गुरुवार, 31 जुलाई 2014

"गुड़ुई" : नाग पंचमी

नाग पंचमी को हमारे यहां जौनपुर में   "गुड़ुई" भी कहा जाता है। गुड़ुई के एक दिन पहले हम लोग बेर की टहनियों को काट कर उसे हरे नीले पीले लाल रंगो से रंगते हैं । बहनें कपडे की गुड़िया बनातीं।  साल भर के पुराने कपडे लत्ते से सुंदर सुंदर गुड़िया बनाई जाती। गुड़िया बनाना एक सामूहिक प्रयास होता था। इस बहानें अम्मा अपनी गुड़िया बनाने की परम्परात्मक  कला का हस्तांतरण बहनों को करतीं। हम सब भाई इस फिराक में रहते कि मेरी बहन की गुड़िया सबसे सुंदर होनी चाहिए। गुड़िया सजाने के सारे सामान जुटाए जाते। गुड़िया तैयार होने के बाद एक बार बच्चों में फौजदारी तय होती थी कि तलैया तक कौन गुड़िया ले जायेगा। गुड़िया को खपड़े पर लिटा कर अगले दिन के लिए उसे ढँक दिया जाता था। उसके बाद  गोरू बछेरू को नहला धुला कर उनकी सींगों पर  करिखा लगा कर गुरिया उरिया पहना कर चमाचम किया जाता था। 

गुड़ुई के दिन ' पंडा वाले तारा' पर हम सब भाई बहिन जाते थे। बहिने गीत गाते जोन्हरी की 'घुघुरी' लिए ताल के पास पहुँचती थी। वहाँ जैसे ही गुड़िया तालाब में फेंकी जाती हम  सब डंडा ले   गुड़िया  पर पटर पटर करने लगते। इस खेल में एक नियम था कि डंडे को आधे से तोड़ कर एक ही डुबकी में गुड़िया सहित डंडे को तालाब में गाड़ देना है। जो यह कर लेता वह राजा। खैर इस चक्कर में हम सब सांस रोकने का अच्छा अभ्यास कर लेते।

 डाली पर झूला पड़ा है।  बहिनें गा रहीं 

हंडिया में दाल बा गगरिया में चाउर.. 
हे अईया जाय द कजरिया बिते आउब.... 

कोल्हुआ वाली फुआ ने कहा .... हे बहिनी अब उठान गावो चलें घर में बखीर बनावे के है। 

उठान शुरू 

तामे के तमेहड़ी में घुघुरि झोहराई लोई ....

इधर हम सब अखाड़े पहुँच जाते। मेरे तीन प्रिय खेल कुश्ती, कूड़ी (लम्बी कूद ) और कबड्डी। कूड़ी में उमाशंकर यादव के बेटवा नन्हे का कोई जोड़ नही था। ज्वान उड़ता है । वह दूसरे गांव का है । हमारे यहाँ के लड़के क्रिकेट खेलते थे इसलिए नन्हे से कोई कूड़ी में जीत नही पाता। हाँ कुश्ती को हमारे गाँव में श्रेय बच्चेलाल  पहलवान को  को जाता है। बच्चेलाल के एक दर्जन बच्चे थे। वह अपने बच्चों को खूब दांव पेच सिखाते थे। धीरे धीरे गाँव में कुश्ती लोकप्रिय हो गयी।  मैं अपने बाबू (ताउजी)  से कुश्ती सीखता था। गुड़ुई वाले दिन कुश्ती होनी होती है । सारा गाँव जवार के लोग जुटते हैं। जोड़ पे जोड़ भिड़ते भिड़ाये जाते हैं। 

