शनिवार, 29 मार्च 2014

जाने कब से खोये हो?

शबनम है फूलों पर या तुम अपनी पलक भिगोये हो 
हवा हुयी है गीली सी क्यूँ, शायद तुम भी रोये हो? 

तेरे कंधे पे सर रखकर चाँद को ढलते देखा था 
सच बतलाना उन यादों को, क्या अबतक संजोये हो? 

वो फ़स्लें अब जवां हो गयी जिसको हमने रोपा था
बचे हुए 
दाने इस बारिशक्या आँगन में बोये हो ?

कितने लोग मिले पर जाना तुम सा कोई नही मिला
वापस आओ इन बाहों में, जाने कब से खोये हो?