रविवार, 11 जुलाई 2010

...उस राह से गुजरे हुए कितने जमाने हो गए











जिस राह से गुजर कर उसके दीवाने हो गए
उस राह से गुजरे हुए कितने जमाने हो गए

कालेज की बाते मुझसे मत किया करो
मेरे 'उसके' किस्से बरसो पुराने हो गए

इन गलियों में आते हुए डर लगता है
यहाँ पर आकर  मेरे अपने बेगाने हो गए

जाते -जाते 'वह' मेरे आंसुओं को  ले गयी
इन सूखी पलकों पर सपने वीराने हो गए

बुलबुल भी चुप है मेरी ख़ामोशी को देखकर
इस गुलशन में उसके कितने तराने खो गए

कुछ कहने से पहले मुझे टोकती है हवा
सुनने वालो के दिल आजकल सयाने हो गए