मार मार धर धर
पटक पटक 
चित कर चित कर 
ले ले ले 

फिर हो हो हो हो हाथ उठकर विजेता को लोग कंधे पर बैठा लेते। अचानक गाँव के सबसे ज्यादा हल्ला मचाऊ मोटे पेलवान सुग्गू ने मेरा हाथ उठाकर कहा 'जो कोई लड़ना चाहे रिंकू पहलवान से लड़ सकता है!' बाबू सामने बैठे थे। मैंने भी ताव में आकर कह दिया ' जो  दूध  माई का लाल हो आ जाए'  मेरी उमर लगभग पंद्रह बरिस रही होगी उस समय मेरी उमर के सभी लड़के मुझसे मार खा चुके थे सो कोई सामने नही आया। अचानक कोहरौटी से हीरालाल पेलवान ताल ठोकता आया बोला मेरी उमर रिंकू से ज्यादा है लेकिन अगर ये पेट  के बल भी गिरा देंगे तो पूरे कोहरान की ओर से हारी मान लूँगा। सुग्गु ने हल्ला मचाया। अखाड़े में हम दोनों आ डटे। हीरा मुझे झुला झुला फेंकता।  बाबू की आखों में चिंता के डोरे दिखने लगे। हीरा ने मेरी कमर पकड़ी और मेरा सर नीचे पैर ऊपर करने लगा। जैसे ही मेरा पैर ऊपर गया मैंने पूरी ताकत से हीरा के दोनों कान बजा दिए। हीरा गिरा धड़ाम से। मैंने धोबीपाट मारा।  सुग्गु हो हो हो करते मुझे कंधे पर लाद लिए। फिर तो नागपंचमी वाला दिन मेरा। 

अखाड़े से वापस आने के बाद अम्मा ने बखीर(चावल और गुड से बनता है ) बनाया था साथ में बेढ़नी (दालभरी पूड़ी) की रोटी भी खाई गयी । रात में गोईंठा (उड़द से बनता है ) भी बना था जिसको बासी  खाने का मजा ही कुछ और होता था। 

शाम को कजरी का कार्यक्रम मंदिर में नागपूजा  और ये सब बारिश की बूंदाबांदी में।

शाम की चौपाल में 

रस धीरे धीरे बरसे बदरवा ना.……  हो बरसे बदरवा ना.……  हो  बरसे बदरवा ना.……  कि रस धीरे धीरे बरसे बदरवा ना।
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बंसिया बाज रही बृंदाबन टूटे सिव संकर के ध्यान। .... टूटे सिव संभो  के ध्यान.... 

सुक्खू काका जोर जोर से आलाप ले  रहे। सारा गाँव झूमता है । अमृत रस पीकर धरती की कोख हरी हो गयी है। 

यही तो नागपंचमी का जादू है। 

यह आंदोलन भी विकल्प की तलाश करेगा

कोई भी आंदोलन किसी नेता की बपौती नहीं है। हाँ नेता  सही चैनल देने में मदद करता है यदि वही नीर क्षीर विवेक वाला है तो। आंदोलन अपना नेतृत्व तलाश  लेता है। 

स्वतंत्रता के बाद आंदोलनकारी के रूप में पहले एंटी कांग्रेस ताकतें सक्रिय रही चाहे वह लोहिया के नेतृत्व में हो या जेपी के। लेकिन आंदोलन में सबसे ज्यादा मार जनता को ही पड़ती है। 

1975, 1989 और 2011  में देश बड़े आंदोलन देख चुका है। विगत दो आंदोलनों की अपेक्षा 2011 में हुये आंदोलन  प्रकृति कुछ अलग सी रही। इस बार यह आंदोलन पूरी तरह से जनता के  हाँथ रहा। इस आंदोलन के चेहरे के रूप में   बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और  अरविन्द केजरीवाल सामने आये।  ये लोग  इस भ्रम में थे कि जनता उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व से अभिभूत हो उनके एक इशारे पर सरकार  ईंट बजा देगी। मैं इसे भरम ही कहूँगा क्योंकि जनता की अपनी आकांक्षाएं और उम्मीदें होती है। वह उन उम्मीदों की पूर्ती के लिये सड़कों पर आती है। ऐसे में खुदमुख्तारी भारी पड़ती है आंदोलन और व्यक्तिगत दोनों।

बाबा रामदेव पर लाठीचार्ज और उनका महिला के वेश में वहाँ से भागने का आंदोलनकारियों और  जनता में नकारात्मक सन्देश लेकर गया। पूरी उम्मीदों और जनता का स्थानांतरण अन्ना आंदोलन में देखने को मिला। अन्ना पूरी तरह अरविन्द और मैनेजिंग कमेटी पर निर्भर थे। बार बार आंदोलन और सही दिशा के अभाव में जनता उनसे छिटकने लगी। इस बात को अरविन्द केजरीवाल  ने भांप लिया और अन्ना से अलग होकर पार्टी बना ली। लोगों में गुस्सा तो था ही सो एक बार दिल्ली में केजरीवाल को भी मौक़ा मिला लेकिन केजरीवाल अपनी व्यक्तिगत कमजोरियों से उबर न सके और जनता फिर से विकल्पहीन। इस दौरान गुजरात से उसे  सकारात्मक सन्देश मिल रहे थे। बाबा रामदेव ने पर्दे के पीछे से मोदी की बैंकिंग करनी शुरू कर दी थी। जनता ने चुनावों के दौरान मोदी को विकल्प मान लिया और मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए।  

अब जनता की उम्मीदें और उस पर मोदी की चुप्पी। छात्रों ने फिर अंगरेजी के मुद्दे पर माहौल को  गरमा दिया है। यह आंदोलन भी विकल्प की तलाश करेगा अगर मौजूदा विकल्प जल्द ही न  चेता।  जनता से ज्यादा दिन नही खेला जा सकता।
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बुधवार, 30 जुलाई 2014

सेन्हुरहवा आम

'सेन्हुरहवा आम' 
++++
सेन्हुरहवा आम 
कुतरे ललकी ठोंड़ वाला सुग्गा 
कोइल किलहँटा चिरई चिरोमनि 
झब्बे पूंछ वाली गिलहरी। 

सेन्हुरहवा आम 
खाए दादी, बाबा, काकी, काका 
फूआ, फुफ्फा, मामी, मामा 

भईया भउजी अम्मा, बाबू।

सेन्हुरहवा आम
नेरें झूरें गांव जवार के सबन्ह
चबेल्ला चबेल्ली।

सेन्हुरहवा आम
से बनें सिरका, खटाई, अँचार
मुरब्बा, गुरम्मा, ठोकवा और अमावट।

सेन्हुरहवा आम
बारहो महीने रहे 'प्रिजर्व'
पुरखों की जादुई हांडी में।

सेन्हुरहवा आम
विरासत में मिला
पड़बाबा से बाबा को
फिर बाबू को।

आज 'स्लाइस' पीते
या कि कारबाइड में
पकाये गये 'मैंगो' खाते
समझ में आता है
फरक स्वाद का
विरासत और बाजार का।

मैं क्या छोड़ कर जाऊँगा? 

रविवार, 27 जुलाई 2014

बरसो रे बादल हरहरा के बरसो।

बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
सावन में धरती नें
खोल दिये केशराशि 
पोर पोर भिगो देना
अमृत बूंदों से,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
माटी की गंध लिये
नाचती है पुरवा
कांपती उंगलियों से
मालिनी ने छू लिया
देव के ललाट को,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
थिरकती शिप्रा की लहरें
कसमसाते से तटबन्ध
मांझी गीत गाया आज
अधरों ने फिर से,
बरसो रे बादल
हरहरा के बरसो।
++pawan++

हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जी! हम १० साला परम्परा के वारिस बनने से इंकार करते हैं।

हे भारत की जनता के नए सेवक भाई नरेंद्र मोदी !

लोगों में शिकायत है कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला कठपुतली मात्र बन कर रह जाता है। हमने इतिहास में तुर्कों मुगलों के बहादुर शाह जफ़र टाइप से लेकर अंग्रेजों के वायसराय होते हुए डॉ मनमोहन तक के शासक देखें जिनके मुंह में जबान नहीं हुआ करती थी।

