मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

इकतीस दिसम्बर की भीगती शाम















इकतीस दिसम्बर की 

भीगती शाम, 
बारिश से धुली हवायें 
और उनमे घुलती बर्फ 
ज़िस्म में उतर जाती है। 
++++++
नि:शब्द सर्द मौसम
बीते दिनों की कहानी
फिर कह जाता है
कुहासे की खिड़की से
एक ख़त फेंक जाता है।
++++++

जिसमें लिखा है
"तुम कैसे हो"
कुछ बूंदे भी पड़ी है
वहीं दस्तखत के साथ

इकतीस दिसम्बर की 
भीगती शाम। 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

जब से बिजुली गयी गांव से सतयुग लौटा है

जब से बिजुली ली गयी गांव से 
समाजवाद लौटा है 
+++++++
टेपरिकाट के आगे.… 
मंगरू मिसिर करीवा चस्मा 
लाल रुमाल जैक्सनवा झटका 
(अब)
मुरई मरचा लगावत है 
मनै मन फगुवा गावत है 
+++++++
टीवी के आगे …
छोटकी काकी पिच्चर देखें
बिसरती से इसनो पौडर लेंवें
(अब)
जोन्हरी के चिरई उड़ावत है
मनै मन कका के गरियावत है
++++++++
किरकेट के आगे.…
जवनके तब पगलाय रहे
मैचवै में अंखिया गड़ाय रहे
(अब)
बाजा में कृषि जगत आवत है
गया भाय लोकगीत गावत है
+++++++++
चूल्हा बरा दुआरे पे
लकड़ी आवे पछवारे से
सुक्खू सोभा जोखू झूरी
घुरहू झुम्मू गाढ़ा सुग्गी
ऊदल पंडा छंगू बोलै
जउ जाई बिजुरिया ठेंगे से
टूट खंभवा ठेंगे से
सरकारी तार सरकारी खाद
लापटपवा टबलेटवा ठेंगे से
सरकारी पईसवा(पिनसिन औ भत्ता) ठेंगे से
++++++++++
बोल बहादुर जै चउरा मईया
जै जै भंईसी जै जै गईया
आपन गाऊं गिराऊ के जै हो
खेत अऊर खरिहान के जै हो
जोगीबीर से बडका गाटा
पीपल पोखर पनघट तलिया
मेंड़ मड़ईया कोलिया ठीहा
दीया बाती लिट्टी चोखा
रस माठा औ' लपसी ठोकवा
कजरी फगुआ चइता बिरहा
पायल छागल पियरी कजरा
आल्हा कीर्तन बन्नी बन्ना
चिल्होर पाती ओक्का बोक्का
मूसर ओखरी चक्की जांता
+++++++++++
नखलऊ डिल्लिया मुर्दाबाद
आपन जांगर जिंदाबाद
डीजल फीजल गै भट्ठा मा
तारा इनारा जिंदाबाद
लोनिया टेक्टर भाड़ में झोंको
हीरा मोती जिंदाबाद
++++++++++++
जै बोल महाबीर बाबा
जै बोल महाबीर बाबा
+++++++++++
जब से बिजुली गयी गांव से
समाजवाद लौटा है

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

दिलक़शी मेरे काश्मीर की।













सांझ बुनती है 
बर्फ के रेशों से 
चाँदी का दुशाला 
ओढ़ा देती है, 
चिनार के दरख्तों को।  
+++++++++
सुनहरी मछली डल से होती हुयी 
जाती है तवी तक 
नीलम हो जाने को 
पानी में चखने, 
स्वाद आस्मां का। 
+++++++++++
सिगड़ी से लेकर 
चुटकी भर आग 
गीली रात के जुगनू 
बुवाई करते हैं 
सुबह लहलहा जाती है, 
फ़स्ले केसर की। 
++++++++++
दिलरुबा के साज पर 
सूफ़ी की रुबाईयाँ 
सिफ़ारिश करती हैं 
पकते सेब में छिपे मौला से 
कायम रखना,
दोशीज़ाओं की अल्हड़ हँसी 
अम्मी की रोशनी 
गुलमर्ग के गुल 
सोनमर्ग के परदेसी 
महफूज़ रखना 
दिलक़शी मेरे काश्मीर की। 
 

