रविवार, 31 अक्तूबर 2010

मीठी सी लौ भर रही चारो ओर मिठास

खेतों में बागो में दियना करे उजास,

मीठी सी लौ भर रही चारो ओर मिठास.

दसो दिशाओं में घुली भीनी-भीनी गंध,
कण-कण पुलकित हो उठे लूट रहे आनंद.

नयी फसल लेकर आयी घर में गुड और धान,
लईया खील बताशों से अभिनंदित मेहमान.

गेरू गोबर माटी से लिपा पुता है गाँव,
घर से भगे दलिद्दर सर पे रखकर पाँव.



झांझ मजीरा ढोलक बाजे झूम रही चौपाल,
नाचे मन हो बावरा देकर ताल पे ताल.


फूटी मन में फुलझड़िया पूरण होगी आस,
परदेसी पिऊ आ गए गोरी ने छुआ अकास.

दीवाली ने कर दिया ज्योतिर्मय संसार,
सबके आँगन में खिले सुख समृद्धि अपार.

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

एक बार भाव से तो देख सही पगले

एक बार मै मंदिर गया
हनुमान जी का दर्शन करने,
पत्थर की प्रतिमा थी
ईंटो का महल था
यंत्रवत नगाड़े बज रहे थे
लोग सहमे खड़े थे



ट्यूबलाईट बल्ब बेहिसाब जल रहे थे
जींस पहने लाल रूमाल बांधे
हनुमान जी के पास
तिलक लगाए कुछ लोग खड़े थे
उनको पुजारी कहा जाता था
कुछ दुकानदारों ने
जबरदस्ती मुझे रोक कर
मिठाइया  बेचीं
पुजारी ने एक टुकड़ा प्रतिमा पर फेंका
वापस लौटाया
उसे प्रसाद का नाम दिया जाता है
लोग लोट कर प्रार्थना कर रहे थे
एक व्यक्ति चन्दन लिए बैठा था
चन्दन लगाने बाद
अर्थपूर्ण निगाहों से देखता था
शायद रूपये दो रूपये मिले
कुछ दूर पर पुलिस वाले बैठे थे
पान मसाला मुह में दबाये
भेडियो जैसी नजरोवाले
लडकियों को घूरते
मै आगे बढ़ा
अचानक
एक आदमी ने मुझे तिलक लगाया
और बोला दक्षिणा   दो
मैंने एक रूपये बढाए तो बोला
हट पापी इक्कीस रूपये से काम नहीं
मजबूरन दिए
आगे कई भिकारी जिनमे
हट्टे कटते नौजवान ज्यादा थे
दाढ़ी रखे रामनामी ओढ़े कालीचीकट
मैल से दुर्गंधित
वे उन्ही पुजारियों के भाई बंद थे
मुझे घेरा और धमकी भरी याचना की
खैर मैंने उन सबको थोडा -थोडा
प्रसाद दिया
अब भला  क्या बचता
पांच रूपये के प्रसाद में
एक मिठाई बची थी
अचानक एक बन्दर ऊपर से कूदा
वह मिठाई भी गयी हाथ से
मै खाली हाथ वापस चला 
दोपहर का सूरज जल रहा था
दिल मेरा भी जल रहा था
मैंने हनुमान जी से अनुरोध किया
ऐसी घटिया जगह छोड़ कर
मेरे मन में बसों प्रभू
अन्दर से कही एक आवाज गूंजी
अरे मूर्ख मै कभी भी
ऐसी जगहों पर नहीं रहता
जरा मन का गर्द तो झाड़ पोंछ
मै तेरे दिल में ही हूँ बच्चे
मै तेरे दिल में ही हूँ बच्चे
एक बार भाव से तो देख सही पगले
एक प्रकाश का झरना फूटा
मै आलोकित होता गया
और इष्ट के साक्षात् दर्शन किये
ना किसी मंदिर में
बस अपने दिल में
बस अपने दिल में








बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

..अरसे के बाद











आधी रात और
पूरा चाँद
मस्त हुआ मौसम
अरसे के बाद
कुछ इस तरह से मुझे
छू जाती ह सबा
जैसे हो  मेरे
बचपन की दिलरूबा
कुदरत की दुआ को
बाहों में लिया है मैंने
पिघलती चांदनी को
जीभर के पिया है मैंने
जोगन बनी सतरंगन
अरसे के बाद
शाद हुआ चाँद  
अरसे के बाद
पूरी हुयी बात
अरसे के बाद

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

धन्य हो अरुंधती देवी.

