रविवार, 26 फ़रवरी 2017

कामै खाली बोलत है।

धेला भर कछु करें धरें ना कामै खाली बोलत है।
इस्कूले से हस्पताल तक दामै खाली बोलत है।
ठेका उठिगै मनरेगा के बालू बिकी सोन के भाव
नेताजी के घर मा द्याखो जामै खाली बोलत है।
रोजा रखि रतजगा करावें सेकुलरई में जोड़ नही
रतिया कोकिल बोले मुरगा घामै खाली बोलत है।
नाम लिखा है माननीय का उदघाटन के पाथर पे
अगले रोज भसकि गै पुलिया झामै खाली बोलत है।
लालटेन भी रौसन नाही लरिका कईसे करें पढ़ाई
समाजबाद के पूत बिलाइत नामै खाली बोलत है।

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-03-2017) को
"खिलते हैं फूल रेगिस्तान में" (चर्चा अंक-2602)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक