजरी का कार्यक्रम मंदिर में नागपूजा  और ये सब बारिश की बूंदाबांदी में।

शाम की चौपाल में 

रस धीरे धीरे बरसे बदरवा ना.……  हो बरसे बदरवा ना.……  हो  बरसे बदरवा ना.……  कि रस धीरे धीरे बरसे बदरवा ना।
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बंसिया बाज रही बृंदाबन टूटे सिव संकर के ध्यान। .... टूटे सिव संभो  के ध्यान.... 

सुक्खू काका जोर जोर से आलाप ले  रहे। सारा गाँव झूमता है । अमृत रस पीकर धरती की कोख हरी हो गयी है। 

यही तो नागपंचमी का जादू है। 

यह आंदोलन भी विकल्प की तलाश करेगा

कोई भी आंदोलन किसी नेता की बपौती नहीं है। हाँ नेता  सही चैनल देने में मदद करता है यदि वही नीर क्षीर विवेक वाला है तो। आंदोलन अपना नेतृत्व तलाश  लेता है। 

स्वतंत्रता के बाद आंदोलनकारी के रूप में पहले एंटी कांग्रेस ताकतें सक्रिय रही चाहे वह लोहिया के नेतृत्व में हो या जेपी के। लेकिन आंदोलन में सबसे ज्यादा मार जनता को ही पड़ती है। 

1975, 1989 और 2011  में देश बड़े आंदोलन देख चुका है। विगत दो आंदोलनों की अपेक्षा 2011 में हुये आंदोलन  प्रकृति कुछ अलग सी रही। इस बार यह आंदोलन पूरी तरह से जनता के  हाँथ रहा। इस आंदोलन के चेहरे के रूप में   बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और  अरविन्द केजरीवाल सामने आये।  ये लोग  इस भ्रम में थे कि जनता उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व से अभिभूत हो उनके एक इशारे पर सरकार  ईंट बजा देगी। मैं इसे भरम ही कहूँगा क्योंकि जनता की अपनी आकांक्षाएं और उम्मीदें होती है। वह उन उम्मीदों की पूर्ती के लिये सड़कों पर आती है। ऐसे में खुदमुख्तारी भारी पड़ती है आंदोलन और व्यक्तिगत दोनों।

बाबा रामदेव पर लाठीचार्ज और उनका महिला के वेश में वहाँ से भागने का आंदोलनकारियों और  जनता में नकारात्मक सन्देश लेकर गया। पूरी उम्मीदों और जनता का स्थानांतरण अन्ना आंदोलन में देखने को मिला। अन्ना पूरी तरह अरविन्द और मैनेजिंग कमेटी पर निर्भर थे। बार बार आंदोलन और सही दिशा के अभाव में जनता उनसे छिटकने लगी। इस बात को अरविन्द केजरीवाल  ने भांप लिया और अन्ना से अलग होकर पार्टी बना ली। लोगों में गुस्सा तो था ही सो एक बार दिल्ली में केजरीवाल को भी मौक़ा मिला लेकिन केजरीवाल अपनी व्यक्तिगत कमजोरियों से उबर न सके और जनता फिर से विकल्पहीन। इस दौरान गुजरात से उसे  सकारात्मक सन्देश मिल रहे थे। बाबा रामदेव ने पर्दे के पीछे से मोदी की बैंकिंग करनी शुरू कर दी थी। जनता ने चुनावों के दौरान मोदी को विकल्प मान लिया और मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए।  

अब जनता की उम्मीदें और उस पर मोदी की चुप्पी। छात्रों ने फिर अंगरेजी के मुद्दे पर माहौल को  गरमा दिया है। यह आंदोलन भी विकल्प की तलाश करेगा अगर मौजूदा विकल्प जल्द ही न  चेता।  जनता से ज्यादा दिन नही खेला जा सकता।
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बुधवार, 30 जुलाई 2014

सेन्हुरहवा आम

'सेन्हुरहवा आम' 
++++
सेन्हुरहवा आम 
कुतरे ललकी ठोंड़ वाला सुग्गा 
कोइल किलहँटा चिरई चिरोमनि 
झब्बे पूंछ वाली गिलहरी। 

सेन्हुरहवा आम 
खाए दादी, बाबा, काकी, काका 
फूआ, फुफ्फा, मामी, मामा 

भईया भउजी अम्मा, बाबू।

सेन्हुरहवा आम
नेरें झूरें गांव जवार के सबन्ह
चबेल्ला चबेल्ली।

सेन्हुरहवा आम
से बनें सिरका, खटाई, अँचार
मुरब्बा, गुरम्मा, ठोकवा और अमावट।

सेन्हुरहवा आम
बारहो महीने रहे 'प्रिजर्व'
पुरखों की जादुई हांडी में।

सेन्हुरहवा आम
विरासत में मिला
पड़बाबा से बाबा को
फिर बाबू को।

आज 'स्लाइस' पीते
या कि कारबाइड में
पकाये गये 'मैंगो' खाते
समझ में आता है
फरक स्वाद का
विरासत और बाजार का।

मैं क्या छोड़ कर जाऊँगा? 

