शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

दोगलापन--२ (पुनर्संपादित गुरुघंटाल)













गुरूजी बन रहे  गुरुघंटाल देखिये,
झऊआ भर काट रहे माल देखिये।

हपते में आठ दिन व्रत रहते है,
टमाटर से लाल हुए गाल देखिये।

दिन में करे भजन-पूजन और बको ध्यान,
रतिया मे ठोक रहे ताल देखिये।

लीलाधारी कलाधारी जाने क्या क्या धारी है,
अपटूडेट मदारी का कमाल देखिये।

स्वर्ग पहुचाने का पैकेज बेचते है,
भगवान् के दरबार के दलाल देखिये।

प्राणियों की सेवा ही एकमात्र धर्म है,
आश्रम मे हुए मुरगे हलाल देखिये।

शहर की सडको पर इनकी ही खुदाई है,
चौराहों पर खड़े पंडाल देखिये।

मुस्कान मोहनी है स्वामी है बड़े नटखट,
उनकी अदा पर मच रहे बवाल देखिये।

कालनेमि के वंशधर कलयुग की औलाद है,
जटाजूट नख-शिख विशाल देखिये।

हर शाख पर बैठे हुए है घात लगाए,
चिड़ीमार गुरूजी की चाल देखिये।
गुरूजी बन गए गुरुघंटाल देखिये।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

झज्झर का यक्ष प्रश्न?????













ब्राह्मण  देव मुझे छूने से
इतना क्यों घबराते है
नारायण की  चौखट पर
सारे अंतर  मिट जाते है
मै भी  बना  पंच तत्वों से
प्रभु ने रचा मनोयोग से
क्या जल अछूत पावक अछूत
धरती अछूत अम्बर अछूत
अपने स्वारथ में रत होकर
मानवता को बाँट  दिया
ज्ञान मुझको वंचित कर
अज्ञानी का नाम दिया
प्रभु के यहाँ अछूत ना कोई
वह सबको गले लगाते  है
वह सबको एक समझते है
समदर्शी कहलाते  है फिर,
ब्राह्मण देव मुझे छूने से
इतना क्यों घबराते है??????

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

भैया कमलेश के प्रति

चौखट से  पहली बार
जब बढे थे पाँव मेरे
तुम्हारी कोमल उंगलियों ने
थाम रखे थे हाथ मेरे

आगे तुम चलते मेरी
आड़ बनकर ढाल बनकर
मै इक बछड़े के सरीखा
चलता था पीछे होकर

जब कभी भी थक  जाता
एक पग  ना डोल  पाता
तुम पास मेरे  आ जाते
गोद में उठाते दुलराते





मै अकड  बैठा था इक  दिन
मास्टरजी से आलेख पर
मेरे हिस्से कि छडिया
आकर रोपी थी हाथ पर

तुमको कुश्ती में पटकते
या  कि  कंचे में हराते
मै समझता खुद को हीरो
और तुम तब मुस्कराते

आज भैया  जानता  हूँ
तुम थे हारे जानबूझकर
डालना था मुझमे आदत
जीतने कि हर मोड़ पर

हमको जब भेजा जाता
खेत में कुछ काम  करने
तुम भगा देते थे मुझको
खेलने या  कि पढने

तुमने ही तो पी लिया था
पिताजी का क्रोध सारा
वरना ये पछुआ पवन तो
बन भटकता  बंजारा

आज मैंने सफलताओं का
आसमान जो छुआ है
भैया ये सब तुम्हारी
दिल से  निकली दुआ है

मेरा तुम्हारा युग का नाता
बस मेरा ये ही कथन
तुम हो भैया राम मेरे
मै तुम्हारा लक्ष्मन

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

कुछ फूलों कि बाते हो
















कुछ फूलों की  बाते हो कुछ प्यार की  बाते हो
कुछ तितली की बाते हो कुछ मनुहार की बाते हो
        
ज्ञान की  बाते हो कुछ विज्ञान की  बाते हो
हँसी ख़ुशी की  बाते हो कुछ मुस्कान की  बाते हो
                 
नीले आसमान के नीचे बरगद की  शाखों के पीछे
 कुछ धूप की  बाते हो कुछ छांव की  बाते हो      
 
मीठी लोरी को सुनकर माँ के आँचल में छुपकर
सपनो की  बाते हो कुछ परियो की  बाते हो
                                  
 कुछ फागुन का रंग चढ़े कुछ सावन की  बरसाते हो
 कुछ बचपन की  बाते हो कुछ यौवन की  बाते हो

बुधवार, 14 जुलाई 2010

यूं तो सावन झूम के बरसा.....