आपको चुना। दिल से चुना।

माना कि प्रशासन आप प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करने में लगे हुए हैं और सोशल साइट्स के माध्यम से अपनी बात रख रहें हैं। नगरों की ३० प्रतिशत जनता उसे देख रही है किन्तु ७० प्रतिशत जनता गांवों में है जो आपके ट्विटर और फेसबुक को नहीं पढ़ सकती। वह तो चौपाल लगाती जिसमे रेडिओ चलता है। चुनावो के दौरान सिंह गर्जना सुनने को आदी बनाने वाले हे मौन मोहन सिंह के वारिस जो १० साल से "कम्युनिकेशन गैप" की परम्परा थी कम से कम उसे जारी रखने के लिए वोट नही दिया गया था। आज हर जगह सौगंध मुझे इस मिटटी वाले गीत(जो कि एक करोड़ पति भाट ने पईसे लेकर लिखा होगा ) की जगह एक गांव जवार के कवि (नाम याद नहीं आ रहा ) की पंक्तियाँ हवाओं में तैर रही हैं।

पूँछ उठा के परजा नचलिन,
उछलिन कुदलिन खुस्स।
++
राजा अईंली राजा अईंली
राजा कईंली फुस्स।।

इस हवा को महसूस करिये। ये उसी भारत की अवाम की आवाज है जिसने आपकी दहाड़ में अपने स्वाभिमान की गूँज सुनी थी। आज उसे वो आवाज सुनायी नहीं दे रही है। उसे अपनी आवाज वापस चाहिए। उसे आश्वस्ति चाहिए जो उसे पूर्व में " भाइयों बहनों" को सुनकर होती थी। हमें आप पर पूरा भरोसा है। पूरा समर्थन है। हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन १० साला परम्परा के वारिस बनने से इंकार करते हैं।

हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जी उम्मीद है कि आप जनभावनाओं से अवगत होंगे।

…पवन विजय

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

जोगी गोपीचंद हो



































जोगी बाबा आये हैं रे कक्का के हियाँ सिरिंगी बजा रहे ।

तौन आया है अम्मा ? मुन्नू पूछता है। जोदी आया है, हमता तहूँ धुछाय दे ए आजी। जोदिया झोली में भलि के हमते उथाय ले जाई।  छोटा मुन्नू अपनी दादी की गोद में घुट्टी मुट्टी मार के छुप जाता है। 

सारंगी के स्वर ऊंचे होते जा रहे। 

सीता सोचईं अपने मनवा 
मुंदरी कहँवा से गिरी 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
मुंदरी कहँवा से गिरी 
मुंदरी  कहँवा से गिरी 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं

कक्का के दुवारे भीड़ लगी है। औरतें जोगी से भभूत मांग रही तो  बच्चों में भय मिश्रित कौतूहल है। कक्का बोले , अरे सिधा पिसान लेई आउ रे !

जोगी ने अपनी बड़ी बड़ी लाल आँखे खोली पगड़ी ठीक करते हुए एक तरफ का  होंठ बिचुका के बोला " हम गुदरी लेबे मिसिर "   आसमान देखते हुये जोगी हुचक हुचक सारंगी बजाते हुए गाने लगता है। 

माई मोर गुदरिया रे भईले 
जोगी गोपीचंद हो 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
हमरे बुढ़इया  के मोर बेटवा 
तू त जोगी गोपीचंद हो 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं
तोहरे  बुढ़इया के दूसर बेटवा 
हम तो जोगी गोपीचंद हो। 
रीईं  रीईं  रीईं  रीईं

लावा मिसिराइन गुदरी। 

औरतों में खुसुर फुसुर।  जा रे बड़की कउनो पुरान धुरान लूगा उठाय ला। बिना गुदरी  लिहे माने ना ई नदिग्गाड़ा। दो तीन पुरानी साड़ियां जोगी के सामने पटक दी  जाती हैं। 

ऐ का मिसिर ? सोक्खे सोक्खे। 

कक्का बोले " मुन्नू के माई अई जा बीस आना ले आवा "  घूँघट के अंदर से भुनभुनाते मुन्नू की अम्मा बीस आने लाकर जोगी के कटोरे में दाल देती है। टन्न टन्न। 

जोगी ने अपने बड़े से झोले में धोतियाँ डाली एक जेब में पईसे। सब समेट समाट कर जैसे ही वह उठने को हुआ भीड़ से एक ढीठ  बच्चे ने कहा  हे जोगी माठा पियाय दा। 