रविवार, 27 जुलाई 2014

बरसो रे बादल हरहरा के बरसो।

बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
सावन में धरती नें
खोल दिये केशराशि 
पोर पोर भिगो देना
अमृत बूंदों से,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
माटी की गंध लिये
नाचती है पुरवा
कांपती उंगलियों से
मालिनी ने छू लिया
देव के ललाट को,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
थिरकती शिप्रा की लहरें
कसमसाते से तटबन्ध
मांझी गीत गाया आज
अधरों ने फिर से,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
++pawan++

हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जी! हम १० साला परम्परा के वारिस बनने से इंकार करते हैं।

हे भारत की जनता के नए सेवक भाई नरेंद्र मोदी !

लोगों में शिकायत है कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला कठपुतली मात्र बन कर रह जाता है। हमने इतिहास में तुर्कों मुगलों के बहादुर शाह जफ़र टाइप से लेकर अंग्रेजों के वायसराय होते हुए डॉ मनमोहन तक के शासक देखें जिनके मुंह में जबान नहीं हुआ करती थी।

आपको चुना। दिल से चुना।

माना कि प्रशासन आप प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करने में लगे हुए हैं और सोशल साइट्स के माध्यम से अपनी बात रख रहें हैं। नगरों की ३० प्रतिशत जनता उसे देख रही है किन्तु ७० प्रतिशत जनता गांवों में है जो आपके ट्विटर और फेसबुक को नहीं पढ़ सकती। वह तो चौपाल लगाती जिसमे रेडिओ चलता है। चुनावो के दौरान सिंह गर्जना सुनने को आदी बनाने वाले हे मौन मोहन सिंह के वारिस जो १० साल से "कम्युनिकेशन गैप" की परम्परा थी कम से कम उसे जारी रखने के लिए वोट नही दिया गया था। आज हर जगह सौगंध मुझे इस मिटटी वाले गीत(जो कि एक करोड़ पति भाट ने पईसे लेकर लिखा होगा ) की जगह एक गांव जवार के कवि (नाम याद नहीं आ रहा ) की पंक्तियाँ हवाओं में तैर रही हैं।

पूँछ उठा के परजा नचलिन,
उछलिन कुदलिन खुस्स।
++
राजा अईंली राजा अईंली
राजा कईंली फुस्स।।

इस हवा को महसूस करिये। ये उसी भारत की अवाम की आवाज है जिसने आपकी दहाड़ में अपने स्वाभिमान की गूँज सुनी थी। आज उसे वो आवाज सुनायी नहीं दे रही है। उसे अपनी आवाज वापस चाहिए। उसे आश्वस्ति चाहिए जो उसे पूर्व में " भाइयों बहनों" को सुनकर होती थी। हमें आप पर पूरा भरोसा है। पूरा समर्थन है। हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन १० साला परम्परा के वारिस बनने से इंकार करते हैं।

हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जी उम्मीद है कि आप जनभावनाओं से अवगत होंगे।

…पवन विजय

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

जोगी गोपीचंद हो



































जोगी बाबा आये हैं रे कक्का के हियाँ सिरिंगी बजा रहे ।

तौन आया है अम्मा ? मुन्नू पूछता है। जोदी आया है, हमता तहूँ धुछाय दे ए आजी। जोदिया झोली में भलि के हमते उथाय ले जाई।  छोटा मुन्नू अपनी दादी की गोद में घुट्टी मुट्टी मार के छुप जाता है। 

सारंगी के स्वर ऊंचे होते जा रहे। 

सीता सोचईं अपने मनवा 
मुंदरी कहँवा से गिरी 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
मुंदरी कहँवा से गिरी 
मुंदरी  कहँवा से गिरी 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं

कक्का के दुवारे भीड़ लगी है। औरतें जोगी से भभूत मांग रही तो  बच्चों में भय मिश्रित कौतूहल है। कक्का बोले , अरे सिधा पिसान लेई आउ रे !

