रविवार, 3 अगस्त 2014

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया (kajali)

पिछली लिखी कजली पर मिले प्यार से अभिभूत हूँ। उसे  कविता कोष के लोकगीत में शामिल किया गया है। मुझसे कई मित्रों ने एक और कजली लिखने की फ़रमाईश की थी जिसे आज मैं पूरी कर रहा हूँ।  प्रस्तुत कजली की धुन
पूर्व से अलग है। आनंद लीजियेगा।
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सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

घर में बाटी हम अकेली,
कउनो संगी ना सहेली
पापी पपिहा बोले बीचोबीच अटरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

चारो ओर बदरिया छाई
हरियर आँगन मोर झुराई
सजना पठये नाही कउनो  खबरिया 
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

छानी छप्पर सब चूवेला
देहिया भींज भींज फूलेला
अगिया लागे तोहरी जुलुमी नोकरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।


1 टिप्पणी:

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।