शनिवार, 27 अगस्त 2016

शैक्षिक गुणवत्ता बनाम निजी भागेदारी।

शैक्षिक गुणवत्ता बनाम निजी भागेदारी।

तमिलनाडु के एक चिकित्सा महाविद्यालय की फीस २ करोड़ होने की खबर से नयी शिक्षा नीति निर्माताओं को सबक लेनी चाहिए। शिक्षा को धंधेबाजों के हाथों में देने से शिक्षा का भला नही होने वाला। सरकार को चाहिए कि शैक्षणिक संस्थान खोलने वाले के चाल चलन से लेकर योग्यता, क्षमता, नीयत की ठोक बजाकर परख करे। किसी न किसी किसिम की परीक्षा रखे फिर उन्हें अनुमति दे। कॉर्पोरेट घराने शिक्षा के हितैषी नही है इनको केवल पैसा पैदा करना है।

पिछले एक दशक से तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता और फैलाव के नाम पर जो इंजीनियरिंग कॉलेजों को कुकुरमुत्तों के माफिक खोला गया था उनमे तकरीबन पौने दो लाख सीटें खाली पड़ी हैं।  कहाँ गयी शिक्षा और इसके पैरोकार ? वे सब के सब दलालों की कदमबोसी करते दिख रहे कि एडमिशन करवा दो।  इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार लगभग ९० प्रतिशत उत्तीर्ण छात्र रोजगार के लायक नही।  पूरा का पूरा सिस्टम भरभरा रहा है।  एक बार में १० लाख का निवेश करने वाले माँ बाप बच्चे की १० हजार की नौकरी के लिए १० लाख की रिश्वत देने को अभिशप्त हैं।   निजी शिक्षण संस्थानों और सी बी इस ई का एक और खेला है।  जो टापर छात्र होते हैं वे अक्सर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में जगह पाने को व्याकुल रहते और पा भी जाते । औसत बच्चा मोटी केपिटैशन फीस देने को और निजी कॉलेज में एडमिशन को बाध्य हो जाता है ।
कहीं पढ़ा था कि आठवें दशक के अवसान तक गांवों-कस्बों से कनस्तर में  उदरपूर्ति और कंधे पर बिस्तरबंद में ओढ़ने-बिछाने का सामान लेकर घर से निकलते थे और उन्ही छात्रों को ही जिस सरकारी शिक्षा ने वैज्ञानिक, डाक्टर और इंजीनियर आर्थिक लाचारियों के बावजूद गढ़े थे, वहीं शिक्षा जब निजी संस्थानों के हवाले कर दी गर्इ तो डाक्टर, इंजीनियर बनने के लिए प्रतिस्पर्धा योग्यता की बजाए, पच्चीस-पचास लाख रूपये धनराशि की अनिवार्य शर्त हो गर्इ। राजनेताओं और नौकरशाहों ने भूमफियाओं शराब माफियाओं और चिट फण्ड कंपनियों के साथ मिलकर केंद्रीय विश्वविद्यालय और चिकित्सा, इंजीनियंरिंग व प्रबंधन के महाविद्यालय तक खोल उच्च शिक्षा को चौपट करने का काम कर दिया। क्या ऐसी मानसिकता वाले शिक्षा संचालक शिक्षा में गुणवत्ता लाने का काम कर सकते हैं ? उन्होंने तो पैसे से डिग्री बेचने का गोरखधंधा उच्च शिक्षा को मान लिया है। यही मुख्य वजह है कि आज शत-प्रतिशत शिक्षा ज्ञानोन्मुखी होने की बजाए केवल कंपनियां में नौकरी पाकर  अर्थोन्मुखी होकर रह गर्इ है। जो वास्तव में नवाचारी प्रतिभांए हैं, वे तो अर्थाभाव के चलते उच्च शिक्षा से पूरी तरह वंचित ही हो गर्इ ? ऐसे विश्वविद्यालयों से हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दुनिया