हम सब एक नंबर के लातर लोग है. कोई लाख गाली दे लतियाए जुतियाये हम भारतीय बड़े प्रसन्न भाव के साथ सहज पूर्वजन्म का प्रारब्ध मान कर स्वीकार कर लेते है. जो भी आता है दो चार लात लगा कर जाता है.क्या तुर्क क्या अरब क्या मंगोल क्या अंग्रेज. अब इस कड़ी में नया नया नाम है अरुंधती राय. ये देवी छोटे बच्चों के भगवान  नामक पुस्तक की रचयिता है पाश्चात्य महात्माओ द्वारा सराही गयी है. वस्तुतः पुस्तक इनके अश्लील प्रसंगों पर आधारित है लेकिन  ये श्लील अश्लील देश समाज धरम करम से ऊपर उठ चुकी है. इनको मालूम है की अपनी दुम उठानी कब है और दबानी कब है.अब चूंकि हम सब कायर और लद्धड दोनों है तो कुछ  कर नहीं सकते सिर्फ एक बात बकने  के अलावा "हमारी सहनशीलता की परीक्षा ना ली जय (नहीं तो हम और सहनशील हो जायेगे.)". हिन्दुस्तान की गति गरीब की जोरू जैसी हो कर रह गयी है जिसे सारा गाँव (विश्व) भौजाई कह कर मजे लेता है.
धन्य हो अरुंधती  देवी जो समय पर हमारी औकात बता देती हो और जिस थाली में खाती हो उसी में छेद भी कर देती हो. अगर कदाचित मेरा ब्लॉग कभी आप पढ़े तो गुस्सा मत होइएगा (होगी भी तो क्या कर लेगी). हिन्दुस्तान में सब को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है.अच्छा  अब लिखना समाप्त करता  हूँ क्योंकि मेरी कछुआ प्रवृत्ति आगे लिखने से रोक रही है.
जय रामजी की ...........(रामजी की जय कोई भक्ति-भाव से नहीं बल्कि देश को चलने के लिए शुक्रिया के रूप में. देश तो राम भरोसे ही चल रहा है.)

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

बरस बीते मौन के....









झुरमुटों से छन के आयी

किरन आसमान से

बांसुरी बोल पड़ी

स्वागत मेहमान के

गुंजर बिहस उठे

आख़िरी पहर में

महक उठी रातरानी

मुग्ध स्वर बिहान के

पांखुरी चटकने लगी

मेरे उपवन के

अंखुवे निकले फिर

पतझारे बन के

सुधिया मुसकराने लगी

बीत गयी रैन के

डोली धरती और

बरस बीते मौन के

बरस बीते मौन के

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

दोगलापन-3(जय लंकेश मिटे समाज का क्लेश)

दशहरे के दूसरे दिन का अख़बार पलट रहा था कि एक जगह मेरी नज़र ठिठक गयी समाचार का शीर्षक था जय लंकेश मिटे समाज का क्लेश. आगे उसमे गौतम बुद्ध बी. आर अंबेडकर और बी कितने महापुरुषों की जय जयकर लगाई गयी थी.अब रावण का बौद्ध धर्म से क्या लेना-देना आज कल महापुरुषों को गाली देकर या उनका अपमान कर सस्ती लोकप्रियता और छपासू बनने का एक बेढंगा ढर्रा चल पड़ा है.जब भी मन करे तो राम को गाली दे दो आंबेडकर की मूर्तियों का अपमान करो राष्ट्रपिता की खिल्ली उडाओ संविधान को नकार दो इससे आप मीडिया में छा जाते हो. अब इस किसिम के लोगो ने ऐलान किया है कि रावण की भव्य मूर्तिया गाँव-गाँव लगाई जायेगी और रावण राज कि स्थापना की जायेगी. जय लंकेश श्त्रोत्र की भी रचना कर ली गयी है........... मुझे तो अभी पता नहीं है कि इसमें क्या शब्द है फिर भी आइये कुछ मंत्रो का जाप कर लिया जय नहीं तो ये तालिबान के औलाद सर कलम का फतवा जारी कर देगे.