जोगी मुसकाया और सारंगी उठायी 

हे सिरिंगी 
रें रीं 
माठा पीबू 
रां रां रीं रुं 
केतना 
रें  र रां 
दुई लोटा 
रुं रां रां 

बच्चे तालियां बजाने लगते हैं जोगी दूसरा घर देखता है। 





       


गुरुवार, 24 जुलाई 2014

हिंदुत्व: दो मिनट का विमर्श (Hindutva)

मैं धर्म को जीने के तरीके के रूप में देखता हूँ। जो मेरा जीने का तरीका है उसे दुनिया हिंदुत्व के नाम से जानती है। हिंदुत्व को समझने से पहले आप को पोस्ट मॉडर्निटी का कांसेप्ट समझना होगा। आप जितने सरल तरीके से हिंदुत्व को समझना चाहते हैं उतने सरल रूप में समझ सकते हो... 

परहित सरिस धरम नहि भाई। परपीड़ा सम नहि अधमाई। 

आपको जटिल पांडित्य में जाने की भी छूट है। पंडिज्जी पिंडा पारने तक पीछा नहीं छोड़ेंगे। आप ईश्वर को मानें न मानें, किसी को भी ईश्वर मान सकते हैं। खान पान, वेश भूषा, रीति रिवाज व्यक्तिगत रूप से भिन्न हो सकता है। सब कुछ यहाँ है।

दो बातें मुझे खटकती हैं

पहली कि सैद्धांतिक रूप से वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाले महज रसोई और जातियों में सिमटे हैं। जो हिंदुत्व की सबसे बड़ी ताकत थी (द्रवण पात्र ) वही कमजोरी समझी जा रही।

दूसरी हिंदुत्व धीरे धीरे सैन्यीकरण की ओर अग्रसर है। तलवार और कपट के जोर से हिंदुत्व पर निरंतर आघात हुए और हो रहे उसकी प्रतिक्रिया खतरनाक है। मैंने किसी हिन्दू को मिशनरी के रूप में धर्मांतरण कराने का उदाहरण या डरा धमका कर हिन्दू बनाने का कोई उदाहरण नही देखा। सिख धर्म के रूप में पहली प्रतिक्रिया हम देख सकते हैं जिसे बड़ी होशियारी से हिन्दूओं से अलग धर्म के रूप में बताया गया।

मुझे भय इस बात का है कि रिएक्शन करने वाले टुच्चे और गुंडे हैं जो अपने आकाओं को खुश करने के लिए चिल्ल पों मचाते हैं गाली गलौज करते हैं।

रियेक्ट करने वालों का स्तर गुरु गोविन्द सिंह और शिवाजी जैसा होना चाहिए।

गैर हिन्दू धर्मों के विद्वानों को समझना होगा कि धर्म परिवर्तन/ हिन्दुओं के प्रति उपहासात्मक रवैया उनके टुच्चे पन को उघाड़ देता है। साथ ही नफरत के बीज बोता है।

हिन्दू स्वभाव से शांत और प्रेमी होता है। प्रेम ते प्रकट होईं भगवाना। और मैं चाहता हूँ इसके इस स्वभाव के साथ छेड़छाड़ न हो।



मंगलवार, 22 जुलाई 2014

रसराज और रसरानी

यह एक कहानी है।  इसे पढ़ने के बाद   किसी के साथ  जोड़िएगा।  अगर किसी के साथ ऐसा घटित हुआ तो मात्र एक संयोग है। 
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बुढऊ खटिया पे बईठे हैं सुरती मले जा रहे हैं. मुसुकाते जा रहे।  बूढ़ा भी पास में बईठी हैं आज बुढऊ ने भंग कुछ ज्यादा ही चढ़ा रक्खी काहे से कि भोरहे भोरहे जब फेसबुकवा खोला तो एक तन्वंगी से चैटिया के बऊराये, तुरंत सिल बट्टा ले बूटी घोंट के चढ़ा गए। 