के दो सौ शीर्शस्थ विवि की कतार में शामिल हो जांए। वे तो पैसा कमाने की होड़ में शामिल हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था "विदक्षता" के दुष्चक्र में फंस गयी है। शैक्षिक प्रसार के नाम पर पूरी  व्यवस्था  को निजी संस्थाओं के हवाले किया जा रहा है। ऐसे में शैक्षिक गुणवत्ता का स्थान मुनाफे ने ले लिया है। येन केन प्रकरेण मुनाफा प्राप्त करना ही संस्थाओं का अंतिम उद्देश्य बन चुका है। कोई भी शराब बनाने वाला, मिठाई बनाने वाला,कबाड़ व्यापारी, माफिया, नेता, अपराधी  देश हित या समाज हित को आड़ बनाकर पैसे के जोर से शिक्षाविद बन जाते है और महज पैसा बनाने के लिए स्कूल कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोल लेते है। लग्जरियस इंफ्रास्ट्रक्चर, फर्जी आंकड़े, फर्जी सूचनाओं एवं दलालो के सहारे कालाबाजारी कर "इन्टेक" पूरा करते है। इस प्रक्रिया में दूर दराज के छात्रों को बहला फुसलाकर उन्हें सुनहरे सपने दिखा कर उन्हें संस्थाओं में एजेंट को मोटी  रकम देकर एडमिट किया जाता है . फिर उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए अकुशल शिक्षक ( हालांकि कागजी  आंकड़ों में ये संस्थान हाई क्वालिफाइड टीचर्स दिखाते है जो अधिकतर उस संस्थान के निरीक्षण के समय भौमिक सत्यापन हेतु मौजूद रहते है और निश्चित रकम लेते है) रखे जाते है।ये अकुशल शिक्षक या तो " फ्रेशर" होते है अल्प जानकारी रखने वाले या कम वेतन पर काम करने को "विवश" लोग। मजे की बात तो यह है कि निजी संस्थाओं में हाई डिग्री होल्डर के ऊपर हमेशा निकले जाने की तलवार लटकती रहती है क्योंकि संस्थान के मालिक को मनोवैज्ञानिक भय होता है की हाई प्रोफाइल टीचर उसके कंट्रोल में नही आएगा और अधिक वेतन की मांग करेगा। इसलिए ये लोग साक्षात्कार के दौरान ही हाई क्वालिफाइड कैंडिडेट को पहले से बाहर कर देते हैं। इस प्रकार एक अकुशलता का चक्र बनता है।  अकुशल शिक्षक के अध्यापन से जो छात्र तैयार होंगे वो भी गुणवत्ता विहीन होंगे और जब ये क्षेत्र में काम करने जाएंगे चाहे वह उत्पादन हो या सेवा क्षेत्र वहाँ  भी गुणवत्ता मानको से नीचे ही रहेगी।  परिणाम यह होगा कि इनके द्वारा
निर्मित उत्पाद या दी गई सेवा राष्ट्रीय/ अंतराष्ट्रीय मानको पर खरी नही उतरेगी और प्रतिद्वंदिता में कही पीछे छूट जाएगी।  इसका असर अर्थव्यवस्था पर पडेगा और अर्थव्यवस्था दबाव में आ जाएगी। पुनश्च बड़े पैमाने पर छंटनी की प्रक्रिया में ये अकुशल लोग भारी मात्र में निकाले जाते है जो एक्सपीरियंस के आधार पर किसी न किसी  निजी शैक्षणिक संस्था में फिर पढ़ाने का कार्य करने लगते है वो भी कम वेतन पर। इस प्रक्रिया में अच्छे शिक्षको को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। यह ठीक उसी तरह से है कि ब्लैक मनी वाइट मनी को चलन से बाहर कर देता है।