             








                   

                १.
यूं तो सावन झूम के बरसा
 पर एक मै ना भीग पाया,
नमी जिसमे  थी नहीं वो,
बादल मेरे हिस्से में आया.
                २.
आज  तक तो ना उछाला
एक भी पत्थर सनम,
पर ये दुनिया है कि कहती
ये पागल कहा से आया.
            ३.
रह-रह के ज्वार आता है
समंदर में  जानते हो क्यों,
उचक कर वो देखता है
मीत उसका क्यों ना आया.
             ४.
आंसू और मुस्कानों में
खिच ना पायी सीमा रेखा,
कभी ये आंसू मुस्काते है
कभी  हँसी   रोते    पाया.
             ५.
एक मुद्दत हो गयी है
आँखों  को  झपकाए हुए,
सांकल खट-खटा  रही है
परदेसी द्वार पर  आया.

मेरा परिचय: The Son of India













हिमालय     का   बेटा    हिंद की संतान हूँ
मुझको पवन कहते है जाति का इंसान हूँ


मजहब ना मुझसे पूछिए मजहब से अनजान मै
पर  राम बसे  प्राण मेरे रहीम मेरी जान में 


ना पंजाबी ना गुजराती ना ही राजस्थान का
मेरी रगों  में बहता  लहू प्यारे हिन्दुस्तान का 

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

........एक दिन तुमको भी जाना है.

अनमोल पलों को खोकर हम
कुछ नश्वर चीजे पाते है
और उस पर मान जताते है
यह अभिमान छणिक है बंधू
समय का कौन ठिकाना है
जो मंगल गीत बना उसको
निश्चित मातम बन जाना है.

घनघोर घटाए आती है
पल भर में प्रलय मचाती है
लेकिन अगले ही क्षण उनको
अपना अस्तित्व मिटाना है.
जैसे सागर की लहरे
तट पर आती मिट जाती है
इस धरती पर सबको वैसे
आना फिर मिट जाना है.
जो आज हमारा अपना है
कल और किसी का  होगा वह
सारे जग की यही रीत है
उस पर क्या पछताना है.
जग ठगता है हर पल पग पग
क्यों रोते हो ऐसा कह कर
देकर धोखा अपने तन को
एक दिन तुमको भी जाना है.

रविवार, 11 जुलाई 2010

...उस राह से गुजरे हुए कितने जमाने हो गए











जिस राह से गुजर कर उसके दीवाने हो गए
उस राह से गुजरे हुए कितने जमाने हो गए

कालेज की बाते मुझसे मत किया करो
मेरे 'उसके' किस्से बरसो पुराने हो गए

इन गलियों में आते हुए डर लगता है
यहाँ पर आकर  मेरे अपने बेगाने हो गए

जाते -जाते 'वह' मेरे आंसुओं को  ले गयी
इन सूखी पलकों पर सपने वीराने हो गए

बुलबुल भी चुप है मेरी ख़ामोशी को देखकर
इस गुलशन में उसके कितने तराने खो गए

कुछ कहने से पहले मुझे टोकती है हवा
सुनने वालो के दिल आजकल सयाने हो गए

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

दुनिया खड़ी है बनकर इक चीज़ बाज़ार में




















दुनिया खड़ी है बनकर इक चीज़  बाज़ार में
पैसे हो अगर जेब में तो  आना बाज़ार में.
हर किसी की यहाँ पर सूरत बदल जाती है
बीमार भी बनकर खड़ा मसीहा बाज़ार में.
धरम करम कहते है जो दिन के उजालो में
रात को उनकी गली खुलती है बाज़ार में.
वीरान गुलिस्तान में मरघट सी वहशत है
भंवरों ने यहाँ बेच दिया गुल को बाज़ार में.
आबाद है ज़हान जिनके खून की हर बूँद से
आखिर में लाश उनकी नीलाम है बाज़ार में.
हर शाम-ओ-रात  अंधेरो में  गुजरती है यहाँ
कुछ लोग चरागों को बुझाते है बाज़ार में.

परमेश्वर से तब मैंने बेटी मांग लिया











कई जनम के सत्कर्मो का
जब मुझको वरदान मिला
परमेश्वर से तब मैंने
सीता सी बेटी मांग लिया
        उलझा था जब दुविधा के
        कर्मक्षेत्र के कुरुक्षेत्र  में
       परमेश्वर से तब मैंने
       गीता सी बेटी मांग लिया
             एकाकी सा भटक रहा था
             निर्मोही जग डरा रहा था
             परमेश्वर से तब मैंने
             मीता सी बेटी मांग लिया

रविवार, 4 जुलाई 2010

पथ पर चलता चल राही













पथ पर चलता चल राही
यद्यपि संग नहीं कोई,
पथ ही तेरी मंजिल है
अंतिम लक्ष्य नहीं कोई.
आज मिले जो मरुथल तुझको
कल मिलना निश्चित मधुवन,
प्राण छूटने से चिंतित क्यों
मृत्यु पार  भी है जीवन.
जहा पड़ेगे कदम तुम्हारे
राह वही बन जायेगी,
तेरे बाद उसी रास्ते
नयी पीढियां  आयेंगी.