बूढ़ा : काए जी आजकल सुन रहे है कि आप भंग जादा चढाने लगे हैं आंत फाट जाए। 
बुढऊ : चोप्प ! बहुत जसूसी करती है। 
बूढ़ा : अरे हमके तोहार चिंता हौ। नाहक बीपी बढ़ा रहे। 
बुढऊ : अरे तुको कुछ नहीं पता दुनिया में का होई रहा। देखो दग्गू के  जवान मेहरारू लेई आवा एक तू न मरई न माचा छोडई। 
बूढ़ा : तू हमरे मरने का इंतजार में हो ?
बुढऊ : अरे नाय रे ! मजाक किहे।  वईसे तुम्हारे जीवन में कौनो रस नहीं बचा।  थोड़ा रस भरो। वही सुबह शाम। डेली रूटीन।  तुम उबियाती नहीं ? 
बूढ़ा : अच्छा अगर हम आपन रूटीन बदल ले ना तो तोहार भूगोल बदल जाए। अऊर ई जो छोकरिया से मीठ मीठ बात कई के रसराज बनि रह्यो ना हमका  सब पता है। 
बुढऊ : देखो हम डरते  नही। अऊर ऊ छोकरिया नही उका एक ठू नामौ है। 
बूढा : हमके नाम ओम से मतलब नही। तोहार उ का लगत है। 
बुढ़ऊ : फ्रैंकली कही तोहसे हम ओसे मोहब्बत करते हैं। 
बूढ़ा : हमको अंदाज तो पहिले से था बाकी तुम इतने निर्लज होगे ये नहीं सोचा था। लड़िकवा के पता चली त बुरा होए। 
बुढऊ : लड़िकवा के हम पहिले सेट कर लिए हैं। 

बुढ़िया ने एक गहरी सांस ली। बोली, चलो मन से एक बहुत बड़ा बोझ उतरा। 

बुढ़ऊ: कईसन बोझ ?
बूढ़ा : जाने दो बुरा मान जाओगे। 
बुढऊ : नही मानेंगे। तुम नही बताओगी तो जाने का का  सोच लेंगे। 
बूढा : सोचो जो सोच सकते हो। 
बुढऊ थोड़ा सनके, बोले अब बुढ़ापे में तुम का गुल   खिलाने वाली ? 
बूढ़ा : अरे तोहार बीपी काहे फिर बढ़ी रहा।  बड़े फ्रैंक हो ना। 
बुढऊ कांपते हुए : फ्रैंक उरैंक गया तेल लेने तू बता कहना क्या चाहती थी। 
बूढ़ा : कुच्छो नही। 
बुढऊ : बता नही तो मार मार के हुलिया बिगाड़ देंगे। 
बूढ़ा : अब्बे तो बड़े रसराज थे एकदम्म पगलाइटि पे उतारू हो गए। 
बुढऊ : देखो सोझे सोझे बता दो नहीं तो हम पता करी लेंगे फिर हमसे बुरा कोई ना होगा। 
बूढा : ऐ बुड्ढे ई धमकी तू अपनी रसरानी को देना। तू जिनगी भर जिनके तलवे चाट चाट कर आज बहुत बड़ा आदमी बना  है ना वे सब मेरे तलवे चाटते थे। भरोसा  न हो तो उसी अपने कमीने यार दग्गुआ  से पूछ।  दाढ़ीजार मुँहझौंसा। 

बुढऊ खटिया से नीचे गिरे धम्म से। 



शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बलात्कार

यह बात सिर्फ लखनऊ या दिल्ली में हुये बलात्कार की नहीं, कही भी बलात्कार हो उसमें समाज के हर जिम्मेदार तबके/व्यक्ति की सहभागिता रहती है। भारत में भ्रस्टाचार और बलात्कार को अपराध नहीं माना जाता।  भ्रस्टाचार को चतुराई का नाम देकर उसे महिमामंडित किया जाता है उसी तरह बलात्कार को मर्दानगी साबित करने वाला कृत्य बताकर उसे ताकत और इज्जत के जाल में फांस कर रफा दफा करने का प्रयास किया जाता है। चाहे मीडिया में चल रहे ट्रेंड्स/विज्ञापन/फिल्म्स/समाचार हों या समाज एवं राज्य के चलन, हर जगह एक विशेष मानसिकता काम कर रही जो अंततः भ्रस्टाचार या बलात्कार के रूप में प्रस्फुटित होती है। 

