शनिवार, 6 मई 2017

पाकिस्तान से रिश्ता क्या ... ला इलाही इल्लिल्लाह।

जम्मू कश्मीर की मूल समस्या और उसका निवारण

जम्मू कश्मीर की समस्या कहने से ऐसा बोध होता है कि यह सम्पूर्ण कश्मीर की समस्या है जबकि यदि हम कश्मीर के तीनों भागों को देखें तो न तो जम्मू में किसी किसिम की अशांति है और न ही लद्दाख में कश्मीर में अशांति है लेकिन वह भी एक सीमित समुदाय द्वारा प्रायोजित हिंसा के कारण है कश्मीर में हिन्दू मुसलमान और बौद्ध मुख्यतया रहते हैं  मौजूदा समस्या में एकमात्र कश्मीरी मुसलमानों की ही भागेदारी दिखती है तो सवाल उठाता है कि यह समस्या कश्मीर की है या कश्मीरी मुसलमानों की आंकड़े कहते हैं कि कश्मीर में उपद्रव फैलाने वाले एकमात्र कश्मीरी मुसलमान ही हैं कश्मीर में एक नारा चलता है आजादी का मतलब क्या ..  ला इलाही इल्ल्लिल्लाह , पाकिस्तान से रिश्ता क्या..  ला इलाही इल्ल्लिल्लाह कहने का मतलब ये है कश्मीर का मसला राजनैतिक या वहाँ के पिछड़ेपन से क्षोभ से नही बल्कि खालिस  “कट्टर इस्लामिक रिकग्निशन”  से जुडा हुआ है यह एक डेवलपमेंटल  इशू   नही वरन “वहाबी फैलाव” का मुद्दा है 
सरकारें इस बात को समझती हैं या नही समझती हैं पर खुल्ला खेल जारी है अलगाववादी गिलानी जो भारत के हवा पानी दवाओं और सुरक्षा पर ज़िंदा है बोलता है कि यदि कश्मीर  सड़कें सोने से भी भर दी जाएँ फिर भी वह प्रतिरोध करना नही छोड़ेंगे इस कथन के क्या निहितार्थ हैं ? इसके मायने यह हैं कि जो 80 हजार करोड़ की रकम सूबे को अनुदान के तौर पर दी गयी उससे कश्मीर में रोजगार और विकास आयेगा स्थिरता आयेगी या घाटी शांत हो जायेगी ऐसा सोचना बेवकूफी होगी आप पत्थर फेंकने वाले हाथों में लैपटॉप देने की बात कर रहे हैं वह लैपटॉप को पत्थर के मानिंद आप पर फेंकेंगे आप कहते हैं कि इनके  एक हाथ में कुरआन दूसरे हाथ में लैपटॉप हो तो जान लीजिये यह एक अत्यंत खतरनाक स्थिति है कुरआन की आयतों की व्याख्या  अपनी सुविधानुसार करके लोगों को भडकाने उकसाने और भावनात्मक दोहन का काम निरंतर चल रहा है ध्यान दिया जाय कि पुरानी आदत और नई तकनीक भयंकर परिणाम देती है आदत पत्थर फेंकने की है तो लैपटॉप से ये बम बनाकर फिर उसे फेंकेगे अगर सरकार इन्हें लैपटॉप देने को उतारू ही है तो इनके हाथ में संविधान देना पड़ेगा
 कश्मीर को आजाद करने की मांग करते हुए कश्मीरी मुसलमान भूल जाते हैं कि कश्मीर सनातन हिंदुत्व का सबसे बड़ा केंद्र रहा है साधना संस्कृति विज्ञान और सनातन  जीवन पद्धति की जड़ें यहाँ सबसे गहरी रही हैं अगर कश्मीर पर किसी ने अतिक्रमण किया है तो वह अरबी विचारधारा ने किया है और कायदे से उसे वहाँ से जाना चाहिए ताकि कश्मीर स्वतन्त्र हो सके तो समस्या के मूल में विचारधारा है कि कोई और कारण यह विचारधारा वहाबी आतंक  विचारधारा है  हरकत-उल-अंसार (मुजाहिद्दीन), जैश--मोहम्मद, लश्करे- तोएबा, अल बद्र, अल जिहाद, स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) और महिला आतंकवादी संगठन दुख्तराने-मिल्लत जैसे दुनिया के सौ से ज्यादा आतंकवादी संगठनों के सरगना वहाबी समुदाय के ही हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ, पाकिस्तानी