यहाँ एक बात और गौर   करने लायक है कि इन संस्थाओं में कार्यरत शिक्षक एवं संस्था प्रमुख के बीच सामंत और दास जैसा रिश्ता होता है शिक्षक चाहे कितना भी प्रशिक्षित और योग्य हो संस्था प्रमुख हमेशा उसे हिकारत से देखता है  कई बार उसे उसकी हैसियत याद करवाता है। सारा का सारा खेल मुनाफे का है कुल मिलाकर चाटुकारिता भ्रष्टाचार के सहारे पूंजीपतियों ने शिक्षा व्यवस्था को अत्यंत दूषित एवं भ्रष्ट  कर दिया है जो पूरे देश में फैले भ्रष्टाचार और बिगड़ी अर्थव्यवस्था का मूल कारण है।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत के राज्य के हर गाँव, कस्बों पहाड़ी इलाका आदिवासी,इलाका, पिछडा इलाका, जहां शिक्षा की समुचित व्यवस्था न हो, जहां बिजली की व्यवस्था न हो, जहां के बच्चे लालटेन के नीचे पढते हों या लालटेन भी नसीब न हो, उनकी शिक्षा और भारत की राजधानी के कान्वेंट में पढने वाले बच्चे की शिक्षा समान हो।   कपडे बदल दीजिये इमारते बदल दीजिये लेकिन किताबें मत बदलिए यह समान शिक्षा पूरे भारत में लागू हो ।  बिना समान शिक्षा के लोकतंत्र मत्स्यतंत्र के समान है।  सरकार का शिक्षा पर नियन्त्रण शैक्षिक सुधारों की दिशा में पहला कदम होगा ।
डॉ पवन विजय (आई पी विश्वविद्यालय से जुड़े कॉलेज में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर)
09540256597

रविवार, 3 जुलाई 2016

बाज़ार में।

बिकने लगी है दुनिया अब तो बाज़ार में।
पैसे हैं जेब में तो आओ बाज़ार में।।

बदली हुई सूरत में हर शक्ल दिखेगी।
देखा नहीं जो अब तक देखो बाज़ार में।।

जो दिन के उजाले में हैं दिख रहे ख़ुदा।
खुलती हैं उनकी गलियाँ शब को बाज़ार में।।

वीरान गुलिस्ताँ में मरघट सी खा़मुशी।
भंवरों ने बेच डाला गुल को बाज़ार में।।

किस्मत तो देखिए कि बाज़ार का मालिक।
नीलाम हो रहा है अब वो बाज़ार में।।

घर जिनके अंधेरों में हर रोज़ हैं डूबे।
उनके ही दम उजालों! तुम हो बाज़ार में।।

पीले कनेर के फूल












पीले कनेर के फूल 
असाढ़ की बारिश
भीगी हुयी गंध।
जी करता है,
अंजुरी भर भर पी लूँ
गीली खुशबुओं वाली भाप।
और चुका दूँ सारी किश्तें
चक्रवृद्धि ब्याज सी
बरस दर बरस बढ़ती प्यास की।
चूर चूर झर रही
चंद्रमा की धूल, कुरुंजि के फूलों पे
कच्ची पगडंडियों से गुजरती
स्निग्ध रात उतर जाती है।
स्वप्नों की झील में
कंपित जलतरंग, दोलित प्रपात
फूट रहे ताल कहीं राग भैरवी के।
ओह्ह …
यह परदा किसने हटाया ?
कि धूप में पड़ी दरार
घाम में विलुप्त ख्वाब ।
रेत हुयी तुहिन बिंदु
ऐंठती हैं वनलताएं निर्जली प्रदेश में
सूखे काठ सा हुआ मन।
कौन है यवनिका?

