सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

बरस बीते मौन के....









झुरमुटों से छन के आयी

किरन आसमान से

बांसुरी बोल पड़ी

स्वागत मेहमान के

गुंजर बिहस उठे

आख़िरी पहर में

महक उठी रातरानी

मुग्ध स्वर बिहान के

पांखुरी चटकने लगी

मेरे उपवन के

अंखुवे निकले फिर

पतझारे बन के

सुधिया मुसकराने लगी

बीत गयी रैन के

डोली धरती और

बरस बीते मौन के

बरस बीते मौन के