जोगी ने अपनी बड़ी बड़ी लाल आँखे खोली पगड़ी ठीक करते हुए एक तरफ का  होंठ बिचुका के बोला " हम गुदरी लेबे मिसिर "   आसमान देखते हुये जोगी हुचक हुचक सारंगी बजाते हुए गाने लगता है। 

माई मोर गुदरिया रे भईले 
जोगी गोपीचंद हो 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
हमरे बुढ़इया  के मोर बेटवा 
तू त जोगी गोपीचंद हो 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
तोहरे  बुढ़इया के दूसर बेटवा 
हम तो जोगी गोपीचंद हो। 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं

लावा मिसिराइन गुदरी। 

औरतों में खुसुर फुसुर।  जा रे बड़की कउनो पुरान धुरान लूगा उठाय ला। बिना गुदरी  लिहे माने ना ई नदिग्गाड़ा। दो तीन पुरानी साड़ियां जोगी के सामने पटक दी  जाती हैं। 

ऐ का मिसिर ? सोक्खे सोक्खे। 

कक्का बोले " मुन्नू के माई अई जा बीस आना ले आवा "  घूँघट के अंदर से भुनभुनाते मुन्नू की अम्मा बीस आने लाकर जोगी के कटोरे में दाल देती है। टन्न टन्न। 

जोगी ने अपने बड़े से झोले में धोतियाँ डाली एक जेब में पईसे। सब समेट समाट कर जैसे ही वह उठने को हुआ भीड़ से एक ढीठ  बच्चे ने कहा  हे जोगी माठा पियाय दा। 

जोगी मुसकाया और सारंगी उठायी 

हे सिरिंगी 
रें रीं 
माठा पीबू 
रां रां रीं रुं 
केतना 
रें  र रां 
दुई लोटा 
रुं रां रां 

बच्चे तालियां बजाने लगते हैं जोगी दूसरा घर देखता है। 





       


गुरुवार, 24 जुलाई 2014

हिंदुत्व: दो मिनट का विमर्श (Hindutva)

मैं धर्म को जीने के तरीके के रूप में देखता हूँ। जो मेरा जीने का तरीका है उसे दुनिया हिंदुत्व के नाम से जानती है। हिंदुत्व को समझने से पहले आप को पोस्ट मॉडर्निटी का कांसेप्ट समझना होगा। आप जितने सरल तरीके से हिंदुत्व को समझना चाहते हैं उतने सरल रूप में समझ सकते हो... 

परहित सरिस धरम नहि भाई। परपीड़ा सम नहि अधमाई। 

आपको जटिल पांडित्य में जाने की भी छूट है। पंडिज्जी पिंडा पारने तक पीछा नहीं छोड़ेंगे। आप ईश्वर को मानें न मानें, किसी को भी ईश्वर मान सकते हैं। खान पान, वेश भूषा, रीति रिवाज व्यक्तिगत रूप से भिन्न हो सकता है। सब कुछ यहाँ है।

दो बातें मुझे खटकती हैं

पहली कि सैद्धांतिक रूप से वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाले महज रसोई और जातियों में सिमटे हैं। जो हिंदुत्व की सबसे बड़ी ताकत थी (द्रवण पात्र ) वही कमजोरी समझी जा रही।

दूसरी हिंदुत्व धीरे धीरे सैन्यीकरण की ओर अग्रसर है। तलवार और कपट के जोर से हिंदुत्व पर निरंतर आघात हुए और हो रहे उसकी प्रतिक्रिया खतरनाक है। मैंने किसी हिन्दू को मिशनरी के रूप में धर्मांतरण कराने का उदाहरण या डरा धमका कर हिन्दू बनाने का कोई उदाहरण नही देखा। सिख धर्म के रूप में पहली प्रतिक्रिया हम देख सकते हैं जिसे बड़ी होशियारी से हिन्दूओं से अलग धर्म के रूप में बताया गया।

मुझे भय इस बात का है कि रिएक्शन करने वाले टुच्चे और गुंडे हैं जो अपने आकाओं को खुश करने के लिए चिल्ल पों मचाते हैं गाली गलौज करते हैं।

रियेक्ट करने वालों का स्तर गुरु गोविन्द सिंह और शिवाजी जैसा होना चाहिए।

गैर हिन्दू धर्मों के विद्वानों को समझना होगा कि धर्म परिवर्तन/ हिन्दुओं के प्रति उपहासात्मक रवैया उनके टुच्चे पन को उघाड़ देता है। साथ ही नफरत के बीज बोता है।

