बुधवार, 30 जून 2010

तुम भी कही भीगती होगी..........

सावन की सीली हवाएं
जब तन से मेरे टकराती है,
तुम्हारे कोमल छुअन की यादें
मुझे  पुकार जाती है.
धुली और पनियल सडको से
काफी हाउस आना,
घुमड़ते कारे बादलो की
फुआरों में भीज जाना.




तुम्हारे बालो का गीलापन
मेरे कंधे पर होता था,
सारा रेगिस्तान मेरा
उस पल को गायब होता था.
तुम्हारे साथ बिताई हुयी
हर शाम याद आती है,
जिस बात पर हंसी थी तुम
वो बात याद आती है.
आगे सावन बरसे ना बरसे
लेकिन बारिश लम्बी होगी,
मेरी आँखों के बादल से
तुम भी कही भीगती होगी.
तुम भी कही भीगती होगी..........