बुधवार, 8 मार्च 2017

हे गोरी तनी बचि के रहू

 हमरे अंगना में आई जोन्हाई हे गोरी तनी बचि के रहू 
  तोहरे देहिया पे छाई फगुनाई हे गोरी तनी बचि के रहू
बगिया में लसे लसा चुवेला हो अमवा
कुहुके कोयलिया कि आवा हो फगुनवा
रस छलके त मनवा बऊराई तोहरे.... हे गोरी तनी बचि के रहू
तोहरे देहिया पे छाई फगुनाई हे गोरी तनी बचि के रहू
खेतवा में फूली सरसों महके महुववा
पुरवा नसे में झूमें हुलसे परनववा
काहे लेहलू तु अईसे अंगड़ाई... हे गोरी तनी बचि के रहू
तोहरे देहिया पे छाई फगुनाई हे गोरी तनी बचि के रहू
रंग में रंगाई गईले धरती गगनवा
होलिया मनावा हमरे संग में सजनवा
तोहके रंगबे आज भर अंकवारी .. हे गोरी तनी बचि के रहू
तोहरे देहिया पे छाई फगुनाई हे गोरी तनी बचि के रहू
(c) डॉ पवन विजय
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मंगलवार, 7 मार्च 2017

भभूती की दुलहिन और महिला दिवस

भभूती के दुलहिन की पहचान भभूती से १०० गुना ज्यादा है। मै आज तक भभूती को नहीं पहचान पाता हूँ पर भभूती की दुलहिन सारे गांव के दुःख सुख की साथी है। कोइ भी काम हो भभूती की दुलहिन बिना ना नुकुर किये हँसते  हुए हाजिर हो जाती थी अपनी साथिनों के साथ। आख़िरी बार उसके साथ मैंने १९९८ में पानी लगे हुए खेतों में धान रोपे थे। वह अक्सर मुझे चिढ़ाया करती थी कहती कि तुम मेंड़ पर बैठो... खामखा काम किये जा रहे ये सब हम मजूरों का काम है।मुझे मालूम था उसकी चतुराई.... वह एक और मजूर बढ़ाकर अपनी एक और  साथिन को काम पर लगाना चाहती थी। पूरे दलित बस्ती की नेता थी भभूती की दुलहिन। बाबू को देखकर चट्ट से घुंघुट काढ़ लेती थी पर हाथ हिला हिला कर ५ किलो गेहू एक दिन की मजूरी भी तय कर लेती थी। मजूरी से समझौता नही।

भभूती की दुलहिन को अपने जांगर पर भरोसा था पर भभूती  दिल्ली में कहीं गुलामी करने भाग गए थे । घर पर वही स्त्री अपने बच्चों की पिता भी थी। पर स्त्री का मन पुरुष न हुआ यही स्त्रीत्व की थिरता थी।

कछाड़ मारे एक दिन जब वह तलैया से करेमुआ का साग खोंट रही थी तभी  पीछे से जगलाली ने आवाज दी...
"अरे का रे दुलहिनिया संझौती क बखत होइगे घर चलु।"
"का घरे जाई अइया घरा त डिल्ली चला ग।"  कह कर भभूती की दुलहिन हाली हाली साग अपने कोंछ में डालने लगी।
जगलाली ने गहरी सांस ली और अस्फुट स्वरों में गुनगुनाने लगी...

सेर भर गोंहुआ बरिस भर खईबे,
तोहके जाइ न देबे हो।
रखिबे अंखिया के हजुरवा,
तोहके जाइ न देबे हो।।।

तलैया का  लालछिमा पानी खारा होने लगा..... जाने कितने लालछिमहे तालों का पानी खारा होता रहा । जाने कितने भभूती दिल्ली के होते गए पर उस औरत का मीठापन गाढ़ा होता रहा। इस बार गाँव गये तो उन्होंने हमें पहचान लिया हुलस कर मिलने आईं व्यथा कथा के साथ पर उसमे कही दारिद्र्य बोध या लाचारी नही बल्कि आत्म गौरव था पूरी ठसक के साथ आदिहूँ से सब कथा सुनाई। हम चुपचाप सुनते रहे।