की गुप्तचर संस्था आईएसआई के प्रमुख, बंगलादेश की पूर्व राष्ट्रपति खालिदा जिया, कंधार अपहरण कांड का मुख्य आरोपी अजहर मसूद और सलाहुद्दीन,  मुंबई बम कांड का मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम सहित भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनेक अध्यक्ष और अन्य जिम्मेदार पदों पर आसीन लोग वहाबी विचारधारा को मानने वाले हैं। देवबंद विश्वविद्यालय के कुलपति  अल नदवी भी कट्टरवादी विचारधारा के समर्थक रहे हैं वहाबियों के  अनुसार   मजहब के आदेश तब तक लागू नहीं होंगे जब तक इस्लामी आधार और व्यवस्था का नियंत्रण स्थापित नहीं हो जाता। कश्मीर उसी वहाबी फैलाव के चपेटे में है जो एक एक दिन  केवल कश्मीर ही नही वरन इस्लाम के अन्य फिरकों के लिए भी घातक साबित होगा और हजरत बल दरगाह पर हमला इस बात का सबूत है।
भारत सरकार ने समस्या को नासूर बनाने में अपनी अहं भूमिका निभाई है पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फिर आने वाली तमाम सरकारों तक ने इसमें अपना अपना योगदान दिया चाहे वो रुबिया सईद अपहरण हो, हजरत बल दरगाह पर चंद आतंकियों  के सामने सत्रह सौ जवानो के हाथ बाँध कर सेना का मनोबल तोड़ने वाली बात हो या हाल ही में फौजियों का थप्पड़ खाना कोई भी प्रधानमन्त्री नेहरु की प्रेत छाया से मुक्त होने का साहस नही कर पाया  वर्तमान सरकार भी अभी नेहरु की नीतियों पर चलती प्रतीत होती है लाचारी को संयम का नाम देकर चलने वाली विदेश नीति भारत का कितना भला कर सकती है यह पिछले सत्तर सालों में हमने देखा कश्मीरी पंडितो का कश्मीर से भागना उन लोगों की भीरुता के साथ सरकार का उनको सुरक्षा दे पाने की बात की पुष्टि करती है क़ानून और संविधान को ठेंगे पर रखकर चलने वाले लोग अक्सर दिल्ली की गलियों में केन्द्रीय मंत्रियो के साथ  बिरयानी की दावत उड़ाते या पंच तारा होटल में जाम टकराते दिख जाते हैं सरकार को सबसे पहले इन्हें निपटाना होगा।कश्मीर की डेमोग्राफी में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है।  देश के विभिन्न भागों से लोग कश्मीर आएं ऐसी व्यवस्था करनी होगी।   भडकाने वाले तत्वों को पहचान  कर उनकी असलियत उनके अनुयायियों के सामने रखनी होगी फिर सुपर 30 जैसे दर्जनों संस्थानों को  कश्मीर के हर कोने पर स्थापित करना होगा कठमुल्लों को उनकी जगह दिखानी होगी अस्टिन के सांपो को पालकर नही वरन उन्हें कुचलकर ही उनपर लगाम लगाया जा सकता है नौजवानों को खेल सिनेमा संगीत  साहित्य और भारतीय जीवन पद्धति की तरफ मोड़ने के लिए चरणबद्ध और संगठित प्रयास करने होंगे ऐसे लोगों को आइकॉन के रूप में विकसित करना होगा जो कश्मीर को दिल्ली के नजदीक ला सकें जो  कश्मीरी हिन्दुस्तानी पद्धति को प्रात्साहित करेगा उसके जीवन को खतरा भी होगा तो भारत सरकार को ऐसे एक एक कश्मीरी को अगर जेड सिक्यूरिटी भी देनी पड़े तो दे  घुसपैठ और आतंकी शिविरों पर हर हप्ते स्ट्राइक हो सेना पर पत्थर उठाने वालों के साथ कोइ रियायत हो भारत सरकार को एक हाथ में गुलाब और दूसरे  हाथ में तलवार लेकर चलने की नीति  का पालन करना होगा तभी   हम इस  समस्या के समाधान की सोच सकते हैं