शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

डौंडियाखेडा की खुदाई एक साजिश थी


ओम बाबा जैसे लोगो के अन्दर अपने को हाईलाईट करने की दमित इच्छा तब से थी जब वह कांग्रेस मे थे. जब वह शोभन सरकार के चेले से जुडे तो कही न कही वह कीटाणु काम कर रहा था और फल फूल भी रहा था. हां यह बन्दा जिसने सोने का सपना देखा वह शोभन सरकार नही बल्कि उनके देह त्याग के बाद उनकी गद्दी का उत्तराधिकारी है. शोभन सरकार जिन्होने दुखी और निराश लोगो के जीवन मे खुशी बिखेरी वह सपने वाले वर्तमान बाबा नही है. वर्तमान मे जो बाबा शोभन के नाम से सरकार बन बैठे है वह असली नही असली तो इनके गुरु थे. ठीक वैसे जैसे जयेंद्र सरस्वती को शंकराचार्य समझना. वर्तमान मे सपने वाले बाबा अपने गुरु के द्वारा बनाये गये पद प्रतिष्ठा का भोग कर रहे है और इनके साथ नशा पत्ती से सम्बन्धित तमाम किम्वदंतियां है मसलन एक बार इनके आश्रम मे गांजे की मौजूदगी की सूचना मिलने पर जब इनके यहां छापा पडा तो इन्होने अपनी मंत्र तंत्र शक्ति से उसे खर पतवार मे बदल दिया. अब ऐसे “डेप्रियेट” लोग जो एक आम किसान से भी कम ईश्वर के नजदीक है, राजनीति की मदद लेकर लोगो की आवश्यकता पूरी करने का आश्वासन देकर अपनी बाबागीरी और दुकान चमकाते है. ये इतने मूढ और मतिमन्द है कि राजनीति इनका इस्तेमाल करती है और ये इस भ्रम मे रहते है कि “सिस्टम” इनके हिसाब से चल रहा है. इसमे सबसे ज्यादा नुकसान होता है आम जनता का, धर्म का, मानवता का.
डौडिया खेडा के मामले मे भी यही हुआ. भारत का दुर्भाग्य है कि यहां केन्द्र और राज्य मे ऐसी सरकारे है जो तुष्टिकरण के लिये नीचता की किसी भी हद तक जा सकती हैं. दोनो सरकारो के बीच यह तय हुआ कि इस सपने को तूल देकर इस अन्धविश्वास को बढा चढाकर प्रस्तुत किया जाय. सोना तो मिलेगा नही उल्टे शोभन और ओम बाबा के सहारे लोगो की आस्था का मजाक बना दिया जाय और जो कालनेमि टाईप के संत है पहले उन्हे लोककल्याणकारी अवतार सिद्ध किया जाय फिर उनको बदनाम करके समूचे सनातन धर्म के मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाय इस प्रकार ऐसा कर एक देश मे व्यक्ति विशेष की देश मे जो लहर चल रही है जिसका आधार फंडामेंटलिज़्म है  उसे रोका जाय या छिन्न भिन्न कर दिया जाय. शोभन और ओम बाबा जैसे लोग तैयार बैठे थे धर्म और लोगो की श्रद्धा को बेचने के लिये. अगर इन सरकार मे बैठे लोगो की नीयत साफ होती तो जिस तरह से बात  मीडिया मे बात उछाली गयी और मनमोहन से लेकर कांग्रेस आलाकमान इस पर चुप रहे, पूरे देश मे सोने के मिलने का माहौल बना दिया गया (चरणदास तो मुख़ौटा था असली लोग पर्दे की पीछी से काम कर रहे थे), इस तरह से माहौल न बनाया जाता. क्योंकि इन लोगो को खूब मालूम था कि सोना नही निकलेगा और जनता की भावनाये और उनकी आस्था आहत होगी. और हुआ भी यही.
अब सवाल यह उठता है कि इस अक्षम्य अपराध की जिम्मेदार कौन लेगा  मीडिया, सरकारें, शोभन और ओम बाबा या आम जनता खुद? 

2 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

ई अपना समाज यही सब में डूबा रहता है।

http://hindini.com/fursatiya/archives/4967

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (04-11-2013) महापर्व दीपावली की गुज़ारिश : चर्चामंच 1419 "मयंक का कोना" पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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दीपावली के पंचपर्वों की शृंखला में
अन्नकूट (गोवर्धन-पूजा) की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'