पानी फिर से खारा होता रहा।

ऐसे ही एक महिला थी "कलुई" हम लोग उन्हें कलुआ फुआ कहते थे। राखी के दिन वह सारे गांव को राखी बांधती थी और नमकीन खिलाती थी। अपने पति की हिंसा और आचरण हीनता के खिलाफ उन्होंने यह तय किया कि वे ससुराल नही जायेगी और मायके में पिता के ऊपर बोझ नही बनेगी। बाभन कुल में पैदा होने के बाद भी उन्होंने हंसिया उठा कर मेहनत मजूरी को जीवन का सहारा बना लिया। गांव के बच्चे उन्हें चिढ़ाते " हे फुआ फुफा कहा गए" वह नकली नाराजगी लाते हुए मारने का अभिनय करती। जिंदगी भर उस आदमी (पति ) का मुंह नही देखा।

एक और स्मरण याद आता है। एक थीं मलाइन । उनकी शादी हमारे गाँव में हुयी थी। एक बच्चा पैदा होने के कुछ दिन बाद उनके पति की मृत्यु हो गयी। उन्होंने गाँव नही छोड़ा और न ही विधवा जीवन की लाचारगी स्वीकार की । दूसरी शादी की पूरे रोब के साथ। गाँव वाले लानत मलानत करते रहे पर वह निश्चल रहीं। आखिर थोड़े दिन बाद सब शांत हो गया और पूरा जीवन उन्होंने पूरी गरिमा के साथ जिया।

मै तब महिला सशक्तिकरण के मायने नही जानता था शायद अब भी बहुत कुछ नही जानता लेकिन एक बात अच्छी तरह जानता हूँ कि ये महिलाये स्वाभाविक सशक्तिकरण के सर्वोच्च उदाहरण है। आज वीमेन एम्पावरमेंट फैशन बनता जा रहा। फैशन से स्वाभाविकता नष्ट होती है।

लोग महिलाओ को डॉक्टर श्रमिक टीचर मॉडल एक्टर इत्यादि नही समझते बल्कि केवल एक औरत के नजरिये से देखते है और औरत को देखने का एक ही दृष्टिकोण है: देह

इस नजरिये से मुक्ति ही महिलाओ के सशक्त होने का मार्ग प्रशस्त करेगी महिला दिवस की अग्रिम  शुभकामनाये।

डॉ पवन विजय

सोमवार, 6 मार्च 2017

जोगीरा सा रा रा रा

जोगीरा सा रा रा रा 

ढोलक बाजे तासा बाजे अरु बाजे मिरदंग।
राम समुझ जी फाग सुनावे मची खूब हुडदंग। 
जोगीरा

कऊन छते पे चढ़ि के बोले कऊन गड़हिया तीर
कऊन अंगनवां भीतर बोले गावे कऊन कबीर। 
जोगिरा

पापा छत पे चढ़ि के बोलें चाचा गड़ही तीर
बीच अंगनवां भऊजी बोलें भईया कहे कबीर। 
जोगीरा

हम तो लछ्मण लछमण कहिके खूब बजाये गाल
तुम  टीपू के सत्ता खातिर हमैं कियो कंगाल ।
जोगीरा

भंइस हेरानी आजम खां की अगले दिन मिलि जाय
मंत्री परजापती हेराने मुख मंत्री मुस्काय।। 
जोगीरा

बोले टीपू अब तो कुरता करो फाड़ना बंद
खटिया पर बइठेंगे दोनों क्योंकि साथ पसंद ।
जोगीरा

नागिन नाच नीतीश नचावें लालू बजा के बीन
हम बिकास को ढूंढी रहे थे मिले सहाबुद्दीन ।। 
जोगीरा

मास बीति गए नौ से ज्यादा सुनो हो दिग्गी राय
खुसखबरी कब मिली अबतो साल खतम होइ जाय।
 जोगीरा

अचरज देखा भरी दोपहरी मफलर को चिपकाय
एक आदमी फागुन मासे कजरी रहा सुनाय। 
जोगीरा

आन देस का मुखिया देखो जग्य रहा करवाय
व्हाइट हाउस अबकी बारी केसरिया होइ जाय। 
जोगीरा

