बुधवार, 14 जुलाई 2010

यूं तो सावन झूम के बरसा.....

             








                   

                १.
यूं तो सावन झूम के बरसा
 पर एक मै ना भीग पाया,
नमी जिसमे  थी नहीं वो,
बादल मेरे हिस्से में आया.
                २.
आज  तक तो ना उछाला
एक भी पत्थर सनम,
पर ये दुनिया है कि कहती
ये पागल कहा से आया.
            ३.
रह-रह के ज्वार आता है
समंदर में  जानते हो क्यों,
उचक कर वो देखता है
मीत उसका क्यों ना आया.
             ४.
आंसू और मुस्कानों में
खिच ना पायी सीमा रेखा,
कभी ये आंसू मुस्काते है
कभी  हँसी   रोते    पाया.
             ५.
एक मुद्दत हो गयी है
आँखों  को  झपकाए हुए,
सांकल खट-खटा  रही है
परदेसी द्वार पर  आया.

मेरा परिचय: The Son of India













हिमालय     का   बेटा    हिंद की संतान हूँ
मुझको पवन कहते है जाति का इंसान हूँ


मजहब ना मुझसे पूछिए मजहब से अनजान मै
पर  राम बसे  प्राण मेरे रहीम मेरी जान में 


ना पंजाबी ना गुजराती ना ही राजस्थान का
मेरी रगों  में बहता  लहू प्यारे हिन्दुस्तान का