शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

दुनिया खड़ी है बनकर इक चीज़ बाज़ार में




















दुनिया खड़ी है बनकर इक चीज़  बाज़ार में
पैसे हो अगर जेब में तो  आना बाज़ार में.
हर किसी की यहाँ पर सूरत बदल जाती है
बीमार भी बनकर खड़ा मसीहा बाज़ार में.
धरम करम कहते है जो दिन के उजालो में
रात को उनकी गली खुलती है बाज़ार में.
वीरान गुलिस्तान में मरघट सी वहशत है
भंवरों ने यहाँ बेच दिया गुल को बाज़ार में.
आबाद है ज़हान जिनके खून की हर बूँद से
आखिर में लाश उनकी नीलाम है बाज़ार में.
हर शाम-ओ-रात  अंधेरो में  गुजरती है यहाँ
कुछ लोग चरागों को बुझाते है बाज़ार में.

परमेश्वर से तब मैंने बेटी मांग लिया











कई जनम के सत्कर्मो का
जब मुझको वरदान मिला
परमेश्वर से तब मैंने
सीता सी बेटी मांग लिया
        उलझा था जब दुविधा के
        कर्मक्षेत्र के कुरुक्षेत्र  में
       परमेश्वर से तब मैंने
       गीता सी बेटी मांग लिया
             एकाकी सा भटक रहा था
             निर्मोही जग डरा रहा था
             परमेश्वर से तब मैंने
             मीता सी बेटी मांग लिया