गाडी भागे मोटर भागे जेट बिमान उड़ि जाय
राजा मोदी सबसे आगे सुनि ल्यो कान लगाय। 
जोगीरा

फागुन आवा है जोगीरा तोहका रहे सुनाय
अच्छा लगा होइ तो रजऊ तुम देओ लइकियाय । 
जोगीरा

डॉ पवन विजय

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

बलम तुम निकले पानी के बोल्ला।

सिपहिया के भेसे में ठोल्ला
बलम तुम निकले पानी के बोल्ला।
छागल लियावे के बातें कहे थे
हमका सजावे के बातें कहे थे 
पहिनाए दिहे भंईसी के चोल्ला
बलम तुम निकले पानी के बोल्ला।
खाझा बताशा मिठाई की बातें
हमसे किहे रस मलाई की बातें
लेबिनचूसो न मिला बकलोल्ला
बलम तुम निकले पानी के बोल्ला।
सूरत तोहार यस कच्चा करइला
निमकउडिया के जइसन कसइला
बस बातें तोहार रस गोल्ला
बलम तुम निकले पानी के बोल्ला।

कामै खाली बोलत है।

धेला भर कछु करें धरें ना कामै खाली बोलत है।
इस्कूले से हस्पताल तक दामै खाली बोलत है।
ठेका उठिगै मनरेगा के बालू बिकी सोन के भाव
नेताजी के घर मा द्याखो जामै खाली बोलत है।
रोजा रखि रतजगा करावें सेकुलरई में जोड़ नही
रतिया कोकिल बोले मुरगा घामै खाली बोलत है।
नाम लिखा है माननीय का उदघाटन के पाथर पे
अगले रोज भसकि गै पुलिया झामै खाली बोलत है।
लालटेन भी रौसन नाही लरिका कईसे करें पढ़ाई
समाजबाद के पूत बिलाइत नामै खाली बोलत है।

हरियराना हमारी विरासत है

तुमने कहा ये वक्त तुम्हारा है
यह वक्त है तुम्हारे द्वारा आग लगाने का
आंधिया उठाने का
कच्ची खड़ी फसलों को बूटों से रौंद डालने का
घरों की दीवारो को ढहा देने का
जो चाहे मर्जी कर दो क्योंकि
तुमने कहा कि ये वक्त तुम्हारा है।
हमने होंठ सी लिए
तुम खुश हो जाओ और धरती पलट दो
हमे इन्तजार है उस वक्त का
जब तुम आग मूतोगे
उसी दिन हम हल लेकर निकलेंगे
तुम्हारी पलटी जमीन जोतने और बीज बोने
हमें इन्तजार है पछुआ हवाओं का
जब तुम्हारी लगाई आग जार देगी तुम्हारे ही छप्पर
हम उस राख से फ़स्ले उपजाऊ करेंगे
तुम्हारे मूतने को यूरिया में बदलकर
तिगुनी फसल घर ले आएंगे।
सुना नही तुमने हमारे पुरखे बांस थे
जिन्होंने डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड में
पक्के पोढे से लिखा कि
कीचड़ और कचरे के ऊपर कैसे
हचक कर जमा जाता है
हरियराना हमारी विरासत है
जिसे कोई कहके नही ले सकता।
तुम शायद आभास भी नही कर पाओगे
शक्ति बन्दूक से कभी नही निकली
शक्तिपुंज का पता घुटना और कमर नही
तुम जानते नही भोले मानुस
शक्ति का पता तो शिवत्व में है
देह को बैताल बनाये अपने कन्धे पे ढोने वालों
हम शान्ति और संतुलन से अभिमन्त्रित रहे हैं।
सिलटी दुपटी धोती और दो मुट्ठी चावल पर
हार गए थे तुम्हारे दोनों ऐश्वर्यलोक
ढाई पग और तुम्हारे आकाश पाताल
पीठ भी नही बची थी
भौतिक सुखों की ऋचाएं बनाते समय हमने गढ़ा
अपनी नियति 'केवल भिच्छा'
हमने उदघोष किया था विश्व का कल्याण हो।
सुनो परजीवी नम्बरदारों!
तुम घात लगाने की तैयारी में हो
किन्तु हम धान और गेहूं लगाने में व्यस्त हैं
अभी हमे नदियों का आँचल भरना है
फूलोे वाले खेतों को सींचना और गीत लिखने है
चाँद को तालाब में धोकर पलाश में सूरज भरना है
अरे कृतघ्नों !
हम रोटी बनाना बन्द नही करेगे
हमें तुम्हारे पेट की फ़िक्र है।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

