मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

सुनो मनोहरा ! क्या तुम्हे याद है 'बीघापुर चालीस मील' ?


















सुनो! क्या तुम्हे याद है?
अभी भी 'बीघापुर चालीस मील'
या गृहस्थी के इरेजर ने
मिटा दिए सारे रेखाचित्र,
समय के कैनवास पर जिसे
मैंने खींचे और तुमने रंगे  थे।
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महुए के फूल खाते खाते
एक गीत गाया था तुमने,
फिर ठहर गयी उस सारस के
मटक कर चलते जोड़े को देखकर,
ओठों के कोने पर दबी
मुसकान कुछ कहती थी
जिसे दिल समझता था,
एक बात बताना सच्ची सच्ची
क्या अभी भी मुसकुरा देती हो?
'लुटे कोई मन का नगर' को गाते गाते।  
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साढ़े आठ बजे वाली
रायबरेली डिपो बस की सीट
घेरकर बैठा रहता खिड़की से झांकते हुए   
टेम्पो से उतरकर इधर उधर देखती तुम
मेरे करीब जब बैठ जाती तो अनायास
सुबह की लाली माथे पर सिमट आती थी,
क्या अभी भी तुम्हारे गालों पर
ढाक के फूल खिलते  है?
या बनने लगी है जिम्मेदारियो की लकीरे।  
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इतनी जोर की बारिश और
तुम्हारी बित्ते भर की छतरी
दोनों भीग जाते थे
तन और मन के पोर पोर तक
उस गीलेपन को संजो के रखा है ना?
या नून तेल लकड़ी के ड्रायर ने सुखा दिए
सावन से आँखों तक का पानी।
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तुम भर कर लाती थी मेरी पसंद
अपने तीन खाने वाले टिफिन में,
बड़े तालाब के लाल छींटो वाले कमल और
कुछ घुमावदार सीपियो के खजाने को लेकर
'निराला' से टेढे मेढे रास्ते नापता मै
तुम्हारे पास आता और तुम,
खाने के डिब्बे सजाये राह देखती थी
क्या अभी भी पनीर के परांठे  बनाती हो?
या महंगाई ने पनीर को आलू में बदल दिया।
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सुनो मनोहरा ! क्या तुम्हे याद है?
अभी भी 'बीघापुर चालीस मील' जहां से
हम साथ साथ चले थे एक दूसरे का हाथ थामे।
                         
                                             ++++pawan++mishra+++

 



रविवार, 28 अप्रैल 2013

रेवडिया, बताशे और इनाम कुमार: अथातो 'विज्ञान परिषद' पुरस्कार कथा.


बताशे की गंध हवाओं में तैरने  लगी तो मैंने सोचा की क्या मै  काठमांडू पहुच गया। पर सर झटका  चश्मा उतारा तो धुल धक्कड़ देख के तसल्ली हुयी कि  अब्बै  तो कानपुर में ही है . खैर 'सामलाल' से पता चला की यह गंध तो मेरे प्यारे शहर इलाहाबाद से आ रही है. पता चला 'राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिये विज्ञान के प्रति समर्पित संस्था 'विज्ञान परिषद प्रयाग' ने अपने शताब्दी वर्ष में विभिन्न विभूतियों को  'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से विभूषित किया ' 
प्रथम दृष्टया यह देख के  मन को तसल्ली हुयी कि बडे भाई   डा अरविन्द मिश्र जी को शताब्दी सम्मान से विभूषित किया गया। पुरस्कारों के 'ओरिएंटेशन' को लेकर मन में जो कान्फ्लिक्ट  था दूर होने लगा परन्तु हतभाग्य 'इनाम कुमार' जी हमेशा की तरह चिर स्मित मुसकान लिए वहा भी विराजमान थे। इसके बाद जो मैंने श्रीयुत शेषमणि जी से जानकारी प्राप्त की तो दिमाग में पुरस्कारों की  'परिकल्पना' जो बनी उसे याद करके अब भी लग रहा है की इससे अच्छा तो साला भिखारी की तरह कटोरा लेके 'बारा देवी' के चौराहे पर बैठना ठीक है. जीभ निकाले रेवाडियो का स्वाद लेने के लिए लोगो ने अपनी मान मर्यादा और पद की गरिमा को जिस तरह से ताक पर रखने का क्रम शुरू किया है उससे देखकर लगता है की वह दिन दूर नहीं जब ठेले पर इनाम रखे 'सामलाल' दरवाजे दरवाजे आवाज लगायेंगे इनाम लेल्लो, या बिसारती लोग टिकुली बिंदी चूड़ी के साथ दुई चार इनाम भी बक्से में लेके चलेंगे जाने कब कहा बाटने का मौक़ा मिला जाये।
ज्यादा क्या लिखे भाई लोग मेरे ऊपर मुकदमा करने को आतुर है इसलिए अगर हम किसी को इनाम नहीं दे सकते तो कम से कम बधाई तो दे ही दे
शताब्‍दी सम्‍मान के समापन के अवसर पर 27 अप्रैल 2013 को आयोजित कार्यक्रम में विज्ञान परिषद ने जिन दो  दर्जन से अधिक विज्ञान लेखकों को उनके अपरिमित योगदान  के लिए सम्‍मानित किया जिनमे  डॉ0 मिश्र के अतिरिक्‍त  शुकदेव प्रसाद, डॉ0 राजीव रंजन उपाध्‍याय, निमिष कपूर, मनीष मोहन गोरे, अमित कुमार एवं विशेष रूप से  ब्‍लॉगर कृष्‍ण कुमार यादव  को भी हार्दिक बधाई ।
साथ में यह न्यूज जो कि राजा हिन्दुस्तानी ने उपलब्ध करायी है, सम्मान महात्म्य के रूप में पढने से इस कथा का पूरा लाभ और पुण्य दोनों प्राप्त होगा.  
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गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