हिन्दू स्वभाव से शांत और प्रेमी होता है। प्रेम ते प्रकट होईं भगवाना। और मैं चाहता हूँ इसके इस स्वभाव के साथ छेड़छाड़ न हो।



शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बलात्कार

यह बात सिर्फ लखनऊ या दिल्ली में हुये बलात्कार की नहीं, कही भी बलात्कार हो उसमें समाज के हर जिम्मेदार तबके/व्यक्ति की सहभागिता रहती है। भारत में भ्रस्टाचार और बलात्कार को अपराध नहीं माना जाता।  भ्रस्टाचार को चतुराई का नाम देकर उसे महिमामंडित किया जाता है उसी तरह बलात्कार को मर्दानगी साबित करने वाला कृत्य बताकर उसे ताकत और इज्जत के जाल में फांस कर रफा दफा करने का प्रयास किया जाता है। चाहे मीडिया में चल रहे ट्रेंड्स/विज्ञापन/फिल्म्स/समाचार हों या समाज एवं राज्य के चलन, हर जगह एक विशेष मानसिकता काम कर रही जो अंततः भ्रस्टाचार या बलात्कार के रूप में प्रस्फुटित होती है। 

बलात्कार जैसे अपराध के लिए माता पिता और शिक्षक ये तीन सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं।  साथ ही पूरक विषय के रूप में राज्य और सम्बंधित एजेंसियां आती हैं। कठोर कानूनों का अभाव, लेट लतीफ़ निर्णय, कानूनी दांवपेच, पीड़िता की समुचित सुरक्षा का अभाव इत्यादि बातें अपराधी के मनोबल को बढ़ाती हैं। समाज में रहने वाला वकील जो किसी बेटी का बाप भी हो सकता है अगर तय करे की वह बलात्कारी का केस नहीं लड़ेगा, समाज तय करे की वह बलात्कारी का बहिष्कार करेगा, माँ बाप भाई बहन बीवी सभी सामूहिक रूप से ऐसे व्यक्तियों से एक झटके में सम्बन्ध तोड़ ले, तभी जाकर इस अपराध पर लगाम लग पायेगा।  बाकी उत्तेजक माहौल से भी निपटा जाय। कामुकता पैदा करने वाले माहौल में कोई भी अनैतिक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित हो सकता है।  जरूरत है की ऐसे लोगों, ऐसी प्रक्रियाओं की लानत मलानत हो।  

अंत में एक बात कहना चाहूँगा।  पेट की आग सारे ज्वलंत मामलो से ज्यादा ज्वलनशील है। रोज की रोटी की हुज्जत में लगे लोगों के पास रोने के लिये ज्यादा वक्त नहीं होता। रोटी के इंतजाम के लिए बड़े से बड़े दुःख पर पत्थर धर कर जाते हुए लोगों को आप जिंदादिल कहिये जज्बे को सलाम करिये या संवेदनहीन कर कर गरियाइये, यह आप का दृष्टिकोण है। निर्भया से पहले वाले मसले बिला गए थे, निर्भया का भी बिला गया और निर्भया के बाद वाले भी बिला जाएंगे। जनांदोलन को बपौती और निजी हितों के लिए इस्तेमाल करने वाले जनांदोलन का  सामूहिक बलात्कार करते हैं। अपना अपना घर देखिये अपने अपने बच्चे देखिये। साथ ही साथ अपने को देखिये। स्व का अवलोकन उम्र भर चलने वाला आंदोलन है और इसकी कमान सिर्फ और सिर्फ आपके हाथों में है।