उत्तर प्रदेश मैं बोल रहा हूँ, प्रश्न चिन्ह बन खौल रहा हूँ।

उत्तर प्रदेश मैं बोल रहा हूँ
प्रश्न चिन्ह बन खौल रहा हूँ।
अपराधों का बोझ उठाये
गांठे अपनी खोल रहा हूँ।

जाति धरम में बाँट बाँट कर
हिस्से हिस्से काट काट कर
मुझको कितना छला गया है
कितना मुझको जला दिया है

भूख गरीबी बेकारी बस
मेरे हक में लाचारी बस।
जहर बुझा गंगा का पानी
जमुना है गन्दी नाली बस

पत्रकारिता जल जाती है
इज्जत थाने लुट जाती है।
लड़कियां टंगी हैं पेड़ों पर
लड़कों से गलती हो जाती है।

रोज रोज व्यभिचार यहां पर
खतम हुआ रोजगार यहां पर।
जोखुआ पिटता रहा बंबई
सजती रही खूब सैफई ।

सीना मेरा  चाक हुआ है
दंगों में सब ख़ाक हुआ है।
खलिहानों से फसलें गायब
पुर्जा पुर्जा राख हुआ है।

नकली विद्यालय हैं अब तो
नकल परीक्षा होती अब तो।
जाहिल शिक्षाविद के चलते
चौपट हुयी पढाई अब तो।

गिरवी पर मैं रखा गया हूँ
शोषित वंचित किया गया हूँ।
जो भी आया जी भर नोचा
खुद को हारा समझ गया हूँ।

घायल हाथों से मैं अपनी
रुकती नब्ज़ टटोल रहा हूँ।
उत्तर प्रदेश मैं बोल रहा हूँ
प्रश्न चिन्ह बन खौल रहा हूँ।

डॉ पवन विजय

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

क्या देखता हूँ मैं तुम में

















पूछती हो मुझसे 
क्या देखता हूँ मैं तुम में
सुनो
तुम्हारे केश जल से भरी घटाएं
जो बरसती हैं सिर्फ 
मेरे कंधों पर
आँखों में तुम्हारी आईने
जिनमे दिख जाता है संसार का सौंदर्य सारा
होंठ तुम्हारे रंगरेज़
रंग लेते हैं अपने ही रंग में
मेरे अधरों को
बाहें तुम्हारी कोमल लताएं
जिन्होंने जोड़ लिया जीवन मुझसे
जाने किस आशा से
और कर दिया कोमल
मेरी ह्रदय शिला को भी
और सुनो
तुम्हारी गोद में
दुनियाभर का सुकून देखता हूँ
न पूछा करो मुझसे
कि क्या चाहता हूँ मैं
एक लंबा सफ़र तुम्हारे साथ बेमतलब सा
नदी किनारे बैठें हम तुम
पानी में पाँव डाले
लहरों को आता जाता देखते रहे
और
आसमानी कपडे पहने तुम
घुटनों पर चेहरा टिकाये
मुस्कुराकर देखती रहो मेरी आँखों में
और हवा से उड़तीं तुम्हारे लम्बी जुल्फें
नदी जैसी तुम्हारी कोमल काया
जगा देती हैं मेरे सोये सागर को
टूट जाते हैं सभी तटबंध मेरे भावों के तब
नहीं रहता मन में भय
किसी सीमा का
न किसी अनर्थ का ही
बस्स
बढ़ जाता हूँ मैं तुम्हारी ओर
हर मर्यादा को लांघ कर
हर अपकर्ष हर पतन को भूल कर
तुम भी तो करती हो
प्रतीक्षा मेरी
मुझसे मिलने के लिए
मुझमे घुलने और समा जाने के लिए
यूँ भी तो उतर जाता है सागर
अपनी नदी में

