बुधवार, 2 जनवरी 2019

मेरा भाई नेवला

हम बचपन में जो कुछ पढ़ते सुनते हैं उसका असर पूरी उम्र तक बना रहता है. इस दुनिया को वही व्यक्ति बेहतर बना सकता है जिसके अंदर बचपने का भाव बना हुआ है. वाल्ट डिज्नी के बनाए कार्टून चित्र से लेकर हैरी पॉटर की लोकप्रियता केवल बच्चों तक ही सीमित नही है बल्कि इसे बड़े भी बढ़ चढ़ कर देखते पढ़ते हैं, कम से कम मैं तो यह स्वीकार करने में कोई हर्ज़ नही समझता कि होम अलोन, बेबी डे आउट, जाग्रति, दोस्ती जैसी फ़िल्में आज भी टीवी पर आती हैं तो मैं बिना देखे नही रह पाता. मुझे याद है कि बचपन में नंदन और कॉमिक्स हम बच्चों के हाथों में आने से पहले पिताजी या बड़े भाइयों के हाथों में होती थी तब उस बात को लेकर गुस्सा आता था कि बच्चों की पत्रिकाए और कहानियां बड़े क्यों पढ़ते हैं तो उसका जवाब आज मेरी बेटी के गुस्से में मिलता है जब मैं उसकी कहानियों की किताबें या पत्रिकाएं पढने के लिए उससे छीनने की कोशिश करता हूँ.
कई बार इस बात पर चर्चा होती है कि भारत में विदेशी पात्रों वाली ही बाल कहानियाँ बच्चों को पसंद आती हैं. वे पंचतंत्र या गूढ़ नैतिकता वाली कहानियों को पढने की बजाय फिक्शन वाली कहानियों यथा ‘एलिस एच इन वंडरलैंड’ को पढ़ना ज्यादा पसंद कर रहे हैं. मैं मानता हूँ कि
‘एलिस एच इन वंडरलैंड’ दादी नानी के परियों के किस्से कहानियों जैसा ही है. इसी बात को आधार बनाते हुए बचपन में सुने गये किस्से कहानियों की तर्ज़ पर मैंने ये बाल कहानियाँ लिखी हैं. सबसे मजेदार बात यह है कि पहले इन कहानियों को मैंने छः से बारह साल के बच्चों को पढने को दिया जब उन्होंने इसका रिव्यु ‘ अरे मजा गया’ के रूप में मिला तब मैंने इसे प्रकाशक को छापने के लिए दिया. कहानियों की एडिटिंग में मेरी बेटी गौरी ने मेरी बहुत मदद की साथ ही सुरेश पाण्डेय जी और राघव पब्लिकेशन का धन्यवाद जिन्होंने इसके अतिशीघ्र प्रकाशन को सुनिश्चित किया.
डॉ. पवन विजय

1 टिप्पणी:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 06/01/2019 की बुलेटिन, " सच्चे भारतीय और ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !