मंगलवार, 4 मार्च 2014

बड़ी कच्ची गिरस्ती है।

वैसे तो यह रचना सभी के लिए है किन्तु इसे मै अपने सभी शिक्षक बंधुओं को समर्पित करता हूँ जो प्राइवेट संस्थानो में बंधुआ मजदूरी कर किसी तरह परिवार का पालन पोषण कर रहे है। 
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इक छोर सिलता हूँ दूसरे पर उधड़ती है, 
मशक्कत चल रही बाबा बड़ी कच्ची गिरस्ती है। 

इस शहर को छोड़ा कभी उस शहर को थामा, 
फ़कत इक वास्ते रोटी के सब मौकापरस्ती है। 

ये टुकड़े चंद कागज़ के तगादे सौ जमाने के, 
महीने में दिखेगा चाँद ये मालिक की मरजी है।

गृहस्थी ट्रक पे लादे चिर किरायेदार हम तो है,
रेत के भाव ऊँचे हो गये तनख्वाह रत्ती है।

बच्चे की जिद को माँ कुछ ऐसे चुप कराती है,
ये टैडीबीयर गंदा है वो छोटी कार अच्छी है।