गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मुश्किल है आसान नही।


















कच्ची उमर की बात भुलाना मुश्किल है  आसान नही, 
संगी साथी  जज्बात भुलाना मुश्किल है आसान नही। 

जाने कितने चेहरे मुझसे मिलते और बिछड़ते है, 
पर इक उस पगली को भूलना मुश्किल है आसान नही। 

तितली जैसी यादे मुझसे आंख मिचौनी करती है,
कब रुक पायेगी पानी पर, जो रेखाये खिचती है। 

वो गुलाब तो सूख गये जो थे बन्द लिफाफो मे,
पर खत की खुशबू को भुलाना मुश्किल है आसान नही। 


बादल बिजली जंगल परबत बारिश से भीगी रातें,
गीली आँखों ने आपस में जाने क्या  की थी बातें। 

एक जमाना बीत गया जब मुझसे चांदनी लिपटी थी,
अबतक उस सिहरन को भुलाना मुश्किल है आसान नही। 


6 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

वाह क्या बात है। सच में कुछ जज्बातों को भुलाना बहुत ही मुश्किल होता है।

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (18.04.2014) को "क्या पता था अदब को ही खाओगे" (चर्चा अंक-1586)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत खूब लिखा है ...काबिले -तारीफ

Vaanbhatt ने कहा…

सटीक अभिव्यक्ति...

Annapurna Bajpai ने कहा…

बहुत खूब , एक दम सत्य है कि कुछ बातों को भूलना मुश्किल होता है ।

संजय भास्‍कर ने कहा…

वाह क्या बात है।