मंगलवार, 27 जुलाई 2010

भैया कमलेश के प्रति

चौखट से  पहली बार
जब बढे थे पाँव मेरे
तुम्हारी कोमल उंगलियों ने
थाम रखे थे हाथ मेरे

आगे तुम चलते मेरी
आड़ बनकर ढाल बनकर
मै इक बछड़े के सरीखा
चलता था पीछे होकर

जब कभी भी थक  जाता
एक पग  ना डोल  पाता
तुम पास मेरे  आ जाते
गोद में उठाते दुलराते





मै अकड  बैठा था इक  दिन
मास्टरजी से आलेख पर
मेरे हिस्से कि छडिया
आकर रोपी थी हाथ पर

तुमको कुश्ती में पटकते
या  कि  कंचे में हराते
मै समझता खुद को हीरो
और तुम तब मुस्कराते

आज भैया  जानता  हूँ
तुम थे हारे जानबूझकर
डालना था मुझमे आदत
जीतने कि हर मोड़ पर

हमको जब भेजा जाता
खेत में कुछ काम  करने
तुम भगा देते थे मुझको
खेलने या  कि पढने

तुमने ही तो पी लिया था
पिताजी का क्रोध सारा
वरना ये पछुआ पवन तो
बन भटकता  बंजारा

आज मैंने सफलताओं का
आसमान जो छुआ है
भैया ये सब तुम्हारी
दिल से  निकली दुआ है

मेरा तुम्हारा युग का नाता
बस मेरा ये ही कथन
तुम हो भैया राम मेरे
मै तुम्हारा लक्ष्मन