सोमवार, 16 दिसंबर 2013

दिलक़शी मेरे काश्मीर की।













सांझ बुनती है 
बर्फ के रेशों से 
चाँदी का दुशाला 
ओढ़ा देती है, 
चिनार के दरख्तों को।  
+++++++++
सुनहरी मछली डल से होती हुयी 
जाती है तवी तक 
नीलम हो जाने को 
पानी में चखने, 
स्वाद आस्मां का। 
+++++++++++
सिगड़ी से लेकर 
चुटकी भर आग 
गीली रात के जुगनू 
बुवाई करते हैं 
सुबह लहलहा जाती है, 
फ़स्ले केसर की। 
++++++++++
दिलरुबा के साज पर 
सूफ़ी की रुबाईयाँ 
सिफ़ारिश करती हैं 
पकते सेब में छिपे मौला से 
कायम रखना,
दोशीज़ाओं की अल्हड़ हँसी 
अम्मी की रोशनी 
गुलमर्ग के गुल 
सोनमर्ग के परदेसी 
महफूज़ रखना 
दिलक़शी मेरे काश्मीर की। 
 

7 टिप्‍पणियां:

Abhinav Chaurey ने कहा…

खूबसूरत है :)
बचपन में काश्मीर गया था वहाँ की यादें ताज़ा हो गई.
कश्मीर से जुडी वस्तुओं/स्थानों का सुंदरता से प्रयोग है कविता में.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सुन्दर प्रकृति चित्रण।

Alokita ने कहा…

कश्मीर की खूबसूरती के बारे में केवल पढ़ा है और आज आपकी कविता में उसके सौन्दर्य को पढ़ कर उसे देख पाने की इच्छा और भी अधिक बढ़ गयी।
वो प्राकृतिक सौन्दर्य तो जब देखूंगी तब देखूंगी फिलहाल आपकी कविता का सौन्दर्य तो काफ़ी मोहक है।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

प्रकृति संग भावों का सामंजस्य बहुत कुछ कह दिया।

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

कालीपद प्रसाद ने कहा…

कश्मीर की प्राकृतिक सौन्दर्य का सुन्दर चित्रण !
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ashish ने कहा…

jordar hai bhai . dilkash kashmir ko ekdam canvas par utar dia shabdo ke madhyam se.