बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

अभया..................... बन पाती तुम कैसे

अभया..................... बन पाती तुम कैसे।
माना मुझसे प्यार नही था
मेरा कुछ अधिकार नही था,
विनिमय किये भाव के मैंने 
लेकिन यह व्यापार नही था।
निर्बंधों के सम्बन्धों में बंध पाती तुम कैसे ।
अभया...................... बन पाती तुम कैसे।
कहा सभी अनकहा रह गया
पत्थर सा मैं पड़ा रह गया,
स्पर्शों में चन्दन था पर
घाव हरा का हरा रह गया ।
निष्ठुर जग की माया से बच पाती तुम कैसे।
अभया...................... बन पाती तुम कैसे।
प्राणों का घट सूख चला अब
जीवन बाती फूंक चला अब,
स्मृतियाँ सब होम हो गयीं
स्नेह! स्वयं से दूर चला अब।
कहो शुभे रीते अंतर्मन में रह पाती तुम कैसे।
अभया...................... बन पाती तुम कैसे।

4 टिप्‍पणियां:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27-10-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2508 में दिया जाएगा ।
धन्यवाद

Alaknanda Singh ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत रचना

Alaknanda Singh ने कहा…

रात्रि सर्प कहीँ अद्रश्य
तू ही तू तेरे ही द्रश्य... बहुत बढ़िया

Madan Mohan Saxena ने कहा…


बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |


मंगलमय हो आपको दीपों का त्यौहार
जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार