मंगलवार, 5 अगस्त 2014

मोरी जमुना जुड़इहें ना।

आज  डी एन डी पुल से  यमुना का जो मनोहारी रूप देखा रहा नही गया।  बाइक खड़ी  कर नीचे कछार में  कूद गया।  ठंडी जमुन जलधार को हथेली में लिया माथे लगाया। हल्की हल्की फुआर पड़ रही थी। कछार से निकल कर जब कॉलेज के लिए चला तो कुछ पंक्तियाँ अपने आप फूटने लगी जो आपके सामने हैं। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

मद्धिम मद्धिम जल बरसइहो 
मोरी जमुना अघइहें ना।  

कदम के नीचे श्याम खड़े हैं 
मुरली अधर लगाये  

बंसिया बाज रही बृंदाबन
मधुबन सुध बिसराये 

हौले हौले पवन चलइहो 
मोरी जमुना लहरिहें  ना।  

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 

रस बरसइहो बरसाने में 
भीजें राधा रानी 

गोपी ग्वाल धेनु बन भीजें 
भीजें नन्द की रानी 

झिर झिर झिर झिर बुन्द गिरइहौ 
मोरी जमुना नहइहें ना। 

रिमझिम रिमझिम घन घिर अइहो 
मोरी जमुना जुड़इहें ना। 



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सोमवार, 4 अगस्त 2014

सइकिल से हीरोहंडा हो गईल।



सभी  दिल्लीमेड पुरबिया छात्रों  को समर्पित  

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बबुआ जबसे भईले दिल्ली के पढ़वईया 
सइकिल से हीरोहंडा हो गईल। 

जबसे लेहले बा एडमीसन 
भूला जवनपूर के लच्छन 

पौडर मलि मलि करिया रंग रहे छोडईया   
कि बचवा मोंछमुंडा हो गईल। 

सारा दिन कैम्पस घूमेला 
एक दुई लड़िकिन के लिहेला 

गईले अफसर बनने बन गईले नचईया 
बेटवा त डीके पंडा हो गईल।  

माई बाबू के करेजा 
डूड बनिके खाए पीजा 
  
चाऊमीन के चाँपे छुटलेस दूध मलईया 
दुई दिन में सरकंडा हो गईल 

हाऊ आर यू बोलेला   
सीयू सीयू कहलेला 
हेल्लो हाय बाय में भूलेस गोड़ धरईया 
सहरवा के लवंडा हो गईल। 

बबुआ जबसे भईले दिल्ली के पढ़वईया 
सइकिल से हीरोहंडा हो गईल। 


रविवार, 3 अगस्त 2014

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया (kajali)

पिछली लिखी कजली पर मिले प्यार से अभिभूत हूँ। उसे  कविता कोष के लोकगीत में शामिल किया गया है। मुझसे कई मित्रों ने एक और कजली लिखने की फ़रमाईश की थी जिसे आज मैं पूरी कर रहा हूँ।  प्रस्तुत कजली की धुन
पूर्व से अलग है। आनंद लीजियेगा।
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सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

घर में बाटी हम अकेली,
कउनो संगी ना सहेली
पापी पपिहा बोले बीचोबीच अटरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

चारो ओर बदरिया छाई
हरियर आँगन मोर झुराई
सजना पठये नाही कउनो  खबरिया 
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।

छानी छप्पर सब चूवेला
देहिया भींज भींज फूलेला
अगिया लागे तोहरी जुलुमी नोकरिया
कजरिया कईसे गाई ननदी।

सईयां जाई बसे हैं पुरुबी नगरिया,
कजरिया कईसे गाई ननदी।


शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

पिताजी की दूसरी पुण्यतिथि

कल एक अगस्त को  पूज्य पिताजी की दूसरी पुण्यतिथि थी । जब मैं कॉलेज आ रहा था अचानक लगा कि पिताजी बगल की सीट पर बैठे मेरे सर पे  हाथ फेर रहे थे। ऐसा लगता ही नहीं कि वो हमसे दूर चले गये हैं। जब भी मैं किसी परेशानी में होता हूँ लगता है पिताजी देख रहे और वही चिर परिचित अंदाज में तसल्ली करा  रहे हों ' हाँ हाँ सब ठीक हो जाएगा  हिम्मत मत हारना'। 

कानपुर की एक ट्रांसपोर्ट कम्पनी में काम करते थे। सुबह ठीक साढ़े आठ बजे घर से निकल जाते थे लेकिन रात को आने का कोई वक्त नही था। कभी दस  बजे तो  कभी सुबह चार बजे। कभी कभी मैं उन्हें ट्रांसपोर्ट नगर छोड़ने जाता। साइकिल किदवईनगर चौराहे पर बने हनुमान मंदिर पर  जरूर रूकती।  बजरंगबली का दर्शन उनका अटल नियम था। उन्होंने अत्यंत कम तनखाह में किस तरह से पूरा परिवार नाते रिश्तेदारी का निर्वाह किया, जब सोचता हूँ तो युधिष्ठिर के उस उत्तर की सार्थकता समझ जाता हूँ जिसमे उन्होंने यक्ष के आकाश से विस्तृत कौन के जवाब में 'पिता' बताया था। 

बुआ के यहाँ खिचड़ी भेजनी हो, कोर्ट की तारीख हो, डीज़ल इंजन की क़िस्त देना हो, बच्चो की फीस भरनी हो, किसी रिश्तेदार के यहाँ कोई फंक्शन हो, बारिश में घर की चिनाई, नई फसल के लिए खाद बीज का इंतजाम या फसल पकने पर मँड़ाई का खर्च हो, सारा जिम्मा पिताजी के नाम। गाँव से चिट्ठी आती जिसमे समस्याओं के अलावा और कुछ नही होता था। सब पिताजी चुपचाप झेलते। 

उनका जीवन संघर्ष का पर्याय था। यही सीख भी थी जिसे मैं आत्मसात करने की कोशिश कर रहा हूँ। 

ओम प्रकाश यति और आलोक श्रीवास्तव की कुछ पंक्तिया 'बाबूजी' पर  याद आ रही हैं। 

दुख तो गाँव - मुहल्ले के भी हरते आए बाबूजी
पर जिनगी की भट्ठी में खुद जरते आए बाबूजी

कुर्ता, धोती, गमछा, टोपी सब जुट पाना मुश्किल था
पर बच्चों की फीस समय से भरते आए बाबूजी

बड़की की शादी से लेकर फूलमती के गौने तक
जान सरीखी धरती गिरवी धरते आए बाबूजी

रोज़ वसूली कोई न कोई, खाद कभी तो बीज कभी
इज़्ज़त की कुर्की से हरदम डरते आए बाबूजी

हाथ न आया कोई नतीजा, झगड़े सारे जस के तस
पूरे जीवन कोट - कचहरी करते आए बाबूजी 
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घर की बुनियादें दीवारें बामों-दर थे बाबू जी
सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी

भीतर से ख़ालिस जज़बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी

कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी  
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पिताजी को शत शत नमन