जय लंकेश जय लंकेश
मिटे समाज का क्लेश
इक वनवासी की नार चुराई
धर साधू का भेष

चोरी डाका कतल और बलवा
 कछु ना रहा था शेष
 जय लंकेश जय लंकेश

पढ़ा लिखा लादेन सरीखा
आतंकवादियों का नरेश
जय लंकेश जय लंकेश
         
इस स्त्रोत्र को रोज़ सुबह शाम गन्दा नाला में नहा कर पाठ करिए. लंकेश के गुण धीरे से आपमें भी आ जायेगे और आप सारे पापो से युक्त होकर शीघ्र ही परम(कु)धाम को प्राप्त होगे.........

जय बाबा लंकेश.....................

आज हिन्दुस्तान में एक मजबूत डंडे की जरूरत है जो इन जैसे तमाम खब्तियो का उपचार कर सके ............

जय हिंद ...........

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

पहिलवा की दशमी .....................

पहिलवा शब्द का अर्थ अतीत से है. परसों दशहरा है. त्योहारों के आने के साथ मेरे मन की व्याकुलता बढ़ जाती है और मै अपनी गुलामी को करीब से महसूस करने लगता हूँ. आज से कोई १५-२० साल पहले ज़िंदगी में इतनी गुलामी ना थी लोग मस्ती में दो रोटी खाकर गाते नाचते जिन्दगी का लुत्फ़ उठाते थे पर आज दो के चार करने के चक्कर में एक रोटी के वास्तविक आनद से महरूम होना पड़ रहा है. मुझे याद है दशहरे के करीब आते से ही बाबूजी हम भाइयो के लिए बॉस की कैनीयो से धनुष बनाया करते और सरकंडे के बाण. उन बानो में हम बेर के कांटे भी लगा लेते थे या कभी कभी सड़क से डामर निकल कर और कुछ कपड़ा लपेट कर उसको अग्निबाण में परिवर्तित कर देते थे. एक बार मैंने जोश में आकर अग्निबाण का संधान अपने पड़ोसी की ओर कर दिया था. गनीमत थी की हमारे बड़े भाईसाहब ने ये देख लिया था और तुरंत पानी डालकर उनकी मड़ैया बचाई नहीं तो लंका में आग एक बार फिर लग जाती. मुझे बचपन में हनुमान जी बनने की बड़ी इच्छा रहती थी. हमारे परंपरागत राजमिस्त्री बग्गड़ ने मुझे एक गदा उपहारस्वरुप दी थी जो शायद आज भी गाव में रखी है उसे लेकर मै अपना मुह फुलाकर खूब धमा चौकड़ी मचाता. दशहरे वाले दिन अम्माने लौकी की बर्फी और पकवान बनाये थे मेरे ताऊ जी भी बहुत अच्छे पकवान बनाते थे. उस दिन गरम गरम पूड़ियाँ सीको में खोस कर हम सभी भाई बहन दौड़ -दौड़ कर खाते. एक बार मेरे कमलेश भैया की पूड़ी कौवा लेकर भाग गया और साथ में उनकी उंगली भी काट गया वे रोने लगे तो मै भी अनायास ही उनके सुर में सुर मिला दिया और हम भाइयो का भोपा जोर से बजाते देख कर बाबूजी अपना परंपरागत उपचार डीज़ल लगा कर किया. उनदिनों जलने काटने पर डीजल लगा दिया जाता था.
दोपहर में पड़ोस से धनुष बाण से सुसज्जित बच्चों की टोली आ धमकी हम भी कहा पीछे रहने वाले थे. हम और भैया कमलेश अपने अपने धनुष बाण सहित विरोधी दल पर टूट पड़े
इत रावन उत राम दोहाई.जयति-जयति जय परी लड़ाई
उस तरफ की सेना नेत्रित्व हमारे पटीदार वकील साहब (जो हमारे बाबूजी के चचेरे भाई लगते थे) के लड़के रबेंदर उर्फ़ खलीफा कर रहा था.अचानक वह दौड़ता हुआ आया और मेरे धनुष को तोड़ दिया. फिर मैंने अपना गदा उठाया और रावन पार्टी पर टूट पड़ा भैया भी बाण छोड़कर मल्लयुद्ध पर आगये. थोड़ी देर में मैदान साफ हो गया.
कछु मारेसि कछु मर्देसी कछु मिलयेसी धरी धूरी.  रबेंदर एंड पार्टी सर पर पाँव रख कर वापस भागी.
नहाने खाने के बाद बुआ के बेटे नग्गू और बबई आ गए वो हर साल यही आकर दसहरा मनाते थे. बड़े भैया से उन लोगो की खूब पटती थी. हम बच्चा पार्टी से बड़े भैया का ज्यादा मतलब नहीं था. हमारे गाँव में जो निचले तबके के लोग थे उनको विजयादशमी के दिन उत्सव मानने के लिए पैसे के रूप में दश्मियाना दिया जाता था. मैंने सहकारिता का पहला सबक इसी दश्मिय्याने से सीखा. हम शाम को अच्छे कपडे पहन कर दशमी देखने सुजानगंज को चले. बाबूजी की साइकिल पर आगे मै बैठा पीछे कमलेश भैया. बाबूजी से रामजी की बाते सुनते हुए हम मेला स्थल पर पहुचे. उन्होंने साइकल मौरिया पान वाले के यहाँ खड़ी कर दी और मेला दिखाने ले गए. मेले में सबसे पहली मुलाकात माली से हुई जो कान में रुई खोंसे सबको इतर लगा रहा था. उसने हमको भी लगाया बाबूजी ने उसको कुछ पैसे दिए. आगे कडेदीन की जलेबी की दूकान लगी थी. बाबूजी हम सबको राम जानकी मंदिर ले गए और वही रुकने को कहा फिर वह अपनी मंडली से मिलने चले गए. हमने मौका ताड़ा और निकल पड़े मेले में. दया की फोटू की दूकान से फोटू खरीदी गयी घोड़े वाले झूले पर झूला गया, बहन के लिए खिलौने(जतोला) लिया गया गुड वाली जलेबिया उडाई गयी, कुछ पटाखे लिए गये. फिर पीछे से शोरगुल हुआ हम भाग कर मंदिर में आगये. राम जी रावन का वध करने जा रहे थे.लोग नाचने गाने और जैजैकार कर रहे थे. मै राम बने लड़के को देख रहा था. फिर बाबूजी आ गए मैंने बाबूजी से राम बनाने की जिद की उन्होंने कहा कोई कपडे पहन कर या रंग रोगन से राम नहीं बन जाता राम बनना है तो सदगुण अपनाओ जो राम में थे फिर तुम राम जैसे अपने आप बन जाओगे. यह मेरा दूसरा सबक था. हम लोग राम की जय बोलते हुए रावन के पुतले के पास पहुचे और थोड़े देर में पुतला दहन होने लगा. लगभग ९ बजने को था उल्लासित भीड़ वापस घर को. हम लोग बाबूजी के साथ मगन भाव से वापस आये बड़े भैया नग्गू और बबई पहली आ चुके थे. बाबूजी गट्टे ले आये थे जो दशहरे की परंपरागत मिठाई होती है. जब गट्टे का बटवारा हुआ तो उसमे ३-४ गट्टे कम निकले थे वो दूकान वाले को कोसने लगे की उसने ठग लिया. हम जल्दी भाग कर पटाखे छुडाने चल दिए. पटाखे छुडाते समय भैया बोले निकाल गट्टे. हम लोग खूब हँसे और चुराए हुए गट्टे खाने के साथ खूब फुलझड़िया छूटी.

