गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बड़भागी होकर आया हूँ।

धुली धूप और खिली जुन्हाई गाँव से लेकर आया हूँ, 
अम्बर भर आशीष लिए मैं माँ से मिलकर आया हूँ। 

कच्ची मिट्टी कच्चे पानी से ही फसलें पकती हैं, 
बाबा की यह बात पुरानी गाँठ बाँध कर लाया हूँ।


सात रंग के  बादल जब अमृत रस बरसाते हैं, 
सरसों के फूलों के रस गुड से मीठे हो जाते हैं। 

सूरज की थैली से जुगनू लिए उजाले फिरते हैं ,
मौसम की झोली से मैं भी कुछ दाने ले आया हूँ। 

मैनें देखा खेतों में खुशियों की बुआई होती है, 
मैनें देखा हर घर में रिश्तों की चिनाई होती है।  

श्रम के स्वेदकणों से मैनें अंचलगीत महकते देखे,
गाँव की माटी माथे रख बड़भागी होकर आया हूँ। 

 

5 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

श्रम के स्वेदकणों से मैनें अंचलगीत महकते देखे,
गाँव की माटी माथे रख बड़भागी होकर आया हूँ।
..गाँव की मिटटी की सौंधी सुगंध से भरी सुन्दर प्रस्तुति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (13-09-2014) को "सपनों में जी कर क्या होगा " (चर्चा मंच 1735) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt ने कहा…

सुन्दर रचना...

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

मैनें देखा खेतों में खुशियों की बुआई होती है,
मैनें देखा हर घर में रिश्तों की चिनाई होती है।

श्रम के स्वेदकणों से मैनें अंचलगीत महकते देखे,
गाँव की माटी माथे रख बड़भागी होकर आया हूँ।

बहुत सुन्दर १
दिल की बातें !

Onkar ने कहा…

वाह, बहुत खूब