मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

धन्य हो अरुंधती देवी.

हम सब एक नंबर के लातर लोग है. कोई लाख गाली दे लतियाए जुतियाये हम भारतीय बड़े प्रसन्न भाव के साथ सहज पूर्वजन्म का प्रारब्ध मान कर स्वीकार कर लेते है. जो भी आता है दो चार लात लगा कर जाता है.क्या तुर्क क्या अरब क्या मंगोल क्या अंग्रेज. अब इस कड़ी में नया नया नाम है अरुंधती राय. ये देवी छोटे बच्चों के भगवान  नामक पुस्तक की रचयिता है पाश्चात्य महात्माओ द्वारा सराही गयी है. वस्तुतः पुस्तक इनके अश्लील प्रसंगों पर आधारित है लेकिन  ये श्लील अश्लील देश समाज धरम करम से ऊपर उठ चुकी है. इनको मालूम है की अपनी दुम उठानी कब है और दबानी कब है.अब चूंकि हम सब कायर और लद्धड दोनों है तो कुछ  कर नहीं सकते सिर्फ एक बात बकने  के अलावा "हमारी सहनशीलता की परीक्षा ना ली जय (नहीं तो हम और सहनशील हो जायेगे.)". हिन्दुस्तान की गति गरीब की जोरू जैसी हो कर रह गयी है जिसे सारा गाँव (विश्व) भौजाई कह कर मजे लेता है.
धन्य हो अरुंधती  देवी जो समय पर हमारी औकात बता देती हो और जिस थाली में खाती हो उसी में छेद भी कर देती हो. अगर कदाचित मेरा ब्लॉग कभी आप पढ़े तो गुस्सा मत होइएगा (होगी भी तो क्या कर लेगी). हिन्दुस्तान में सब को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है.अच्छा  अब लिखना समाप्त करता  हूँ क्योंकि मेरी कछुआ प्रवृत्ति आगे लिखने से रोक रही है.
जय रामजी की ...........(रामजी की जय कोई भक्ति-भाव से नहीं बल्कि देश को चलने के लिए शुक्रिया के रूप में. देश तो राम भरोसे ही चल रहा है.)