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ

जमुना पार करते ही बारिश शुरू हो गयी।  हेलमेट उतार दिया।  टिप्प टिप्प झर झर फिर तो कहना ही क्या हरहराती हुयी मंदाकिनी शिव की जटाओं पर। थोड़ी देर बाइक खड़ी कर इधर उधर देखा कोई नहीं था तो लगे  छपकोरिया करने।  मेघ पूरी ताकत के साथ बरस रहे थे।  प्यासी जमुना आँचल भर भर सारी बूंदो को सहेजने में लगी थी और आस पास के पेड़ अपनी पत्तियों और शाखों को फैलाये सारा जल पी जाने को आतुर। 
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तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ-साथ
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अचानक भीगते भीगते अपने खेत में पहुँच गये। देखा भभूती की दुलहिन कछाड़ मारे घुटनों को मोड़े धान लगा रही थी।  साथ में काम करने वालों को ललकारती जा रही थी ज़रा हाली हाली हाथ चलाओ पहँटा लंबा है। कुछ गाती भी जा रही थी..  
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मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी 
एक हाथ लेले हउवे बांस के चंगेरिया 
दुसरके तलवारिया रे छोटी ननदी  
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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सातो रे भइया के एक है दुलरिया 
देखि देखि कईसन बोले ई पापी बोलिया 
कटरिया ज्यों निकारो रे छोटी ननदी 
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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अचानक घुप्प अंधेरा।  छक छक बरसता काला पानी। मेरा छप्पर चूने लगा। हवाएँ तेज।  छप्पर दूसरी जगह से चू रहा।   मूँज वाली खटिया से लेवा समेट की कोशिश। कथरी लेवा समेत कर उस पर बैठ गया।  काला पानी पूरी ताकत के साथ छप्पर पर गिर रहा था। बिजली कड़की दूर किसी के चिल्लाने की आवाज " अरे माई  चिर्री पडी रे गोलारे के घरे पे... भीतिया त भहरान " टाटी से बारिश का झर्रा पूरी देह को तर किये जा रहा । कथरी पूरी गीली हो गई । रात भर भीगता सोच रहा कि हमारा बुद्धू बछवा  कईसे पूँछ दबाये कुड़कुड़ा रहा होगा।  चरनदास की गायें खुले में रहती है कैसे बचेंगी बारिश में।  

रात  भर सोया नहीं धरती से कस्तूरी फट पडी है आस पास उठती सोंधी खुशबू नथुनों से होती हुयी माथे तक पहुँच रही,ऐसा लगा किसी ने माथे पर महकती हथेली रख दी हो । एक भीगा सिमटा अक्स आँखों के सामने आ जा रहा। परवीन गा रही है। 
++
बचपने का साथ, फिर एक से दोनों के दुख
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ-साथ

लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे अज़ीब
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ
++
उसके काजल से पानी का रंग काला हो गया।  मेघ भी काले हो गए। रात काली हो गयी। 

ओह्ह यह क्या हुआ। 

उसने आँखें खोली सुब्बह हो गयी। 
++
साहेब सुबह कब की हो गयी आज का कॉलेजवा नहीं जावोगे।  दूध वाला बाहर चिल्ला रहा था और मैं अभी तय नहीं कर पा रहा था कि जो देख सुन रहा वो ख्वाब है या जो देखा वो।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

एक कजरी गीत (Kajari)

एक कजरी गीत अभी लिखे है । हमारे गांव में इस समय महिलाये झूले पर बैठ कजरी गा रही होंगी। पेंग मारे जा रहे होंगे। हलकी बारिश में भीगे ज्वान नागपंचमी की तैयारी में अखाड़े में आ जुटे होंगे और मैं यहाँ ७०० किलोमीटर दूर कम्प्यूटर तोड़ रहा हूँ। खैर आप लोग लोकभाषा में लिखे इस गीत और भाव को देखिये। 
+++

हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

अलता टिकुली हम लगइबे 
मंगिया सेनुर से सजइबे, 

हमरे उँगरी में मुनरी पहिनावा पिया

नेहिया देखावा पिया ना
हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

हँसुली देओ तुम गढ़ाई
चाहे केतनौ हो महंगाई,

चलिके  सोनरा से कंगन देवावा पिया
हमका सजावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

बाला सोने के बनवइबे  

पायल चांदी के गढ़इबे,

माथबेनी औ' बेसर बनवावा पिया
झुमकिउ पहिनावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

गऊरी शंकर धाम जइबे
अम्बा मईया के जुड़इबे ,

इही सोम्मार रोट के चढावा पिया
धरम तू निभावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 





सोमवार, 14 जुलाई 2014

सारा पनघट रीत गया।

सब कुछ छूटा धीरे धीरे जीवन ऐसे बीत गया
सागर बनते बनते मन का सारा पनघट रीत गया। 

चाँद पे जा अँटका जो उछला सिक्का अपनी किस्मत का 
वक्त जरा दम ले लेने दे, मैं हारा तू जीत गया। 

ना दरिया में डूबा ना ही बदली से बरसात हुयी
फिर भी जाने कैसे जिस्म का, कतरा कतरा भीग गया।