आज गाँव से सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
मेरे साथ ना तो लौकी की मिठाई है
ना ही कोई भाई है
इतर लगाने वाला माली
हँसता हुआ आता है और
गायब हो जाता है
सामने काजू की बर्फी गिफ्टेड है
पर गट्टे वाला स्वाद नहीं है.
खासतौर से चोरी के गट्टों का.
आज गाँव से सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
और याद करता हूँ
पहिलवा की  दशमी .....................

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

मुझमे मेरा जो कुछ है वो तेरा ही निमित्त है माँ















अपनी दुर्बलताओ से जीतू शक्ति देना जगदम्बे
दुनियावी जालो  से निकलू संबल देना माँ अम्बे

जयकारा रतजगा जागरण कभी नहीं कर पाऊंगा
मन ही मन  में एक बार बस एक बार तुम्हे बुलाऊंगा

मेरी मद्धिम  सी पुकार पर तुमको आना होगा
मै सोया रहता हूँ माते  मुझे जगाना होगा

भले बुरे का परिचय देना और अंधेरो में ज्योति
गहरी पीड़ा से मुक्ति नहीं सहने की देना शक्ति

अंधियारों में दीपक बन  जल जाने की इच्छा है
मानवता की सेवा में बलि जाने की इच्छा है

सदा रहे आशीष तुम्हारा छोटी सी ये अर्जी  माँ
मुझमे मेरा जो कुछ है वो तेरा ही  निमित्त  है माँ

                            मुझमे मेरा जो कुछ है वो तेरा ही  निमित्त  है माँ