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

हिन्दी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता अभियान : किसी दूसरी भाषा का विरोध किये बिना हिंदी के लिए आग्रह कीजिए: अमिताभ अग्निहोत्री




मैंने अपने पत्रकारीय जीवन की 25 वर्षों की यात्रा में देश में कई आम चुनाव और राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव देखे ---समूचा देश घूमा --- चारों दिशाओं में --- लेकिन कहीं भी मुझे किसी भी चुनावी सभा में कोई नेता इंग्लिश में वोट मांगता नहीं दिखा --- केरल में भी नहीं और तमिलनाडु में भी नहीं --भारत में चुनाव की भाषा या तो हिंदी है या फिर राज्यों की अपनी अपनी भाषाएं ---यानि  वोट अपनी ज़ुबान में ही मांगे जाते हैं। लेकिन मुश्किल तब होती है जब चुनाव की भाषा अपनी जुबां होती है और सरकार की भाषा इंग्लिश हो जाती है। देश का राजकाज उस भाषा में ही होना चाहिए जो भाषा अधिकाँश आम जनता समझ और जान सके। हाँ , सम्पर्क भाषा के रूप में इंग्लिश भी रहे -- लेकिन वह प्रथम भाषा नहीं हो सकती इस देश की। बैसे भी यह कुछ अनैतिक सा ही लगता है की आप वोट एक भाषा में मांगते हैं और सरकार दूसरी भाषा में चलाते हैं। यह आम जन के साथ छल जैसा ही है। अपने घर के जेवर और खेत बेंच कर ननकू जो मुकदमा लड़ता है , उसका फैसला आने पर उसे अपने वकील से पूछना पड़ता है कि वकील बाबू , हम जीते कि हारे। ना बहस की भाषा उसकी और ना फैसले की। इलाज़ में भी यही ---- जो डॉक्टर बता दे बही रोग और बही इलाज़ मानना होगा ननकू को --- क्यूंकि यंहा भी इलाज़ और जांच की जो भाषा है , वह ननकू की भाषा नहीं है। ऐसे असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं जो देश के लोक जीवन में विसंगतियां पैदा कर रहे हैं। ------- यह विसंगतियां देश की प्रगति को भी वाधित कर रही हैं। भाषा माध्यम है , और माध्यम अपना ना हो तो अवरोध स्वाभाविक हो जाता है। एक बात उन सभी से भी जो हिंदी को दुलार करते हैं। हिंदी को लेकर हमें अहसास-ए -कमतरी से उबरना होगा। अपनी माँ को लेकर संकोच या शर्मिंदगी क्यों और कैसी ??------- आपको अच्छी हिंदी आती है तो उसी में बोलिए --- अशुद्ध इंग्लिश का मोह क्यों पालें ?कुछ खरीदने जाएँ तो हिंदी में ही संवाद करें --- बच्चे स्कूल में इंग्लिश सीखें , अच्छी बात है , पर आप जब बच्चे के अध्यापक से मिलें तो हिंदी में ही बात करें -- बच्चे की प्रगति हिंदी  में  पूछी जा सकती है। कोशिश करिये डॉक्टर और वकील से भी हिंदी में ही बात हो। यकीन मानिए , आप हिंदी में बोलेगे तो जिन्हे हिंदी नहीं आती वो डॉक्टर और वकील भी हिंदी सीखने को मजबूर हो जाएंगे ---- धंधे का मसला जो है। जो व्यापार कर रहे हैं भारत में , उन्हें भारत की भाषाएँ सीखनी ही होंगी अगर हम चाह लें तो। जैसे अगर हम ब्रिटेन में कारोबार करना चाहते हैं तो हमें इंग्लिश सीखनी ही होगी। इसलिए अगर हम कमर कस लें तो भरोसा रखिये हर कारोबार करने वाला हिंदी में ही बोलेगा और लिखेगा। यही दबाब सरकारों पर भी बनाया जा सकता है , शर्त बस यही है की हम और आप चाहलें। तो आइये , आज और अभी से शुरुआत करें -------- किसी दूसरी भाषा का विरोध किये बिना हिंदी के लिए आग्रह कीजिए ।