सच कहने वालों को जबसे भूको मरते देखा है
ज़िंदा रहने की खातिर मैं झूठ बोलना सीख गया।

शुक्रवार, 20 जून 2014

आओ प्यार की भाषा बोलें। आओ हिंदी बोलें।

हिंदी की दशा उस माँ के जैसे हो गयी है जिसे  " थोपा हुआ " कह कर उसे बेघर कर दिया जाता है। तमिल और तेलुगू वालों की एक बात समझ में नहीं आती मुझे कि अंगरेजी बोलने से उनकी भाषायी अस्मिता पर कोई आघात नहीं लगता तो हिंदी बोलने से कैसे लग जाता है। घर में कुत्ता तो  पल जाएगा किन्तु बूढ़ी माँ थोपी हुयी लगती है। हिंदी माने उर्दू, हिंदी माने तमिल, हिंदी माने तेलुगू, कन्नड़, ओड़िया, बंगाली, मैथिली, डोगरी। 

भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाओ को पूर्ण स्वायत्तता  और सम्मान  के साथ लेकर चलने में यदि कोई भाषा समर्थ है तो वो हिंदी ही है। अंगरेजी की प्रकृति दमनकारी है। यह वर्गभेद का अहसास कराती है। मैंने अक्सर देखा कि लोग रुआब जमाने के लिए अंगरेजी गिटपिटाते हैं। 

हिंदी लड़ती  नही ,यह  दिलों को जोड़ती है। 

हिंदी है वही जिसे कहते तमिल तेलुगू, 
सांझी जबान में बसी है हिंद की खुशबू। 

आओ प्यार की भाषा बोलें।  आओ हिंदी बोलें। 


रविवार, 8 जून 2014

गीली खुशबुओं वाली भाप

पीले कनेर के फूल
असाढ़ की बारिश
भीगी हुयी गंध।
जी करता है 
अंजुरी भर भर पी लूँ
गीली खुशबुओं वाली भाप।
और चुका दूँ सारी किश्तें
चक्रवृद्धि ब्याज सी
बरस दर बरस बढ़ती प्यास की।
चूर चूर झर रही
चंद्रमा की धूल, कुरुंजि के फूलों पे
कच्ची पगडंडियों से गुजरती
स्निग्ध रात उतर जाती है।
स्वप्नों की झील में
कंपित जलतरंग, दोलित प्रपात
फूट रहे ताल कहीं राग भैरवी के।
ओह्ह …
यह परदा किसने हटाया ?
कि धूप में पड़ी दरार
घाम में विलुप्त ख्वाब
रेत हुआ मौसम
निर्जल वन में,
सूखे काठ सा मन ।

शनिवार, 7 जून 2014

बात सुनो पछुआ पवन


बात सुनो पछुआ पवन
बात सुनो पछुआ पवन
अर्जन के उत्सव में रहने दो शेष तनिक
रिश्तों की स्नेहिल छुवन
बात सुनो पछुआ पवन
परदेसी पाती के अक्षर में पाने को
घिरते हैं अर्थ कई नयनों में बावरे
दोपहरी ग्रीसम की राहों में टक बांधे
खोले है बनजारे मन के सब घाव रे
अंखियों में पड़ आई झाईं की टीस लिखो
और पढो गीले नयन
बात सुनो पछुआ पवन
पीपल के पत्तों में डोला है सूनापन
पनघट की पाटी पर संझा के पांव पड़े
शहरों ने छीन लिए बेटे जवान सभी
बुढ़िया-से झुके-झुके गुमसुम सब गाँव खड़े
जाओ ना और कोई बेटा तुम छीनकर
लाने का देखो जतन
बात सुनो पछुआ पवन ।

....आचार्य रामपलट दास 


मंगलवार, 11 मार्च 2014

दुलहा भी साले, बलहा भी साले, साले बरतिया वाले

आज मेरे साथ काम करने वाले चिखुरी राम  जी ताजा ताजा बियाह कई के आये है।  जौनपुरै के हैं।  मुझे तीव्र इच्छा थी कि सुबह कलेवा खाते समय मंडवे में गारी  खाये थे कि नही , जब पूछा तो बोले कैसी गाली किसी कि हिम्मत नही कि जो मुझे गाली दे।  मैंने पूछा रात में गरियाये गए थे कि नही ? बोले नही। मुझे समझ में आ गया कि अब ये "गारी" भी रेड डेटा बुक  में आ गयी है। 