बलात्कार जैसे अपराध के लिए माता पिता और शिक्षक ये तीन सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं।  साथ ही पूरक विषय के रूप में राज्य और सम्बंधित एजेंसियां आती हैं। कठोर कानूनों का अभाव, लेट लतीफ़ निर्णय, कानूनी दांवपेच, पीड़िता की समुचित सुरक्षा का अभाव इत्यादि बातें अपराधी के मनोबल को बढ़ाती हैं। समाज में रहने वाला वकील जो किसी बेटी का बाप भी हो सकता है अगर तय करे की वह बलात्कारी का केस नहीं लड़ेगा, समाज तय करे की वह बलात्कारी का बहिष्कार करेगा, माँ बाप भाई बहन बीवी सभी सामूहिक रूप से ऐसे व्यक्तियों से एक झटके में सम्बन्ध तोड़ ले, तभी जाकर इस अपराध पर लगाम लग पायेगा।  बाकी उत्तेजक माहौल से भी निपटा जाय। कामुकता पैदा करने वाले माहौल में कोई भी अनैतिक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित हो सकता है।  जरूरत है की ऐसे लोगों, ऐसी प्रक्रियाओं की लानत मलानत हो।  

अंत में एक बात कहना चाहूँगा।  पेट की आग सारे ज्वलंत मामलो से ज्यादा ज्वलनशील है। रोज की रोटी की हुज्जत में लगे लोगों के पास रोने के लिये ज्यादा वक्त नहीं होता। रोटी के इंतजाम के लिए बड़े से बड़े दुःख पर पत्थर धर कर जाते हुए लोगों को आप जिंदादिल कहिये जज्बे को सलाम करिये या संवेदनहीन कर कर गरियाइये, यह आप का दृष्टिकोण है। निर्भया से पहले वाले मसले बिला गए थे, निर्भया का भी बिला गया और निर्भया के बाद वाले भी बिला जाएंगे। जनांदोलन को बपौती और निजी हितों के लिए इस्तेमाल करने वाले जनांदोलन का  सामूहिक बलात्कार करते हैं। अपना अपना घर देखिये अपने अपने बच्चे देखिये। साथ ही साथ अपने को देखिये। स्व का अवलोकन उम्र भर चलने वाला आंदोलन है और इसकी कमान सिर्फ और सिर्फ आपके हाथों में है।

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ

जमुना पार करते ही बारिश शुरू हो गयी।  हेलमेट उतार दिया।  टिप्प टिप्प झर झर फिर तो कहना ही क्या हरहराती हुयी मंदाकिनी शिव की जटाओं पर। थोड़ी देर बाइक खड़ी कर इधर उधर देखा कोई नहीं था तो लगे  छपकोरिया करने।  मेघ पूरी ताकत के साथ बरस रहे थे।  प्यासी जमुना आँचल भर भर सारी बूंदो को सहेजने में लगी थी और आस पास के पेड़ अपनी पत्तियों और शाखों को फैलाये सारा जल पी जाने को आतुर। 
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तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ-साथ
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ-साथ
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अचानक भीगते भीगते अपने खेत में पहुँच गये। देखा भभूती की दुलहिन कछाड़ मारे घुटनों को मोड़े धान लगा रही थी।  साथ में काम करने वालों को ललकारती जा रही थी ज़रा हाली हाली हाथ चलाओ पहँटा लंबा है। कुछ गाती भी जा रही थी..  
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मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी 
एक हाथ लेले हउवे बांस के चंगेरिया 
दुसरके तलवारिया रे छोटी ननदी  
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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सातो रे भइया के एक है दुलरिया 
देखि देखि कईसन बोले ई पापी बोलिया 
कटरिया ज्यों निकारो रे छोटी ननदी 
मुरैला मारई जाबे रे छोटी ननदी
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अचानक घुप्प अंधेरा।  छक छक बरसता काला पानी। मेरा छप्पर चूने लगा। हवाएँ तेज।  छप्पर दूसरी जगह से चू रहा।   मूँज वाली खटिया से लेवा समेट की कोशिश। कथरी लेवा समेत कर उस पर बैठ गया।  काला पानी पूरी ताकत के साथ छप्पर पर गिर रहा था। बिजली कड़की दूर किसी के चिल्लाने की आवाज " अरे माई  चिर्री पडी रे गोलारे के घरे पे... भीतिया त भहरान " टाटी से बारिश का झर्रा पूरी देह को तर किये जा रहा । कथरी पूरी गीली हो गई । रात भर भीगता सोच रहा कि हमारा बुद्धू बछवा  कईसे पूँछ दबाये कुड़कुड़ा रहा होगा।  चरनदास की गायें खुले में रहती है कैसे बचेंगी बारिश में।  

