गुरुवार, 11 मई 2017

दिल्ली मेट्रो बरबादी की ओर : शहरी मंत्रालय और डीएमआरसीगण कृपया ध्यान दें (DMRC)


दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन द्वारा बढाए गये किराए की दर ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि इस देश में नीति निर्माण और क्रियान्वयन में कोई सामंजस्य नही है अथवा कोई फ्रांस की रानी जैसा शख्स निर्णय ले रहा है और कोई हिटलर जैसा उसे कार्यान्वित कर रहा है। दिल्ली मेट्रो पूरी तरह से राजधानी की लाइफ लाइन है। आपको बताते चलें कि रोजाना लगभग 27 लाख यात्रियों को ढोने वाली दिल्ली मेट्रो को घाटे में बताया जा रहा है।
शहरी विकास मंत्रालय से जुड़े तथ्यों को मानें तो 2013-14 में मेट्रो को लगभग 61 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। दिल्ली मेट्रो ने इस वर्ष ऑपरेशन ऐंड मेंटिनेंस पर 2,322 करोड़ रुपये खर्च किया जबकि उसने जीका से जो लोन लिए हैं, उसके ब्याज के तौर पर 227 करोड़ रुपये चुकाए और डेप्रिसिएशन 1,288 करोड़ रुपये का हुआ। इस तरह उसका खर्च 3,837 करोड़ रुपये वार्षिक रहा अतः दिल्ली मेट्रो को एक साल में 275 करोड़ रुपये का तथाकथित नुकसान हुआ है। मेट्रो घाटा बढ़ने की वजह जो बताई जा रही वह यह कि एक तो ब्याज की राशि बढ़ी है और दूसरा डेप्रिसिएशन के मद में भी राशि बढ़ी है।

मैं इन सब बातों से सहमत होते हुए शहरी मंत्रालय और डीएमआरसी से कुछ प्रश्न करना चाहता हूँ।

1.जब यात्री तिगुने से भी ज्यादा मेट्रो में सफ़र कर रहे हैं तो घाटा कैसे हुआ ?
2.आपने कर्ज लिया कर्ज लेते समय क्या आपने खर्चों का आकलन नही किया था ?
3.यदि आपके पास खर्च करने के पैसे नही थे तो मेट्रो के प्रॉफिट का इंतजार कर के नये प्रोजेक्ट नही लगा सकते थे ?
4.आपने विज्ञापन, मेट्रो कार्ड की जमा राशि वापस करना या मेट्रो यात्रा के घंटे निर्धारित करने जैसे कुछ और कदम नही उठा सकते थे?
5.25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी तो समझ में आती है किन्तु 66 से 90 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी क्यों ? जो दूर तक जा रहा है उसकी जेब पर डाका क्यों?
6.आपने जनता से राय लेकर किराया बढ़ोत्तरी का प्लान बनाया था पर जनता से बिना राय लेकर आपने मनमानी थोप दी।
7.शहरी मंत्रालय ने किराया बढाने पर सहमति देते वक्त कल्याणकारी राज्य और अच्छे दिनों की रूपरेखा को भूल बैठा था क्या?
8.विद्यार्थियों महिलाओं और बुजुर्गों का ख्याल रखने जैसा क्रूर फैसला आप कैसे ले सकते हैं। मेट्रो में महिलाये सुरक्षित सफ़र करती हैं। बुजुर्ग आराम से लम्बी दूरी तय कर लेते हैं विद्यार्थियों के अध्ययन के समय पैसे दोनों में बचत होती है इन सबका ध्यान क्यों नही रखा गया ?
9.गरीब तबका मेट्रो में चलकर खुद को मुख्य धारा से जोड़कर देखने की कोशिश करने लगा था वह फिर से बस की छत के ऊपर दरवाजे पर या कैब में भेंड बकरियों की तरह ठूंस कर आने को अभिशप्त होगा। योजना बनाते समय इन बातों का ध्यान क्यों नही रखा गया।
10.उच्च एवं मध्यम वर्ग धीरे धीरे मेट्रो से आने जाने को तरजीह देने लगे थे किन्तु किराया बढ़ाने से वह वापस कार की तरफ मुड़ जायेंगे जिससे भयंकर पर्यावरण प्रदूषण, सड़कों की बुरी दशा और ट्रैफिक समस्याएं फिर से दिल्ली को अपना ग्रास बनाएंगी।
11.मेट्रो से यात्रियों के कम होने से मेट्रो और घाटे में चली जायगी जहां से वह कभी उबर नही पाएगी।

यह मात्र अर्थ से जुडा मुद्दा नही वरन भयंकर नीतिगत खामियों का पुलिंदा है यदि उपर्युक्त बिन्दुओं पर विचार नही किया गया तो दिल्ली मेट्रो को कानपुर की टेक्सटाइल मिलों के खण्डहर में बदलने से कोई रोक नही पायेगा। अस्तु मेट्रो नीति निर्माताओं और शहरी मंत्रालय से अनुरोध है कि दिल्ली के लोगों के हित में मेट्रो के हित में अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करें।