शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं..

मै बहन अपर्णा से क्षमा मंगाते हुए इस पोस्ट को लिखने जा रहा हूँ. वैसे मै तो चाँद पर जाना चाहता हूँ. क्यों? क्योकि यहाँ आग लगी है. लेकिन भागना ही नहीं आया . यही रहूगा और अपनी धरती अपना देश को बुरी नज़र से बचाने का काम करूगा.शुरुआत इस ब्लॉग जगत से करता हूँ या कर दिया हूँ. समाजशास्त्री  होने के कारण व्यक्ति के व्यवहारों के पीछे छिपे कारणों को मै जान सकता हूँ. कोई व्यक्ति दो तरीके से सोचता है. प्रथम मूल प्रवृत्तियों द्वारा और दूसरा सीखा हुआ. हम सीखने के दौरान गलतिया  करते है फिर सुधारते   है. लेकिन जन्मजात प्रवृत्तियों में सुधार की गुन्जाईस होना गधे के सर पर सीग उगने जैसा  है.
गलतियों और सुधार पर कुछ श्रेणिया बनी है.........
जो गलती छोड़ कर बैठा उसे भगवान कहते है
समझता जो ना गलती को उसे हैवान कहते है
सुधरता कर जो गलती को उसे इंसान कहते है
करे गलती पे जो गलती उसे शैतान कहते है.
मै एक बात स्पष्ट  कर दू कि यह मामला व्यक्तिगत है रीति-रिवाजो और परम्पराओं धार्मिक मसले सीखे हुए व्यवहार के अंतर्गत नहीं आते वरन लादे गए होते है. मनुष्य अपने विवेक के अनुसार उसमे आवश्यक सुधार कर अपनाता है.
ये तो रही सैद्धांतिक बात.
अब व्यवहारिक बात की जाए
इस ब्लॉग जगत में तमाम ऐसे लोग आ गए है. जो पहली कटेगरी के है. ये बजबजाती  नाली के वे  बिलबिलाते कीड़े है जो यह समझते है कि सम्पूर्ण विश्व के आनंद और ज्ञान का स्रोत एकमात्र बजबजाती नाली है. ये गन्दगी में लोटते सूअर सरीखे लोग सारे दुनिया को गंदा करे उसे अपने जैसा बनाना चाहते है.  जैविकीय हस्तांतरण और समजीकीय हस्तांतरण तो प्राप्त करते है किन्तु बिना विवेक के. यही विवेक हैवान  और इंसान में भेद करता है. 
मेरा समस्त(सूअर बुद्धि वालो को छोड़ कर क्योकि इनको कुछ सिखाया या समझाया नहीं जा सकता है ) ब्लोगर्स से अनुरोध है कि वे इन नाली के कीड़ो और गन्दगी के सुअरों का बहिष्कार करे.
पाठक गण इनके बारे में अच्छी तरह से जानते है
अंत में दुष्यंत कुमार जी के शब्दों में....

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए