रविवार, 24 नवंबर 2013

वह तुम ही तो थीं


















वह तुम ही तो थीं
+++++++++++
सरगम के स्पन्दन सी
शबनम मे भीगे चन्दन सी
+++++++++++
जुगनू से भरी रातों में

दुनिया भर की बातों में
राजा रानी के किस्सों में
उठते मिटते जज्बातों में
+++++++++++
विविध भारती के गानों में
"पसन्द आपकी" के पत्रों में
तुम ही तो थी उन नामों में
सारे पर्याय तुम्हारे थे
+++++++++++

तुमने ही तो बान्धी थी
पायल बारिश की बुन्दो में

और पिरोयी थी माला
हवाओं की कुछ छन्दों में
+++++++++++
तुम पुल पर बैठी थी गुमसुम
कुछ कहना सुनना था उस दिन
जब अधरों ने मना कर दिया
आंखो ने बोला था उस दिन
+++++++++++
पर मेरे शब्दकोष में
ऐसी भाषा कही नही थी
जब तक मिलते अर्थ शब्द के
तब तक तुम भी कहीं नहीं थीं
+++++++++++
शब्दार्थों से परे आज
मैं जानता हूं वह तुम ही तो थीं
ख्वाबों में, बातों में, सांसों में, यादों में
वह तुम ही थीं वह तुम ही तो थीं.

4 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति-
आभार आदरणीय-

Amrita Tanmay ने कहा…

उम्दा लिखा है..

सदा ने कहा…

वाऽहऽऽ…!!!!! बहुत खूब

pooja shrivastava ने कहा…

नि:शब्द हैं बहुत सुन्दर रचना |