रविवार, 14 नवंबर 2010

मै अक्सर कल्पना करता हूँ कि ...

मेरी पिछली दो पोस्टो को पढने के बाद मेरी बहन अपर्णा ने मुझसे कहा कि गधो को अच्छा सबक मिल गया है . अब गदहपचीसी छोड़ कर ऐसी रचनाओं का सृजन करो जिनको पढने के बाद मन में सकारात्मकता के  आनंद के भाव उठे. वैसे ही इस दुनिया में लड़ाई झगडे की भरमार है. मैंने उससे कहा, भद्रे! मै खुद नहीं चाहता कि मुझे किसी से तकरार करनी पड़े किन्तु जब कोई  व्यवस्था को बिगाड़ने की बात करता है तो उनको सही रास्ते पर ले आना कर्तव्य बन जाता है.

बहरहाल मै  सुधी पाठको को जमालो और शर्माओं की दुनिया से दूर ऐसी जगह ले चलता हूँ जिसकी मै अक्सर कल्पना करता हूँ.
कुछ झलकिया देखिये.....

सावन भादों जल बरसेगे
नदियों के तट मिल जायेगे
वो भी दिन आएगा जब
धरती फिर से मुस्कायेगी

रिश्तों की बरफ पिघल जायेगी
बिछड़े दिल मिल जायेगे
टूटे बंधन को जुड़ना होगा
तुलसी के दीप  जल जायेगे

दूर प्रदूषण होगा जीवन से 
तन से मन से घर आँगन से
यमुना का जहर मिटेगा इक दिन
गंगा पावन हो जायेगी

शरदपूर्णिमा का  चन्दा
धरती पर मधु बरसायेगा  
किसी की पैजनिया खनकेगी
किसी की मुरली गायेगी

मीठी अमराई महकेगी
सुबह शाम पंछी  चहकेगे
पायल छनकाती सखियों के संग
पनघट पर गोरी आयेगी

वो भी दिन आएगा जब
धरती फिर से मुस्कायेगी....