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

मैं बिलकुल अच्छा हूँ














मैं कैसे हूँ ? 
आखिर तुमने पूछ ही लिया  ना 
बिलकुल वैसा 
बेतरतीब, आलसी, तकरीबन निठल्ले जैसा 
तुम्हे भी तो पसंद था
मेरा बेतरतीब होना।  
++++++++ 
फालतू चीजें आज भी इकट्ठी रहती हैं 
मेरे आस पास, 
शेल्फ की  किताबों पर 
धूल कुछ ज्यादा जम गयी है 
तुम्हारे अधरों में  रंगी मूँगिया शाम 
आज भी मुड़ी  तुड़ी 
टंगी है  अलगनी से। 
+++++++++
कुछ पन्ने, 
जो अब हल्दी वाले रंग में रंग गये हैं 
शायद वे मुझसे ज्यादा संवेदनशील हो गये 
या वक्त का असर हो गया 
घेरे रहते है, 
जिन पर लिखी है 
समाजशास्त्र की परिभाषायें 
और कुछ प्रेमगीत।
++++++++++ 
दो कप कॉफ़ी के 
"हो शुरू हर पल" वाले,
और मीडियम वेव वाला रेडियो 
बस्स इतनी सी तो बाते है, 
बाकी जो भी है 
वह तुम्हारा ही तो "रिफलेक्शन" है। 
+++++++++++
न्यूज़ पेपर पढ़ती हो क्या 
(मीडिया भी ना )
तलाशी में सिर्फ एक कलम ही तो मिली थी 
वो जो इग्जाम के लिए तुमने दिया था बस्स। 
+++++++++++
मैं बिलकुल अच्छा हूँ, 
तुम समझ रही हो ना 
बच्चे से कहना स्नेह, 
और मुझसे ज्यादा "उस" प्रबल भाग्य वाले को भी
बिना लिए नाम मेरा। 
+++PM+++


रविवार, 24 नवंबर 2013

वह तुम ही तो थीं


















वह तुम ही तो थीं
+++++++++++
सरगम के स्पन्दन सी
शबनम मे भीगे चन्दन सी
+++++++++++
जुगनू से भरी रातों में

दुनिया भर की बातों में
राजा रानी के किस्सों में
उठते मिटते जज्बातों में
+++++++++++
विविध भारती के गानों में
"पसन्द आपकी" के पत्रों में
तुम ही तो थी उन नामों में
सारे पर्याय तुम्हारे थे
+++++++++++

तुमने ही तो बान्धी थी
पायल बारिश की बुन्दो में

और पिरोयी थी माला
हवाओं की कुछ छन्दों में
+++++++++++
तुम पुल पर बैठी थी गुमसुम
कुछ कहना सुनना था उस दिन
जब अधरों ने मना कर दिया
आंखो ने बोला था उस दिन
+++++++++++
पर मेरे शब्दकोष में
ऐसी भाषा कही नही थी
जब तक मिलते अर्थ शब्द के
तब तक तुम भी कहीं नहीं थीं
+++++++++++
शब्दार्थों से परे आज
मैं जानता हूं वह तुम ही तो थीं
ख्वाबों में, बातों में, सांसों में, यादों में
वह तुम ही थीं वह तुम ही तो थीं.

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

"इस्सर बईठ दलिद्दर भागे "

आज के दिन का हमें बहुत इन्तजार रहता था।  जब भी ऊख के खेतों की ओर जाते तो  रसीले गन्ने देख कर उसे तोड़ने की  इच्छा करती किन्तु बाबूजी की हिदायत कि एकादशी से पहले उख तोडना पाप है, याद कर मन मसोस कर रह जाते।  आज के दिन गन्ने को सजाया जाता था और उनके बीच वैदिक रीति से विवाह कराया जाता।  फिर कुछ गन्नो को घर लाकर  उसके रस से ग्राम देवी "चउरा माई" का भोग लगाया जाता था। तत्पश्चात पटीदारों भाई  भैवादों  के साथ  गन्ने का आनंद लिया जाता था।

एकादशी से एक दिन पूर्व सूप की खरीददारी की  जाती थी।  सुबह चार बजे गांव की सारी महिलाये गन्ने से सूप पीटते हुए "इस्सर बईठ दलिद्दर भागे " कहती हुयी घर से खेत तक जाती थी।  हम बच्चो के बीच एक और मिथ (आप इसे बच्चो का सत्य भी कह सकते है ) था कि जिस बच्चे के मुह में दाने या कुछ और हो गया है अगर वो गांव की सबसे बुढ़िया का सूप छीन कर भागे तो बुढ़िया जितनी गाली देगी चेहरे की सुंदरता उतनी ही बढ़ेगी।  यह काम एक बार हमारे भाई नागा ने किया था।  सुबह बात पता चल गयी तो (बच्चे तब झूठ नही बोला करते ) उनकी इतनी पिटाई हुयी कि बेचारे काले से लाल हो गये।  

आज जबकि ग्रेटर नॉएडा में ये बात मैं अपनी बेटी को बता रहा हु अजीब सी टीस मन में उठ रही है।  मन कर रहा है लपक कर गांव जाउ और सुक्खू कका के साथ ढेर सारी ऊखें काट कर लाऊ और चउरा माई को रस पिलाकर सारे गांव के साथ रस में सराबोर हो जाउ। 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

डौंडियाखेडा की खुदाई एक साजिश थी


ओम बाबा जैसे लोगो के अन्दर अपने को हाईलाईट करने की दमित इच्छा तब से थी जब वह कांग्रेस मे थे. जब वह शोभन सरकार के चेले से जुडे तो कही न कही वह कीटाणु काम कर रहा था और फल फूल भी रहा था. हां यह बन्दा जिसने सोने का सपना देखा वह शोभन सरकार नही बल्कि उनके देह त्याग के बाद उनकी गद्दी का उत्तराधिकारी है. शोभन सरकार जिन्होने दुखी और निराश लोगो के जीवन मे खुशी बिखेरी वह सपने वाले वर्तमान बाबा नही है. वर्तमान मे जो बाबा शोभन के नाम से सरकार बन बैठे है वह असली नही असली तो इनके गुरु थे. ठीक वैसे जैसे जयेंद्र सरस्वती को शंकराचार्य समझना. वर्तमान मे सपने वाले बाबा अपने गुरु के द्वारा बनाये गये पद प्रतिष्ठा का भोग कर रहे है और इनके साथ नशा पत्ती से सम्बन्धित तमाम किम्वदंतियां है मसलन एक बार इनके आश्रम मे गांजे की मौजूदगी की सूचना मिलने पर जब इनके यहां छापा पडा तो इन्होने अपनी मंत्र तंत्र शक्ति से उसे खर पतवार मे बदल दिया. अब ऐसे “डेप्रियेट” लोग जो एक आम किसान से भी कम ईश्वर के नजदीक है, राजनीति की मदद लेकर लोगो की आवश्यकता पूरी करने का आश्वासन देकर अपनी बाबागीरी और दुकान चमकाते है. ये इतने मूढ और मतिमन्द है कि राजनीति इनका इस्तेमाल करती है और ये इस भ्रम मे रहते है कि “सिस्टम” इनके हिसाब से चल रहा है. इसमे सबसे ज्यादा नुकसान होता है आम जनता का, धर्म का, मानवता का.
डौडिया खेडा के मामले मे भी यही हुआ. भारत का दुर्भाग्य है कि यहां केन्द्र और राज्य मे ऐसी सरकारे है जो तुष्टिकरण के लिये नीचता की किसी भी हद तक जा सकती हैं. दोनो सरकारो के बीच यह तय हुआ कि इस सपने को तूल देकर इस अन्धविश्वास को बढा चढाकर प्रस्तुत किया जाय. सोना तो मिलेगा नही उल्टे शोभन और ओम बाबा के सहारे लोगो की आस्था का मजाक बना दिया जाय और जो कालनेमि टाईप के संत है पहले उन्हे लोककल्याणकारी अवतार सिद्ध किया जाय फिर उनको बदनाम करके समूचे सनातन धर्म के मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाय इस प्रकार ऐसा कर एक देश मे व्यक्ति विशेष की देश मे जो लहर चल रही है जिसका आधार फंडामेंटलिज़्म है  उसे रोका जाय या छिन्न भिन्न कर दिया जाय. शोभन और ओम बाबा जैसे लोग तैयार बैठे थे धर्म और लोगो की श्रद्धा को बेचने के लिये. अगर इन सरकार मे बैठे लोगो की नीयत साफ होती तो जिस तरह से बात  मीडिया मे बात उछाली गयी और मनमोहन से लेकर कांग्रेस आलाकमान इस पर चुप रहे, पूरे देश मे सोने के मिलने का माहौल बना दिया गया (चरणदास तो मुख़ौटा था असली लोग पर्दे की पीछी से काम कर रहे थे), इस तरह से माहौल न बनाया जाता. क्योंकि इन लोगो को खूब मालूम था कि सोना नही निकलेगा और जनता की भावनाये और उनकी आस्था आहत होगी. और हुआ भी यही.
अब सवाल यह उठता है कि इस अक्षम्य अपराध की जिम्मेदार कौन लेगा  मीडिया, सरकारें, शोभन और ओम बाबा या आम जनता खुद? 

