गुरुवार, 17 जुलाई 2014

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ

जमुना पार करते ही बारिश शुरू हो गयी।  हेलमेट उतार दिया।  टिप्प टिप्प झर झर फिर तो कहना ही क्या हरहराती हुयी मंदाकिनी शिव की जटाओं पर। थोड़ी देर बाइक खड़ी कर इधर उधर देखा कोई नहीं था तो लगे  छपकोरिया करने।  मेघ पूरी ताकत के साथ बरस रहे थे।  प्यासी जमुना आँचल भर भर सारी बूंदो को सहेजने में लगी थी और आस पास के पेड़ अपनी पत्तियों और शाखों को फैलाये सारा जल पी जाने को आतुर। 
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तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ-साथ
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अचानक भीगते भीगते अपने खेत में पहुँच गये। देखा भभूती की दुलहिन कछाड़ मारे घुटनों को मोड़े धान लगा रही थी।  साथ में काम करने वालों को ललकारती जा रही थी ज़रा हाली हाली हाथ चलाओ पहँटा लंबा है। कुछ गाती भी जा रही थी..  
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मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी 
एक हाथ लेले हउवे बांस के चंगेरिया 
दुसरके तलवारिया रे छोटी ननदी  
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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सातो रे भइया के एक है दुलरिया 
देखि देखि कईसन बोले ई पापी बोलिया 
कटरिया ज्यों निकारो रे छोटी ननदी 
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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अचानक घुप्प अंधेरा।  छक छक बरसता काला पानी। मेरा छप्पर चूने लगा। हवाएँ तेज।  छप्पर दूसरी जगह से चू रहा।   मूँज वाली खटिया से लेवा समेट की कोशिश। कथरी लेवा समेत कर उस पर बैठ गया।  काला पानी पूरी ताकत के साथ छप्पर पर गिर रहा था। बिजली कड़की दूर किसी के चिल्लाने की आवाज " अरे माई  चिर्री पडी रे गोलारे के घरे पे... भीतिया त भहरान " टाटी से बारिश का झर्रा पूरी देह को तर किये जा रहा । कथरी पूरी गीली हो गई । रात भर भीगता सोच रहा कि हमारा बुद्धू बछवा  कईसे पूँछ दबाये कुड़कुड़ा रहा होगा।  चरनदास की गायें खुले में रहती है कैसे बचेंगी बारिश में।  

रात  भर सोया नहीं धरती से कस्तूरी फट पडी है आस पास उठती सोंधी खुशबू नथुनों से होती हुयी माथे तक पहुँच रही,ऐसा लगा किसी ने माथे पर महकती हथेली रख दी हो । एक भीगा सिमटा अक्स आँखों के सामने आ जा रहा। परवीन गा रही है। 
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बचपने का साथ, फिर एक से दोनों के दुख
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ-साथ

लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे अज़ीब
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ
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उसके काजल से पानी का रंग काला हो गया।  मेघ भी काले हो गए। रात काली हो गयी। 

ओह्ह यह क्या हुआ। 

उसने आँखें खोली सुब्बह हो गयी। 
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साहेब सुबह कब की हो गयी आज का कॉलेजवा नहीं जावोगे।  दूध वाला बाहर चिल्ला रहा था और मैं अभी तय नहीं कर पा रहा था कि जो देख सुन रहा वो ख्वाब है या जो देखा वो।

4 टिप्‍पणियां:

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

गाँव के घरों में बारिश एक सजा होती है और फिर जो सिर छिपाने के लिए सिर्फ छप्पर के सहारे हों। उनके निर्मल मन की बानगी कि अपने साथ साथ गाय और बछड़े की चिंता भी साल रही है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-07-2014) को "संस्कृत का विरोध संस्कृत के देश में" (चर्चा मंच-1679) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

वाह, क्या बात है ?

Pratibha Verma ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति।