मंगलवार, 22 जनवरी 2013

चिट्ठी ना कोई सन्देश जाने वो कौन सा देश जहा तुम चले गये

 आज गली मुहल्ले से लेकर जाने कैसे कैसे चिरकुट लोग "नेता जी"के नाम से अपने को सम्बोधित करवा रहे है जोकिनेताजी सुभाष के पाव की धोवन के बराबर नही. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरानजो व्यक्ति अपनो की साजिश का शिकार हो गया जिसने मातृभूमि को सब कुछ न्योछावर कर दिया उसके प्रति आज के नेताओ की कृतघ्नता देख कर शर्म आतीहै आज तक यह ना पता चल पाया कि नेताजी की मौत कैसे हुयी.
आज जरूरत कि जनता इन कांग्रेसियो से अपने प्यारे नेताजी के बारे मे सवाल पूछे कि जिस बन्दे ने देश से बाहर आज़ाद हिन्द फौज बनायी वह देश मे कायरो की भांति गुमनामी जिन्दगी क्यो जियेगा?नेताजी सुभाषचन्द्र बोस विमान दुर्घटना मे नही मरे. जवाहरलाल नेहरू की महत्वाकान्क्षा की भेट चढ गये. सिंगापुर से वह सोवियत रूस ले जाये गये और भारत मे एक "गुमनामी बाबा" का किरदार गढा गया. ताकि उनके सोवियत रूस के किसी जेल मे होने की बात दब जाय.सोवियत रूस उस समय मित्र देशो के साथ था.हालात आज भी है कि हिटलर के साथ होने की हिमाकत वर्तमान मे भी कोई देश नही करता तो नेताजी जिन्होने जर्मनी और जापान के साथ हिन्दुस्तान को खडा करने की कोशिश की थी उन्हे मित्र राष्ट्र कैसे छोड सकते थे. नेहरू मित्र राष्ट्रो के सर्वाधिक अनुकूल नेता थे सो असली नेताजी को सोवियत के किसी जेल मे बन्द करके नकली नेताजी को गुमनामी बाबा के नाम से फैजाबाद भेज दिया गया. नेताजी के ज्यादातर भक्त आज ‘दशनामी सन्यासी’ उर्फ ‘भगवान जी’ उर्फ ‘गुमनामी बाबा’ को ही नेताजी मानते हैं। (अनुज धर के ‘मिशन नेताजी’ ने इसके लिए बाकायदे अभियान चला रखा है।) कारण हैं: उनकी कद-काठी, बोल-चाल इत्यादि नेताजी जैसा होना; कम-से-कम चार मौकों पर उनका यह स्वीकारना कि वे नेताजी हैं; उनके सामान में नेताजी के पारिवारिक तस्वीरों का पाया जाना; नेताजी के करीबी रहे लोगों से उनकी घनिष्ठता और पत्र-व्यवहार; बात-चीत में उनका जर्मनी आदि देशों का जिक्र करना; इत्यादि।
जो बातें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के समर्थन में जाती हैं, उन्हीं में से कुछ बातें उनके विरुद्ध भी जाती है, मिसाल के तौर पर: सन्यास लेकर जब नेताजी ने पिछले जीवन से नाता तोड़ लिया, तो फिर पुराने पारिवारिक छायाचित्रों के मोह से वे क्यों बँधे रहे? क्या सिंगापुर छोड़ने के समय से ही वे इन छायाचित्रों को साथ लिये घूम रहे थे?
अगर उनके सामान में उनके ही टाईपराईटर और बायनोकूलर पाये जाते हैं, तो यह ‘दाल में काला’- जैसा मामला है। सिंगापुर छोड़ते समय निस्सन्देह वे अपना टाईपराइटर और बायनोकूलर साथ नहीं ले गये होंगे, न ही (सन्यास धारण करने के बाद) सोवियत संघ से भारत आते समय इन्हें लेकर आये होंगे, फिर ये उनतक कैसे पहुँचे? सिंगापुर में उनके सामान को तो माउण्टबेटन की सेना ने जब्त कर सरकारी खजाने में पहुँचा दिया होगा। (एक कुर्सी शायद लालकिले में है।)

माना कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नेताजी पर छपने वाली खबरों की कतरनों को उनके भक्तजनों ने उनतक पहुँचाया होगा, मगर सरकारी खजाने से निकालकर मेड इन इंग्लैण्ड एम्पायर कोरोना टाईपराइटर और मेड इन जर्मनी 16 गुना 56 दूरबीन उनतक पहुँचाना उनके भक्तजनों के बस की बात नहीं है। तो फिर? क्या गुप्तचर विभाग के अधिकारियों ने उनके पास ये सामान पहुँचाये? तो क्या ‘गुमनामी बाबा’ को भारत सरकार के गुप्तचर विभाग ने खड़ा किया था? ताकि वास्तविक नेताजी की ओर लोगों का ध्यान न जाये? या फिर, जनता ‘ये असली हैं’ और ‘वे असली हैं’ को लेकर लड़ती रहे और सरकार चैन की साँस लेती रहे?

"दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे
सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर
मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर
मृत्यु देवताओं ने होंगे प्राण तुम्हारे खींचे

प्राण तुम्हारे धूमकेतु से चीर गगन पट झीना
जिस दिन पहुंचे होंगे देवलोक की सीमाओं पर
अमर हो गई होगी आसन से मौत मूर्च्छिता होकर
और फट गया होगा ईश्वर के मरघट का सीना

और देवताओं ने ले कर ध्रुव तारों की टेक -
छिड़के होंगे तुम पर तरुनाई के खूनी फूल
खुद ईश्वर ने चीर अंगूठा अपनी सत्ता भूल
उठ कर स्वयं किया होगा विद्रोही का अभिषेक

किंतु स्वर्ग से असंतुष्ट तुम, यह स्वागत का शोर
धीमे-धीमे जबकि पड़ गया होगा बिलकुल शांत
और रह गया होगा जब वह स्वर्ग देश
खोल कफ़न ताका होगा तुमने भारत का भोर।"(धर्मवीर भारती)

9 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

सादर नमन -
शुभकामनायें-

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति!
वरिष्ठ गणतन्त्रदिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ और नेता जी सुभाष को नमन!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को शत शत नमन !

वो जो स्वयं विलुप्तता मे चला गया - ब्लॉग बुलेटिन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को समर्पित आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

HARSHVARDHAN ने कहा…

पवन जी , आप लगभग ठीक ही कह रहे कि - सुभाष बाबू , सोवियत रूस में ही थे। क्योंकि 50 के दशक में पंडित जवाहर लाल नेहरु की बहन श्रीमती पंडित विजयलक्ष्मी और उस समय के भारत के उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण सोवियत रूस के दौरे के दौरान सुभाष जी से मिलकर आयें थे।

HARSHVARDHAN ने कहा…

पवन जी , आप लगभग ठीक ही कह रहे कि - सुभाष बाबू , सोवियत रूस में ही थे। क्योंकि 50 के दशक में पंडित जवाहर लाल नेहरु की बहन श्रीमती पंडित विजयलक्ष्मी और उस समय के भारत के उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण सोवियत रूस के दौरे के दौरान सुभाष जी से मिलकर आयें थे।

HARSHVARDHAN ने कहा…

पवन जी , आप लगभग ठीक ही कह रहे कि - सुभाष बाबू , सोवियत रूस में ही थे। क्योंकि 50 के दशक में पंडित जवाहर लाल नेहरु की बहन श्रीमती पंडित विजयलक्ष्मी और उस समय के भारत के उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण सोवियत रूस के दौरे के दौरान सुभाष जी से मिलकर आयें थे।

HARSHVARDHAN ने कहा…

विजयलक्ष्मी जी तो नेताजी से हुई मुलाकात को भारतीय जनता के सामने सार्वजानिक करना चाहती थी। लेकिन कहते है कि पंडित जवाहर लाल नेहरु ने उन्हें ये सब बताने से रोक दिया था।

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

जाने कहाँ चले गए ?? मन आज तक व्याकुल ही होता है सोच सोच .....
सुन्दर रचना ....नेता जी को शत शत नमन ....आप का आभार ...
जय श्री राधे
भ्रमर 5

Padm Singh ने कहा…

और फट गया होगा ईश्वर के मरघट का सीना ... नेता जी जैसी नेतृत्व क्षमता को कुछ लोगों ने समझ कर भी स्वार्थवश विलोपित करने का दुष्चक्र रचा और कुछ लोगों ने समझा ही नहीं। उनका असमय और अज्ञात रूप से चले जाना भारत की तकदीर और तस्वीर से कुछ रंग अधूरे रह जाने जैसा रहा। उनके कार्यों को 6 करते हुए देश उनका कृतज्ञ है और श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।