सोमवार, 16 दिसंबर 2013

दिलक़शी मेरे काश्मीर की।













सांझ बुनती है 
बर्फ के रेशों से 
चाँदी का दुशाला 
ओढ़ा देती है, 
चिनार के दरख्तों को।  
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सुनहरी मछली डल से होती हुयी 
जाती है तवी तक 
नीलम हो जाने को 
पानी में चखने, 
स्वाद आस्मां का। 
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सिगड़ी से लेकर 
चुटकी भर आग 
गीली रात के जुगनू 
बुवाई करते हैं 
सुबह लहलहा जाती है, 
फ़स्ले केसर की। 
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दिलरुबा के साज पर 
सूफ़ी की रुबाईयाँ 
सिफ़ारिश करती हैं 
पकते सेब में छिपे मौला से 
कायम रखना,
दोशीज़ाओं की अल्हड़ हँसी 
अम्मी की रोशनी 
गुलमर्ग के गुल 
सोनमर्ग के परदेसी 
महफूज़ रखना 
दिलक़शी मेरे काश्मीर की।