गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

मैं बिलकुल अच्छा हूँ














मैं कैसे हूँ ? 
आखिर तुमने पूछ ही लिया  ना 
बिलकुल वैसा 
बेतरतीब, आलसी, तकरीबन निठल्ले जैसा 
तुम्हे भी तो पसंद था
मेरा बेतरतीब होना।  
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फालतू चीजें आज भी इकट्ठी रहती हैं 
मेरे आस पास, 
शेल्फ की  किताबों पर 
धूल कुछ ज्यादा जम गयी है 
तुम्हारे अधरों में  रंगी मूँगिया शाम 
आज भी मुड़ी  तुड़ी 
टंगी है  अलगनी से। 
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कुछ पन्ने, 
जो अब हल्दी वाले रंग में रंग गये हैं 
शायद वे मुझसे ज्यादा संवेदनशील हो गये 
या वक्त का असर हो गया 
घेरे रहते है, 
जिन पर लिखी है 
समाजशास्त्र की परिभाषायें 
और कुछ प्रेमगीत।
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दो कप कॉफ़ी के 
"हो शुरू हर पल" वाले,
और मीडियम वेव वाला रेडियो 
बस्स इतनी सी तो बाते है, 
बाकी जो भी है 
वह तुम्हारा ही तो "रिफलेक्शन" है। 
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न्यूज़ पेपर पढ़ती हो क्या 
(मीडिया भी ना )
तलाशी में सिर्फ एक कलम ही तो मिली थी 
वो जो इग्जाम के लिए तुमने दिया था बस्स। 
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मैं बिलकुल अच्छा हूँ, 
तुम समझ रही हो ना 
बच्चे से कहना स्नेह, 
और मुझसे ज्यादा "उस" प्रबल भाग्य वाले को भी
बिना लिए नाम मेरा। 
+++PM+++