रात  भर सोया नहीं धरती से कस्तूरी फट पडी है आस पास उठती सोंधी खुशबू नथुनों से होती हुयी माथे तक पहुँच रही,ऐसा लगा किसी ने माथे पर महकती हथेली रख दी हो । एक भीगा सिमटा अक्स आँखों के सामने आ जा रहा। परवीन गा रही है। 
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बचपने का साथ, फिर एक से दोनों के दुख
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ-साथ

लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे अज़ीब
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ
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उसके काजल से पानी का रंग काला हो गया।  मेघ भी काले हो गए। रात काली हो गयी। 

ओह्ह यह क्या हुआ। 

उसने आँखें खोली सुब्बह हो गयी। 
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साहेब सुबह कब की हो गयी आज का कॉलेजवा नहीं जावोगे।  दूध वाला बाहर चिल्ला रहा था और मैं अभी तय नहीं कर पा रहा था कि जो देख सुन रहा वो ख्वाब है या जो देखा वो।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

एक कजरी गीत (Kajari)

एक कजरी गीत अभी लिखे है । हमारे गांव में इस समय महिलाये झूले पर बैठ कजरी गा रही होंगी। पेंग मारे जा रहे होंगे। हलकी बारिश में भीगे ज्वान नागपंचमी की तैयारी में अखाड़े में आ जुटे होंगे और मैं यहाँ ७०० किलोमीटर दूर कम्प्यूटर तोड़ रहा हूँ। खैर आप लोग लोकभाषा में लिखे इस गीत और भाव को देखिये। 
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हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

अलता टिकुली हम लगइबे 
मंगिया सेनुर से सजइबे, 

हमरे उँगरी में मुनरी पहिनावा पिया

नेहिया देखावा पिया ना
हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

हँसुली देओ तुम गढ़ाई
चाहे केतनौ हो महंगाई,

चलिके  सोनरा से कंगन देवावा पिया
हमका सजावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

बाला सोने के बनवइबे  

पायल चांदी के गढ़इबे,

माथबेनी औ' बेसर बनवावा पिया
झुमकिउ पहिनावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 

गऊरी शंकर धाम जइबे
अम्बा मईया के जुड़इबे ,

इही सोम्मार रोट के चढावा पिया
धरम तू निभावा पिया ना।


हमका मेला में चलिके घुमावा पिया 
झुलनी गढ़ावा पिया ना। 





सोमवार, 14 जुलाई 2014

सारा पनघट रीत गया।

सब कुछ छूटा धीरे धीरे जीवन ऐसे बीत गया
सागर बनते बनते मन का सारा पनघट रीत गया। 

चाँद पे जा अँटका जो उछला सिक्का अपनी किस्मत का 
वक्त जरा दम ले लेने दे, मैं हारा तू जीत गया। 

ना दरिया में डूबा ना ही बदली से बरसात हुयी
फिर भी जाने कैसे जिस्म का, कतरा कतरा भीग गया।

सच कहने वालों को जबसे भूको मरते देखा है
ज़िंदा रहने की खातिर मैं झूठ बोलना सीख गया।