जब दुलहा द्वारचार पर आता था खाने आता  था तब गारी गाने की रसम होती थी।  बड़ी मीठी मीठी गारिया महिलाये हाथ हिला हिला घुघुट लेकर गाती थी। 

रात के खाने के समय तो इतने " सीताराम " भजे जाते थे कि क्या कहने।  

सखी गाओ मंगलचार
लागे ला दुवरा के चार 
दुलहा के फूआ बड़ी सिलबिल्ली 
खोजे है बड़का सियार
+++++
दुलहा भी साले 
बलहा भी साले 
साले बरतिया वाले हो कि 
सीताराम से भजो   

सुबह कलेवा खाने  जाता तो एक रसम होती थी " रिसियाने" की।  घर पर अम्मा दादी फूआ सब दुलहे को सिखा कर भेजती थी कि बिना सिकड़ी लिए कलेवा जूठा न करना।  खैर मान मनुव्वल होता।  उसके बाद जइसे ही दुलहेराम दही से मुंह जूठा करते महिलाये बज्जर गारी देना शुरू कर देती 
++++
जउ न होत हमरे भंइसी के दहिया 
काउ दुलहे खात काउ दुलहे अँचऊता 
माई >>>> खात बहिन >>>>> अँचऊता 

बेचारा दुलहा और सहिबालेराम जल्दी  जल्दी खा कर वहा से निकलने की कोशिश करते पर औरते खेद खेद कर गरियाती थी। 

और सुनने वाले हंस हंस कर लोट पोट। 

सम्बन्धो के पानी में ये गालियाँ गुड जैसे होती थी जो रस घोलने और सम्बन्धो को गाढ़ा करती थी।  
आज सम्बन्ध न तो रसीले रहे न गाढ़े।  इस लिए अब गारी का क्या काम ? सब लोग मॉडर्न हो गए।  ये सब हम जाहिल लोगो का फितूर है जो इसे आज भी याद करते है। 




शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

“बाबा भारती” का डर: आम आदमी पार्टी के जिम्मेदार सदस्यो से कुछ सवाल

अरविन्द केजरीवाल पर मै कुछ कहना नही चाहता था. वह मनमोहन सिह जैसे  एक ईमानदार व्यक्ति है. लेकिन आज जब मैने ये देखा कि वह व्यक्ति 14 फरवरी को भगत सिह के शहादत की सजा वाला दिन सोच करके उसी दिन इस्तीफा देकर खुद को शहीदेआजम  मैचिंग मैचिंग कर रहा है तो रहा नही गया. झूठ बोलने की कोई सीमा तय नही है क्या? या ”आप” इतने बडे मूर्ख है कि यह पता नही कि भगत सिह को सजा 7 अक्टूबर 1930 को सुनायी गयी थी. दिल्ली की जनता की समझ और जागरूकता की दाद देता हू कि उन्होने विकल्प के रूप मे इन लोगो को मौका दिया जो स्वघोषित “आम आदमी” थे. लेकिन अब एक डर समा गया है मुझमे, वही डर जो “हार की जीत” वाले “बाबा भारती” को था.
 मै आम आदमी पार्टी के सभी मेरे मित्रो से पूछता हू

1.क्या बाकी पार्टियो के सदस्य आम आदमी नही होते? मै भाजपा का समर्थन करता हू क्या मै इनके “आम आदमी” के पैरामीटर मे नही आता?
2.“आम आदमी” होने का मतलब आम आदमी पार्टी के समर्थन से ही तय होता है?
3.क्या मुख्यमंत्री आम आदमी होता है? विधायक आम आदमी होता है?
4.“आप” सिर्फ “रायता” फैलाना जानते है?
5.देश या समाज चलता है तो उसके लिये चीजो को सहेजना पडता है उस सहेजने की प्रवृत्ति कब आयेगी “आप” मे?

बहुत सारी बाते है किंतु मेरे कुछ मित्र ऐसे है जिनके लिहाज से मै सार्वजनिक रूप से उन बातो को लिख नही सकता किंतु एक अंतिम बात कहता हू कल मेरे पास सूचना आयी कि इस केजरीवाल जी का निर्देश था कि “शनिवार को पार्टी  के फंड मे हर हाल मे सद्स्य, उनके रिश्तेदार, जानने वाले पैसा जमा करे”. आखिर फंड को कई गुना बढा हुआ दिखाकर इस्तीफे को सही जो दिखाना था. इतनी नौटंकी क्यो भई? खैर नौटंकी ही तो ”आप” का एक्स फैक्टर है. किये रहो. अब “आप” का मुकाबला नरेन्द्र मोदी तो कर नही पायेंगे हा राखी सावंत से सावधान रहियेगा वो ”आप” का डब्बा गोल कर सकती है.

शुभकामनाये 
भगवान सब को सद्बुद्धि दे!


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

मेरी कोशिश जारी है

रोटी दाल चला पाना अब, बहुत बड़ी ऐय्यारी है 
नून तेल की बंदोबस्ती दर्ज़े की फनकारी है। 

घीसू को घर मिला नया, होरी को कर्जा माफी 
इन बातो पर मत जाना ये विज्ञापन सरकारी है। 

पंचायत बैठाई है फिर, बेटो ने बंटवारे पर 
अम्मा को दो रोटी देना किसकी जिम्मेदारी है। 

आग लगी है पानी में, आज सियासी चालों से 
एहतराम के बाद पड़ोसी रामदीन की बारी है।

जुगनू सा ही सही मगर, मैं हूँ विरुद्ध अँधियारो के
तुम आओ ना आओ  लेकिन मेरी कोशिश जारी है।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

दिल ढूंढ लेता है













वीराना हो भला कितना ठिकाना ढूंढ लेता है, 
ग़मों को गुनगुनाने का तराना ढूंढ लेता है। 

कवायद खूब होती है मुझे मायूस करने की,
मगर दिल मुस्कुराने का बहाना ढूंढ लेता है। 

चटखते जेठ के दिन हो या हो बरसात सावन की,
सुलगती चांदनी में फिर महकती रात चंदन सी,

हज़ारों मील लम्बे रास्ते फूलों के कांटों के,
सफर कोई हो मौसम आशिकाना ढूंढ लेता है।

कभी पत्थर सा रहता है कभी पानी सा बहता है,
कभी कुछ बोल देता है कभी खामोश रहता है,

मुहब्बत में अदावत में तन्हाई और महफ़िल में,
तरन्नुम में ग़ज़ल इक शायराना ढूंढ लेता है।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

मोहग्रस्त नारद बनाम बन्दर मीडिया

इस समय मीडिया की अवस्था देखकर मुझे रामायण की एक कथा याद आती है जिसमे नारद एक सुन्दरी विश्वमोहिनी के रूप जाल में फंस कर अपने धर्म से विमुख होकर उसके स्वयंवर में एक उम्मीदवार बन कर दरबार में पहुँच जाते है तथा उसे आकर्षित करने के भाँती भाँती उपाय करते है।  कभी ठुमक कर उसके रास्ते में आ जाते है तो कभी जोर जोर से बोलकर ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करते है।  ठीक यही स्थित आज मीडिया की हो गयी है।  सत्ता सुन्दरी के चक्कर में मीडिया नारद बन गया है तब नारद का मुह बन्दर की तरह था आज मीडिया का मुह "अपाई " हो गया है।
साहब मज़ाल क्या कि केजरीवाल छींक दे और मीडिया उसे प्रसाद समझ कर मुख्या खबर न बना दे।  मैंने पिछले हप्ते का टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बारीकी से अध्ययन किया तो पता चला कि समाचारों में लगभग ५० से ६० प्रतिशत स्थान आ आ पा से जुडी खबरे घेरती है जबकि १५ से २० प्रतिशत स्थान  फ़िल्मी कलाकारों एवं उत्तेजना को समर्पित रहता है। बाकी में विज्ञापन और अन्य खबरे रहती हैं।  उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने जब एक हेल्पलाइन नंबर जारी किया तो सामान्य खबर के तरह नीचे पट्टी पर चला दिया गया जबकि केजरीवाल ने जब यही किया तो बाकायदा सजीव प्रसारण सारे चैनलो पर हुआ और आज टाइम्स ऑफ़ इंडिया की हैडलाइन भी यही खबर बनी।

इन सब बातो से कुछ प्रश्न बनते है

क्या मान लेना चाहिए कि जल जंगल जमीन से जुड़े मुद्दे अब अर्थहीन हो गये ?
क्या मान लेना चाहिए कि सामान्य व्यक्ति की दुश्वारियां अब अर्थहीन हो गयी? 
क्या मान लेना चाहिए कि मीडिया बन्दरत्व को प्राप्त हो गया है?

यदि हाँ तो हमें नये विकल्पों को शिद्दत से ढूंढना होगा और यदि नही तो जो दिख रहा है उसे किस रूप में परिभाषित किया जाय ? समाचार या बंदरबाजी ?