मंगलवार, 12 मार्च 2013

...तुम्हे मैं याद आऊँगा


आइना जब भी देखोगी तुम्हे मैं याद आऊँगा
कभी जब हँस के रोओगी, तुम्हे मैं याद आऊँगा,
 

अकेले मे टहलते छत पे बस्स ऐसे जरा यूं ही,
कभी जब चाँद देखोगी तुम्हे मैं याद आऊँगा.
 

हवाएं मुझसे होकर तुम तलक तो जा रही होंगी
जो तुमसे कह नहीं पाया वही
बतला रही होंगी,
 

तुम्हारी आँख मे सावन का मौसम छा गया होगा,
घटायें जब भी बरसेंगी   तुम्हे मैं याद आऊँगा.
 

उठेगी हुक दिल में जब खिलेंगे फूल बागो में
तुम्हारी नज़रे ढूंढेगी  मुझे तेरे ही ख़्वाबों में,
 

मिटेगी ना इबारत जो लिखी पहली मुहब्बत की,
बहारे जब भी आयेंगी, तुम्हे मैं याद आऊँगा.

12 टिप्‍पणियां:

Neel Shukla ने कहा…

really fantastic..brother

Neel Shukla ने कहा…

really marvolous

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
नहीं देखना चाँद को, आऊँगा मैं याद।
दर्पण से करना नहीं, कोई भी फरियाद।।
--
आपकी इस पोस्ट का लिंक आज बुधवार 13-03-2013 को चर्चा मंच पर भी है! सूचनार्थ...सादर!

वाणी गीत ने कहा…

याद आने के बहाने कितने हैं !
बढ़िया !

दिनेश पारीक ने कहा…


सादर जन सधारण सुचना आपके सहयोग की जरुरत
साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )

Kuldeep Sing ने कहा…

आप की ये रचना शुकरवार यानी 15-03-2013 को http://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com पर लिंक की गयी है... आप भी इस हलचल में शामिल होना...
सूचनार्थ...

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

कमाल का मिसरा है। बसंतोत्सव की शुभकामनाएं :)

Amrita Tanmay ने कहा…

वाह!

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति -
आभार डाक्टर साहब-

Ravindra Nath ने कहा…

अति सुन्दर

ramji ने कहा…

आया है मुझे फिर याद वो जालिम गुजरा जमाना ....मोहब .............का ....

AMAN MISHRA ने कहा…

bahut badiya sir ji ....