रविवार, 24 नवंबर 2013

वह तुम ही तो थीं


















वह तुम ही तो थीं
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सरगम के स्पन्दन सी
शबनम मे भीगे चन्दन सी
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जुगनू से भरी रातों में

दुनिया भर की बातों में
राजा रानी के किस्सों में
उठते मिटते जज्बातों में
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विविध भारती के गानों में
"पसन्द आपकी" के पत्रों में
तुम ही तो थी उन नामों में
सारे पर्याय तुम्हारे थे
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तुमने ही तो बान्धी थी
पायल बारिश की बुन्दो में

और पिरोयी थी माला
हवाओं की कुछ छन्दों में
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तुम पुल पर बैठी थी गुमसुम
कुछ कहना सुनना था उस दिन
जब अधरों ने मना कर दिया
आंखो ने बोला था उस दिन
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पर मेरे शब्दकोष में
ऐसी भाषा कही नही थी
जब तक मिलते अर्थ शब्द के
तब तक तुम भी कहीं नहीं थीं
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शब्दार्थों से परे आज
मैं जानता हूं वह तुम ही तो थीं
ख्वाबों में, बातों में, सांसों में, यादों में
वह तुम ही थीं वह तुम ही तो थीं.

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

"इस्सर बईठ दलिद्दर भागे "

आज के दिन का हमें बहुत इन्तजार रहता था।  जब भी ऊख के खेतों की ओर जाते तो  रसीले गन्ने देख कर उसे तोड़ने की  इच्छा करती किन्तु बाबूजी की हिदायत कि एकादशी से पहले उख तोडना पाप है, याद कर मन मसोस कर रह जाते।  आज के दिन गन्ने को सजाया जाता था और उनके बीच वैदिक रीति से विवाह कराया जाता।  फिर कुछ गन्नो को घर लाकर  उसके रस से ग्राम देवी "चउरा माई" का भोग लगाया जाता था। तत्पश्चात पटीदारों भाई  भैवादों  के साथ  गन्ने का आनंद लिया जाता था।

एकादशी से एक दिन पूर्व सूप की खरीददारी की  जाती थी।  सुबह चार बजे गांव की सारी महिलाये गन्ने से सूप पीटते हुए "इस्सर बईठ दलिद्दर भागे " कहती हुयी घर से खेत तक जाती थी।  हम बच्चो के बीच एक और मिथ (आप इसे बच्चो का सत्य भी कह सकते है ) था कि जिस बच्चे के मुह में दाने या कुछ और हो गया है अगर वो गांव की सबसे बुढ़िया का सूप छीन कर भागे तो बुढ़िया जितनी गाली देगी चेहरे की सुंदरता उतनी ही बढ़ेगी।  यह काम एक बार हमारे भाई नागा ने किया था।  सुबह बात पता चल गयी तो (बच्चे तब झूठ नही बोला करते ) उनकी इतनी पिटाई हुयी कि बेचारे काले से लाल हो गये।  

आज जबकि ग्रेटर नॉएडा में ये बात मैं अपनी बेटी को बता रहा हु अजीब सी टीस मन में उठ रही है।  मन कर रहा है लपक कर गांव जाउ और सुक्खू कका के साथ ढेर सारी ऊखें काट कर लाऊ और चउरा माई को रस पिलाकर सारे गांव के साथ रस में सराबोर हो जाउ। 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

डौंडियाखेडा की खुदाई एक साजिश थी


ओम बाबा जैसे लोगो के अन्दर अपने को हाईलाईट करने की दमित इच्छा तब से थी जब वह कांग्रेस मे थे. जब वह शोभन सरकार के चेले से जुडे तो कही न कही वह कीटाणु काम कर रहा था और फल फूल भी रहा था. हां यह बन्दा जिसने सोने का सपना देखा वह शोभन सरकार नही बल्कि उनके देह त्याग के बाद उनकी गद्दी का उत्तराधिकारी है. शोभन सरकार जिन्होने दुखी और निराश लोगो के जीवन मे खुशी बिखेरी वह सपने वाले वर्तमान बाबा नही है. वर्तमान मे जो बाबा शोभन के नाम से सरकार बन बैठे है वह असली नही असली तो इनके गुरु थे. ठीक वैसे जैसे जयेंद्र सरस्वती को शंकराचार्य समझना. वर्तमान मे सपने वाले बाबा अपने गुरु के द्वारा बनाये गये पद प्रतिष्ठा का भोग कर रहे है और इनके साथ नशा पत्ती से सम्बन्धित तमाम किम्वदंतियां है मसलन एक बार इनके आश्रम मे गांजे की मौजूदगी की सूचना मिलने पर जब इनके यहां छापा पडा तो इन्होने अपनी मंत्र तंत्र शक्ति से उसे खर पतवार मे बदल दिया. अब ऐसे “डेप्रियेट” लोग जो एक आम किसान से भी कम ईश्वर के नजदीक है, राजनीति की मदद लेकर लोगो की आवश्यकता पूरी करने का आश्वासन देकर अपनी बाबागीरी और दुकान चमकाते है. ये इतने मूढ और मतिमन्द है कि राजनीति इनका इस्तेमाल करती है और ये इस भ्रम मे रहते है कि “सिस्टम” इनके हिसाब से चल रहा है. इसमे सबसे ज्यादा नुकसान होता है आम जनता का, धर्म का, मानवता का.
डौडिया खेडा के मामले मे भी यही हुआ. भारत का दुर्भाग्य है कि यहां केन्द्र और राज्य मे ऐसी सरकारे है जो तुष्टिकरण के लिये नीचता की किसी भी हद तक जा सकती हैं. दोनो सरकारो के बीच यह तय हुआ कि इस सपने को तूल देकर इस अन्धविश्वास को बढा चढाकर प्रस्तुत किया जाय. सोना तो मिलेगा नही उल्टे शोभन और ओम बाबा के सहारे लोगो की आस्था का मजाक बना दिया जाय और जो कालनेमि टाईप के संत है पहले उन्हे लोककल्याणकारी अवतार सिद्ध किया जाय फिर उनको बदनाम करके समूचे सनातन धर्म के मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाय इस प्रकार ऐसा कर एक देश मे व्यक्ति विशेष की देश मे जो लहर चल रही है जिसका आधार फंडामेंटलिज़्म है  उसे रोका जाय या छिन्न भिन्न कर दिया जाय. शोभन और ओम बाबा जैसे लोग तैयार बैठे थे धर्म और लोगो की श्रद्धा को बेचने के लिये. अगर इन सरकार मे बैठे लोगो की नीयत साफ होती तो जिस तरह से बात  मीडिया मे बात उछाली गयी और मनमोहन से लेकर कांग्रेस आलाकमान इस पर चुप रहे, पूरे देश मे सोने के मिलने का माहौल बना दिया गया (चरणदास तो मुख़ौटा था असली लोग पर्दे की पीछी से काम कर रहे थे), इस तरह से माहौल न बनाया जाता. क्योंकि इन लोगो को खूब मालूम था कि सोना नही निकलेगा और जनता की भावनाये और उनकी आस्था आहत होगी. और हुआ भी यही.
अब सवाल यह उठता है कि इस अक्षम्य अपराध की जिम्मेदार कौन लेगा  मीडिया, सरकारें, शोभन और ओम बाबा या आम जनता खुद?