डॉ पवन विजय के मुक्तक।





मन पर कितने घाव लगे हैं तुम्ही कहो मैं किसे दिखाऊं।
शब्दों पर भी दांव लगे  हैं तुम्ही  कहो मैं  किसे बताऊँ ।
पीड़ा का   चरणामृत   पीते  कथा  बांच  दी जीवन की
व्यथा कंठ पर पांव रखे है तुम्ही कहो मैं  किसे  सुनाऊँ।



बादल बिजली धरती अम्बर गीला कर बरसातें भींगी,
आपस में कुछ व्यथा कथा कह के दो जोड़ी आँखें भींगी। 
एक ज़माना बीत गया जब चाँद लिपट कर रोया था,
तब से कितने दिन भीगे और जाने कितनी रातें भींगी।



सुमिरन  छूटा   माला  रूठी मनके टूटे जापों में।
आशीषों ने मुँह फेरा तो ठौर मिला अभिशापों में।
गंगा में कर दिया प्रवाहित पुन्यों की बोझिल गठरी,
लो! मैं साझीदार  हुआ   हूँ आज तुम्हारे पापों में।




धूप खिली लाज की सांवरी अब क्या करे।
गंध हुयी अनावृत्त पांखुरी अब क्या करे।
सांकले खुलीं हैं आज सारी वर्जनाओं की,
अधर कांपते  रहे  बांसुरी  अब  क्या करे।


हवाएं मुझसे होकर तुम तलक तो जा रही होंगी
तुम्हारे द्वार पर सावन को फिर बरसा रहीं होंगी।
उन्हें छूकर समझ लेना हृदय की अनकही बातें,
कभी जो कह नहीं पाया वही बतला रही होंगी।

सोमवार, 9 मई 2016

डॉ पवन विजय के मुक्तक



मुक्तक 

  १. 
मैं बांच भागवत देता हूँ तुम मौन में जो कुछ कहती हो।
मैं विश्वरूप बन  जाता  हूँ मेरे आस पास जो रहती हो।
संतापित  मन मेघ बन  गया सुनकर के मल्हारी गीता,
मैं अर्जुन सा हो जाता हूँ  तुम  माधव जैसी लगती हो।


२. 
लहर पर बिछलाती है नाव।
धूप पर  बादल   डाले छाँव।
दिन असाढ़ के भीग रहे जैसे,
तुम्हारे  पायल  वाले  पाँव।।


३. 
पानियों में सिमटती रहीं बिजलियाँ।
मेरे छत पर सुलगती रहीं बदलियाँ।
अबके सावन की बूंदों में है खारापन,
बारिशों को भिगोती रहीं सिसकियाँ।


४. 
स्वाभिमान से  जीना  है तो लाचारी से दूर रहो 
रोटी   दाल  भली है पूड़ी  तरकारी से   दूर रहो 
चैन मिलेगा पैर पसारो जितनी लम्बी चादर है, 
उम्मीदों सपनों  को बेंचते   व्यापारी से दूर रहो 

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

सहरिया से आई जाओ बलमू

नून जईसे गले है उमरिया सहरिया से आई जाओ बलमू
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू

ओही सहरिया में उज्जर अन्हरिया
ओही सहरिया में उज्जर अन्हरिया,

अंगना में उतरी अंजोरिया सहरिया से आई जाओ बलमू
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू

ओही सहरिया में लाला के नोकरिया
ओही सहरिया में लाला के नोकरिया,  

ऊसर कईले खेत कियरिया सहरिया से आई जाओ बलमू
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू

ओही सहरिया में बईठी है सवतिया
ओही सहरिया में बईठी है सवतिया,

कहाँ गईले चंदा के चकोरिया सहरिया से आई जाओ बलमू
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू

नून जईसे गले है उमरिया सहरिया से आई जाओ बलमू
सून भईले कब से बखरिया सहरिया से आई जाओ बलमू






डॉ. पवन विजय के ११ मुक्तक

 मुक्तक 
1.
वासनाओं का जंगल शिवालय हुआ।
साम के गान का संग्रहालय हुआ।।
तेरे अधरों नें जब कर लिया आचमन
देह गंगा हुयी मन हिमालय हुआ।।

2.

जिसे ढूंढते जोगी रागी बस्ती बस्ती परबत परबत।
स्वर्णहिरन के अंतर्मन में कस्तूरी का नाम मुहब्बत।
मौसम पढ़ता गया रुबाई होंठ नदी के हुए सरगमी,
सूरज पर गेसू बिखरा कर रातें करती रहीं इबादत।

3.
फूल खिले हैं ताजे या तुम अपने होंठ भिगोये हो।
बारिश की बूंदे छिटकी हैं या तुम आँचल धोये हो।
पिघल रही है आज चांदनी जबकि हमारी आहों से,
हवा हुयी है गीली सी क्यों शायद तुम भी रोये हो
4.
पारिजाती गंध लिए महक रही बांसुरी।
अधर को  दबाये हुए पुलक उठी सांवरी।
आज लाज सो गयी स्नेह भरे अंक में,
चाँद जागता रहा और रात हुई माधुरी।

5.
जो दिल हारा हो उसके सामने फ़रियाद क्या करते,
मुसलसल टूटते वादों को फिर हम याद क्या करते।
किसी के कांपते होंठो ने मुझसे  कह दिया इक दिन  ,
नही थे तुम तो महफिल को सनम आबाद क्या करते।

6.
मैंने अंतिम विदा कह दिया फिर तुम जानें क्यों आये।
विष पीकर के प्यास बुझाई तुम अमृत घट क्यों लाये।
मधुमास उतारा क्या करते कुछ बची खुची सी साँसों पे,
जब मैंने पतझर स्वीकारा फिर तुम फागुन क्यों लाये।

7.
धूप ने लिए जो बोसे गुनगुनाए होंठ झील के।
हवायें हुयीं हैं शरबती जलप्रपाती गीत बोल के।
फ़िज़ाओं में फिर लौटे प्यार के हजार मौसम,
खुश्बुयें हुयीं हैं तरबतर जुल्फ तुम्हारी खोल के।

8.
तिश्नगी बुझती भी कैसे आब खारा रह गया
एक जूडस चूम के जीसस को प्यारा कह गया 
खेल सारा ख़त्म है अफ़सोस इतना जानेमन 
मैं समन्दर बाँध देता पर किनारा बह गया

9.

तुम ही थी उन बातों मेंसारा पर्याय तुम्हारा था। 
मेरी सारी परिभाषाओंका अभिप्राय तुम्हारा था।
मधुमासी रुत रही कुंवारी प्यासा बीत गया सावन
होंठ मगर कह सके नही कि जीवन हाय तुम्हारा था।

10.
टूटे स्वर हैं बिखरी लय पर साज उठाओ।
बड़ी घुटन है पुरवा को आवाज लगाओ।
नदी हो गयी रेत आचमन प्रतिबंधित है,
मेघों को मल्हार कोई तो आज सुनाओ।

11.
बचा कर चींटियों को रास्ते पर पाँव रखते हैं।
पाथर पूज लेते हैं कि पीपल छाँव रहते हैं।
हमारे बाग़ की ठण्डी हवा में एक डुबकी लो
कि चारो धाम के तीरथ हमारे गाँव रहते हैं।





महुवा चुवत आधी रैन हो रामा



चईता का रसास्वादन करिये...
++++
महुवा चुवत आधी रैन हो रामा,
चईत महिनवां।
महुवा चुवत आधी रैन हो रामा,
चईत महिनवां।
रस बरसत आधी रैन हो रामा,
चइत महिनवां।
रस बरसत आधी रैन हो रामा,
चइत महिनवां।
रतिया की बेरिया फूलत है अँजोरिया।
रतिया की बेरिया फूलत है अँजोरिया।
मन महकत आधी रैन हो रामा,
चईत महिनवां।
छुवेला परनवां रे पछुआ पवनवां।
छुवेला परनवां रे पछुआ पवनवां।
देहिंया लसत आधी रैन हो रामा,
चईत महिनवां
पापी बभनवां धरावे ना सुदिनवां।
पापी बभनवां धरावे ना सुदिनवां।
जियरा जरत आधी रैन हो रामा,
चईत महिनवां।
....@डॉ पवन विजय