रामलाल ! काठमांडु चलबे का रे?

डिस्क्लैमर: अगर ये आप अपनी बात समझ रहे तो मात्र सन्योग के अलावा कुछ नही :):):)















रामलाल! काठमांडु चलबे का रे?
काहे सामलाल? 
अरे उहाँ  इज्जत दी जायेगी सम्मान होगा. 
नाही रे! हमका लपूझन्ना समझे हौ का? हम एतना पईसा खरच करके इज्जत नाही लेबे.
अरे धुत बुडबक अबकी पईसा ना देवे के पडी.
काहे रे अबकी पईसवा कहा से आवा? 
चोप्प! एक त ससुरे के इज्जत देई जात है दूसरे कोश्चन करत बा. 
अरे रमललऊ ! सूचना के अधिकार त हमै सरकार दिहे बा. 
तोहरे जईसे डपोरसंख  गदहा केत मुहे नाही लागै चाहे अरे सरऊ जरमनी कबहू गये हो... नाही ना कहि रहे है हम तोहार नाम के गदहा सम्मान के खातिर प्रस्तावित कई दिहे हई तब्बौ तू एतना भाव खाये रहे हो. जरमनीके फीलिंग चोपचाप काठमांडु मे लेई लो... जब परसाद बांटा जाय रहा है तो दुईनो हाथ बटोरो... एहि बहाने..जादा पचर पचर किहे से का फायदा. 
भईया सामलाल फुनि ई बतावा हमे काठमांडु जायके पईसवा के दे? बडी मोस्किल से इंटरनेट के पैक भराई पाते है उहौ मेहरारू से बचाय के. 
तू सारे दुई कौडी के मनई जब मेहरारू से चोप्पे पैक भरा लेते हो तो एकाध गहना बेचि नही सकते? खेत बेंच,बाग बेंच गहना गुरिया बेंच, कुच्छौ कर पर काठमांडु चल.. ई अनतरराष्ट्रीय परोगराम हवे.
ए समललऊ! अब तू चोप होई जा नाही त देब खाई भर के, भग सारे हिया से. हम घर द्वार बेंचि के काठमांडु जाई. हमार दिमाक खराब बा का रे?  सारे निपुछिया हमके अऊर काम धाम नाही बा का?  हमका  परभात समझे हये का रे! लंगोटिया पे फाग थोरहू खेलबे... तू सरऊ भागिन जा हिया से नाही दे डंडा बोकला निकोल देब...

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

तुम भी खामोश थी मै भी खामोश था












तुम  मेरे पास  थी मै  तेरे पास था
एक मीठी मुहब्बत का एहसास था।
आँख झुकती गयी लब सिले रह गये,
तुम भी खामोश थी मै भी खामोश था।।

रात ढलती  रही   प्यार पलता रहा
सांसो की सरगमी धुन को गुनता रहा।
जनमों की अमावस बनी पूर्णिमा ,
मेरी आगोश में चाँद सोता  रहा ।।

झूमता है जहाँ गीत पर जो मेरे
छंद है ये लिखे  जो थे तेरे लिए।
मेरे होंठो पे जो शब्द तुमने रखे ,
उम्र  भर मै  उसे गुनगुनाता रहा  ।।