मंगलवार, 23 जून 2015

बहुत दिनन में गाँव गये थे

बहुत दिनन में गाँव गये थे
गाँव की बातें बता रहे हैं
बेंच नथुनिया दुलहिन के
निरहू इंटरनेट चला रहे हैं।
पात पियरकी लटकी ठाहे
हरियर हरियर सभै झर गई
गइया मर गई खूंटे बंधकर
अऊर गदहिया खेत चर गई।
पालीटिकस के चक्कर में
अब काहे की यारी लाला
सौ सौ जजमानी पर एक्के
परधानी है भारी लाला।
खेत कियारी बेंच बांच के
जोखुआ दिल्ली भाग गया है
कउवा हंकनी भै मेहरारू
लड़िकन बच्चन नास किया है।
नवा नवा नौठम चिखुरी के
लग्गी से पानी पिया रहे हैं
खेती बारी ऊसर बंजर
हाथ पे सरसों उगा रहे हैं।
आधा गउवां बसा कचेहरी
रोज रोज फऊदारी कईके
बाकी के सारे चऊपट भै
नेतवन के हंकवारी कईके।

4 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जीना सब को नहीं आता - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Jitendra tayal ने कहा…

अति उत्तम
वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर !

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत खूब