मंगलवार, 25 जून 2013

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

अभी दो सूचनाये मिली 
१. 
"अभी पिछले दिनों जब मैंने फेसबुक पर एक अपडेट किया तो अनुमान नहीं था कि उसका एक खौफनाक  परिणाम सामने आ जाएगा .अविनाश वाचस्पति जी को लगा कि वह अपडेट मैंने उन पर किया है और उन्होंने अपने ब्लाग्स को हमेशा के लिए ब्लाक कर दिया और मात्र फेसबुक पर बने रहने की घोषणा कर डाली। "... डॉ अरविन्द मिश्र
२. 
"संतोष त्रिवेदी की टिप्पणी थी- फेसबुक की लत छूट चुकी है,ट्विटर पर यदा-कदा भ्रमण कर लेते हैं पर ब्लॉगिंग पर नशा तारी है ! जब तक खुमारी नहीं मिटती,लिखना और घोखना जारी रहेगा !
आज की स्थिति में ब्लॉग के प्रति आपका लगाव बरकरार है। और आपने लिखा भी -अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे हुए हैं मरघट में किसी का इंतजार करेंगे कयामत तक। संतोष त्रिवेदी उदीयमान ब्लॉगर से ब्लॉगिंग में अस्त से हो चुके हैं। फ़ेसबुक की लत दुबारा लगा गयी है।" ...अनूप शुक्ल  

अगर अविनाश  जी ने अगर अपने ब्लाग्स बंद कर दिए तो वाकई उन पर ठगी और बेईमानी का आरोप बनता है… क्योकि ब्लागिंग को  प्रोत्साहित करने के नाम पर जो कार्यक्रम किये गए जिन लोगो का सम्मान वगैरह किया गया था फर्जी निकला। जब खुदै का ब्लॉग ब्लाक कर दिहे तो दुसरे को ब्लॉग चलाने और प्रोत्साहित करने का अधिकार आपके पास नही। और रवीन्द्र प्रभात को चाहिये कि  संतोष जी से भी 'उदयीमान ब्लॉगर' का पुरस्कार छीन ले। अविनाश जी के इस कृत्य से लखनऊ वाले कार्यक्रम की पोल भी खुल गयी। जिनका ब्लागिंग के प्रति टुच्चा दृष्टिकोण था उन्ही को चुन चुन कर पुरस्कार सम्मान दिए गए(एकाध अपवाद को छोड़ दे).

ब्लागिंग  बड़े बड़े स्वनामधन्य  फौलादी, इस्पाती, पराक्रमी, सूरमा कितने छुई मुई और भीरु निकले। कहा हम जैसे झंडू आदमी  समझते रहे कि ये महामानव ब्लागिंग को नई दिशा देंगे मगर ये तो सद्दाम हुसैन निकले। बहरहाल मैंने पहले ही कहा था कि  कुलीन/ मठाधीश और स्वयम्भू/ब्रम्हा बनने के चक्कर मे त्रिशंकु की ही गति मिलती है। किसी के जाने से धरती घूमना बंद नही करती। ऐसे त्रिशंकुओ को कर्मनाशा मिले। 

.....काठमांडू जाने वालो सावधान हो जाओ!!!



-- 

शुक्रवार, 3 मई 2013

ब्लागिंग के धन्धेबाज बनाम ट्रैवल एजेंट: एक विश्लेषण

आपने कभी ट्रैवल कम्पनियो का नाम सुना है? ये कम्पनिया एक निश्चित पैकेज पर आपको घूमने फिरने, होटलिंग, मौज करने का साधन मुहैया कराती है. विश्व मे कही घूमना हो इनसे सम्पर्क कीजिये और घूमिये. आजकल इन कम्पनियो से प्रेरणा प्राप्त कर साहित्य, समाजसेवी, ब्लागिंग के धन्धेबाज   लोग पैकेज बना कर 'एकेडेमिक' 'साहित्यिक' या 'सामाजिक' सरोकारो की आड लेकर पौ बारह कर रहे है. आपसे अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के नाम पर मोटी रकम वसूली जायेगी और फिर ट्रैवल एजेंटो से साठ गांठ कर के सस्ते मद्दे  मे घुम्मी करा दी जायेगी, ल्यो आप अंतर्राष्ट्रीय ठप्पा लगवा लिये.
आप भी महान होने का गुरु गम्भीर चेहरा लिये वापस आते है. फिर अपने उस 'प्रवास' का हवाला बात बात मे देने लगेंगे.वास्तव मे है क्या कि पेड कार्यक्रम और पुरस्कारो से नये लेखक या 'ईनाम' के लिये मुह बाये लोगो को लगने लगता है कि वे ही पूर्वजनम मे शेक्सपियर और कालीदास रहे होंगे. इसी चक्कर मे अपने को लुटवा कर सम्मानित लेखक का तमगा जडवा लेते है और उसे सीने से चिपकाये अईसे घूमते है जईसे कोई पगलेट कूडे  को लेके खुद से चिपकाये घूमता है और रद्दी को 'एसेट' समझता है.
लोभ लालच के चक्कर मे लोगो ने अपना बहुत नुकसान किया है और धन्धेबाजो ने इस भावना को पहचान कर इसका खूब दोहन भी किया है.ताजा मिसाल ब्लागिंग मे चल रहे 'पेड कार्यक्रमो' की है. ब्लागिंग के नये खलीफा लोग अंतराष्ट्रीय ब्लागिंग के नाम पर जो झोल तैयार कर रहे है उससे लगता है कि मुर्गे काफी फंसेगे, खास बात यह है कि ये मुर्गे अपनी खुशी से अपने को हलाल करवायेगे. तुलसी बाबा बहुत पहिले ही लिख गये थे कि जिसको दूसरे का धन हरण करने की विद्या आती है वही इक्कीसवी सदी का गुनवंत ज्ञानी होगा. तो आज उस  'परिकल्पना'  को सत्य सिद्ध होता हुआ हम देख सकते है.
बहरहाल कुलीन/ मठाधीश और स्वयम्भू/ब्रम्हा बनने के चक्कर मे त्रिशंकु की ही गति मिलती है. लोकतंत्र अपना रास्ता ढूंढ लेता है...
भगवान इन धन्धेबाजो और दलालो से ब्लागिंग साहित्य  को बचाये ऐसी कामना करता हू.


मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

सुनो मनोहरा ! क्या तुम्हे याद है 'बीघापुर चालीस मील' ?


















सुनो! क्या तुम्हे याद है?
अभी भी 'बीघापुर चालीस मील'
या गृहस्थी के इरेजर ने
मिटा दिए सारे रेखाचित्र,
समय के कैनवास पर जिसे
मैंने खींचे और तुमने रंगे  थे।
++++++++++++++++++++
महुए के फूल खाते खाते
एक गीत गाया था तुमने,
फिर ठहर गयी उस सारस के
मटक कर चलते जोड़े को देखकर,
ओठों के कोने पर दबी
मुसकान कुछ कहती थी
जिसे दिल समझता था,
एक बात बताना सच्ची सच्ची
क्या अभी भी मुसकुरा देती हो?
'लुटे कोई मन का नगर' को गाते गाते।  
+++++++++++++++++++++
साढ़े आठ बजे वाली
रायबरेली डिपो बस की सीट
घेरकर बैठा रहता खिड़की से झांकते हुए   
टेम्पो से उतरकर इधर उधर देखती तुम
मेरे करीब जब बैठ जाती तो अनायास
सुबह की लाली माथे पर सिमट आती थी,
क्या अभी भी तुम्हारे गालों पर
ढाक के फूल खिलते  है?
या बनने लगी है जिम्मेदारियो की लकीरे।  
++++++++++++++++++++++
इतनी जोर की बारिश और
तुम्हारी बित्ते भर की छतरी
दोनों भीग जाते थे
तन और मन के पोर पोर तक
उस गीलेपन को संजो के रखा है ना?
या नून तेल लकड़ी के ड्रायर ने सुखा दिए
सावन से आँखों तक का पानी।
++++++++++++++++++++++
तुम भर कर लाती थी मेरी पसंद
अपने तीन खाने वाले टिफिन में,
बड़े तालाब के लाल छींटो वाले कमल और
कुछ घुमावदार सीपियो के खजाने को लेकर
'निराला' से टेढे मेढे रास्ते नापता मै
तुम्हारे पास आता और तुम,
खाने के डिब्बे सजाये राह देखती थी
क्या अभी भी पनीर के परांठे  बनाती हो?
या महंगाई ने पनीर को आलू में बदल दिया।
 +++++++++++++++++++++++++
सुनो मनोहरा ! क्या तुम्हे याद है?
अभी भी 'बीघापुर चालीस मील' जहां से
हम साथ साथ चले थे एक दूसरे का हाथ थामे।
                         
                                             ++++pawan++mishra+++

 



रविवार, 28 अप्रैल 2013

रेवडिया, बताशे और इनाम कुमार: अथातो 'विज्ञान परिषद' पुरस्कार कथा.


बताशे की गंध हवाओं में तैरने  लगी तो मैंने सोचा की क्या मै  काठमांडू पहुच गया। पर सर झटका  चश्मा उतारा तो धुल धक्कड़ देख के तसल्ली हुयी कि  अब्बै  तो कानपुर में ही है . खैर 'सामलाल' से पता चला की यह गंध तो मेरे प्यारे शहर इलाहाबाद से आ रही है. पता चला 'राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिये विज्ञान के प्रति समर्पित संस्था 'विज्ञान परिषद प्रयाग' ने अपने शताब्दी वर्ष में विभिन्न विभूतियों को  'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से विभूषित किया ' 
प्रथम दृष्टया यह देख के  मन को तसल्ली हुयी कि बडे भाई   डा अरविन्द मिश्र जी को शताब्दी सम्मान से विभूषित किया गया। पुरस्कारों के 'ओरिएंटेशन' को लेकर मन में जो कान्फ्लिक्ट  था दूर होने लगा परन्तु हतभाग्य 'इनाम कुमार' जी हमेशा की तरह चिर स्मित मुसकान लिए वहा भी विराजमान थे। इसके बाद जो मैंने श्रीयुत शेषमणि जी से जानकारी प्राप्त की तो दिमाग में पुरस्कारों की  'परिकल्पना' जो बनी उसे याद करके अब भी लग रहा है की इससे अच्छा तो साला भिखारी की तरह कटोरा लेके 'बारा देवी' के चौराहे पर बैठना ठीक है. जीभ निकाले रेवाडियो का स्वाद लेने के लिए लोगो ने अपनी मान मर्यादा और पद की गरिमा को जिस तरह से ताक पर रखने का क्रम शुरू किया है उससे देखकर लगता है की वह दिन दूर नहीं जब ठेले पर इनाम रखे 'सामलाल' दरवाजे दरवाजे आवाज लगायेंगे इनाम लेल्लो, या बिसारती लोग टिकुली बिंदी चूड़ी के साथ दुई चार इनाम भी बक्से में लेके चलेंगे जाने कब कहा बाटने का मौक़ा मिला जाये।
ज्यादा क्या लिखे भाई लोग मेरे ऊपर मुकदमा करने को आतुर है इसलिए अगर हम किसी को इनाम नहीं दे सकते तो कम से कम बधाई तो दे ही दे
शताब्‍दी सम्‍मान के समापन के अवसर पर 27 अप्रैल 2013 को आयोजित कार्यक्रम में विज्ञान परिषद ने जिन दो  दर्जन से अधिक विज्ञान लेखकों को उनके अपरिमित योगदान  के लिए सम्‍मानित किया जिनमे  डॉ0 मिश्र के अतिरिक्‍त  शुकदेव प्रसाद, डॉ0 राजीव रंजन उपाध्‍याय, निमिष कपूर, मनीष मोहन गोरे, अमित कुमार एवं विशेष रूप से  ब्‍लॉगर कृष्‍ण कुमार यादव  को भी हार्दिक बधाई ।
साथ में यह न्यूज जो कि राजा हिन्दुस्तानी ने उपलब्ध करायी है, सम्मान महात्म्य के रूप में पढने से इस कथा का पूरा लाभ और पुण्य दोनों प्राप्त होगा.  
imageview

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

रामलाल ! काठमांडु चलबे का रे?

डिस्क्लैमर: अगर ये आप अपनी बात समझ रहे तो मात्र सन्योग के अलावा कुछ नही :):):)















रामलाल! काठमांडु चलबे का रे?
काहे सामलाल? 
अरे उहाँ  इज्जत दी जायेगी सम्मान होगा. 
नाही रे! हमका लपूझन्ना समझे हौ का? हम एतना पईसा खरच करके इज्जत नाही लेबे.
अरे धुत बुडबक अबकी पईसा ना देवे के पडी.
काहे रे अबकी पईसवा कहा से आवा? 
चोप्प! एक त ससुरे के इज्जत देई जात है दूसरे कोश्चन करत बा. 
अरे रमललऊ ! सूचना के अधिकार त हमै सरकार दिहे बा. 
तोहरे जईसे डपोरसंख  गदहा केत मुहे नाही लागै चाहे अरे सरऊ जरमनी कबहू गये हो... नाही ना कहि रहे है हम तोहार नाम के गदहा सम्मान के खातिर प्रस्तावित कई दिहे हई तब्बौ तू एतना भाव खाये रहे हो. जरमनीके फीलिंग चोपचाप काठमांडु मे लेई लो... जब परसाद बांटा जाय रहा है तो दुईनो हाथ बटोरो... एहि बहाने..जादा पचर पचर किहे से का फायदा. 
भईया सामलाल फुनि ई बतावा हमे काठमांडु जायके पईसवा के दे? बडी मोस्किल से इंटरनेट के पैक भराई पाते है उहौ मेहरारू से बचाय के. 
तू सारे दुई कौडी के मनई जब मेहरारू से चोप्पे पैक भरा लेते हो तो एकाध गहना बेचि नही सकते? खेत बेंच,बाग बेंच गहना गुरिया बेंच, कुच्छौ कर पर काठमांडु चल.. ई अनतरराष्ट्रीय परोगराम हवे.
ए समललऊ! अब तू चोप होई जा नाही त देब खाई भर के, भग सारे हिया से. हम घर द्वार बेंचि के काठमांडु जाई. हमार दिमाक खराब बा का रे?  सारे निपुछिया हमके अऊर काम धाम नाही बा का?  हमका  परभात समझे हये का रे! लंगोटिया पे फाग थोरहू खेलबे... तू सरऊ भागिन जा हिया से नाही दे डंडा बोकला निकोल देब...

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

तुम भी खामोश थी मै भी खामोश था












तुम  मेरे पास  थी मै  तेरे पास था
एक मीठी मुहब्बत का एहसास था।
आँख झुकती गयी लब सिले रह गये,
तुम भी खामोश थी मै भी खामोश था।।

रात ढलती  रही   प्यार पलता रहा
सांसो की सरगमी धुन को गुनता रहा।
जनमों की अमावस बनी पूर्णिमा ,
मेरी आगोश में चाँद सोता  रहा ।।

झूमता है जहाँ गीत पर जो मेरे
छंद है ये लिखे  जो थे तेरे लिए।
मेरे होंठो पे जो शब्द तुमने रखे ,
उम्र  भर मै  उसे गुनगुनाता रहा  ।।


मंगलवार, 12 मार्च 2013

...तुम्हे मैं याद आऊँगा


आइना जब भी देखोगी तुम्हे मैं याद आऊँगा
कभी जब हँस के रोओगी, तुम्हे मैं याद आऊँगा,
 

अकेले मे टहलते छत पे बस्स ऐसे जरा यूं ही,
कभी जब चाँद देखोगी तुम्हे मैं याद आऊँगा.
 

हवाएं मुझसे होकर तुम तलक तो जा रही होंगी
जो तुमसे कह नहीं पाया वही
बतला रही होंगी,
 

तुम्हारी आँख मे सावन का मौसम छा गया होगा,
घटायें जब भी बरसेंगी   तुम्हे मैं याद आऊँगा.
 

उठेगी हुक दिल में जब खिलेंगे फूल बागो में
तुम्हारी नज़रे ढूंढेगी  मुझे तेरे ही ख़्वाबों में,
 

मिटेगी ना इबारत जो लिखी पहली मुहब्बत की,
बहारे जब भी आयेंगी, तुम्हे मैं याद आऊँगा.

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

कलम तुम उनकी जय बोलो...


नजर टेढ़ी जवानो की भिची जो मुट्ठिया हो फिर
भगत आजाद अशफाको  की रूहे झूम जाती है,
जय हिंद के जयघोष की उट्ठी सुनामी जो  
तमिलनाडु से लहरे जा हिमालय चूम आती है 

मेरी धरती मेरा गहना   इसे माथे लगाउंगा 
जब तक सांस है बाकी इसी के गीत गाउंगा,
गुजरी कई सदिया मगर इक वास्ते तेरे
हजारो  बार आया हू हजारो बार आउंगा

                                               

कहू गंगा कहू जमुना कहू कृश्ना कि कावेरी  
रहू कश्मीर या गुजरात या बंगाल की खाडी, 
मै हिन्दी हू या उर्दू हू कन्नड हू कि मलयालम
मै बेटा हू सदा तेरा तु माता है सदा मेरी

तेरे नगमे मेरे होठों पे कलमा के सरीखे है 
तेरे साए हूँ इस बात का अभिमान करता हूँ .
तेरी सुर्खी रहे कायम दो मुट्ठी राख से मेरी 
सलामे हिंद अपनी जान मै कुरबान करता हूँ 
                                                                                                                                                   जय हिन्द


मंगलवार, 22 जनवरी 2013

चिट्ठी ना कोई सन्देश जाने वो कौन सा देश जहा तुम चले गये

 आज गली मुहल्ले से लेकर जाने कैसे कैसे चिरकुट लोग "नेता जी"के नाम से अपने को सम्बोधित करवा रहे है जोकिनेताजी सुभाष के पाव की धोवन के बराबर नही. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरानजो व्यक्ति अपनो की साजिश का शिकार हो गया जिसने मातृभूमि को सब कुछ न्योछावर कर दिया उसके प्रति आज के नेताओ की कृतघ्नता देख कर शर्म आतीहै आज तक यह ना पता चल पाया कि नेताजी की मौत कैसे हुयी.
आज जरूरत कि जनता इन कांग्रेसियो से अपने प्यारे नेताजी के बारे मे सवाल पूछे कि जिस बन्दे ने देश से बाहर आज़ाद हिन्द फौज बनायी वह देश मे कायरो की भांति गुमनामी जिन्दगी क्यो जियेगा?नेताजी सुभाषचन्द्र बोस विमान दुर्घटना मे नही मरे. जवाहरलाल नेहरू की महत्वाकान्क्षा की भेट चढ गये. सिंगापुर से वह सोवियत रूस ले जाये गये और भारत मे एक "गुमनामी बाबा" का किरदार गढा गया. ताकि उनके सोवियत रूस के किसी जेल मे होने की बात दब जाय.सोवियत रूस उस समय मित्र देशो के साथ था.हालात आज भी है कि हिटलर के साथ होने की हिमाकत वर्तमान मे भी कोई देश नही करता तो नेताजी जिन्होने जर्मनी और जापान के साथ हिन्दुस्तान को खडा करने की कोशिश की थी उन्हे मित्र राष्ट्र कैसे छोड सकते थे. नेहरू मित्र राष्ट्रो के सर्वाधिक अनुकूल नेता थे सो असली नेताजी को सोवियत के किसी जेल मे बन्द करके नकली नेताजी को गुमनामी बाबा के नाम से फैजाबाद भेज दिया गया. नेताजी के ज्यादातर भक्त आज ‘दशनामी सन्यासी’ उर्फ ‘भगवान जी’ उर्फ ‘गुमनामी बाबा’ को ही नेताजी मानते हैं। (अनुज धर के ‘मिशन नेताजी’ ने इसके लिए बाकायदे अभियान चला रखा है।) कारण हैं: उनकी कद-काठी, बोल-चाल इत्यादि नेताजी जैसा होना; कम-से-कम चार मौकों पर उनका यह स्वीकारना कि वे नेताजी हैं; उनके सामान में नेताजी के पारिवारिक तस्वीरों का पाया जाना; नेताजी के करीबी रहे लोगों से उनकी घनिष्ठता और पत्र-व्यवहार; बात-चीत में उनका जर्मनी आदि देशों का जिक्र करना; इत्यादि।
जो बातें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के समर्थन में जाती हैं, उन्हीं में से कुछ बातें उनके विरुद्ध भी जाती है, मिसाल के तौर पर: सन्यास लेकर जब नेताजी ने पिछले जीवन से नाता तोड़ लिया, तो फिर पुराने पारिवारिक छायाचित्रों के मोह से वे क्यों बँधे रहे? क्या सिंगापुर छोड़ने के समय से ही वे इन छायाचित्रों को साथ लिये घूम रहे थे?
अगर उनके सामान में उनके ही टाईपराईटर और बायनोकूलर पाये जाते हैं, तो यह ‘दाल में काला’- जैसा मामला है। सिंगापुर छोड़ते समय निस्सन्देह वे अपना टाईपराइटर और बायनोकूलर साथ नहीं ले गये होंगे, न ही (सन्यास धारण करने के बाद) सोवियत संघ से भारत आते समय इन्हें लेकर आये होंगे, फिर ये उनतक कैसे पहुँचे? सिंगापुर में उनके सामान को तो माउण्टबेटन की सेना ने जब्त कर सरकारी खजाने में पहुँचा दिया होगा। (एक कुर्सी शायद लालकिले में है।)

माना कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नेताजी पर छपने वाली खबरों की कतरनों को उनके भक्तजनों ने उनतक पहुँचाया होगा, मगर सरकारी खजाने से निकालकर मेड इन इंग्लैण्ड एम्पायर कोरोना टाईपराइटर और मेड इन जर्मनी 16 गुना 56 दूरबीन उनतक पहुँचाना उनके भक्तजनों के बस की बात नहीं है। तो फिर? क्या गुप्तचर विभाग के अधिकारियों ने उनके पास ये सामान पहुँचाये? तो क्या ‘गुमनामी बाबा’ को भारत सरकार के गुप्तचर विभाग ने खड़ा किया था? ताकि वास्तविक नेताजी की ओर लोगों का ध्यान न जाये? या फिर, जनता ‘ये असली हैं’ और ‘वे असली हैं’ को लेकर लड़ती रहे और सरकार चैन की साँस लेती रहे?

"दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे
सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर
मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर
मृत्यु देवताओं ने होंगे प्राण तुम्हारे खींचे

प्राण तुम्हारे धूमकेतु से चीर गगन पट झीना
जिस दिन पहुंचे होंगे देवलोक की सीमाओं पर
अमर हो गई होगी आसन से मौत मूर्च्छिता होकर
और फट गया होगा ईश्वर के मरघट का सीना

और देवताओं ने ले कर ध्रुव तारों की टेक -
छिड़के होंगे तुम पर तरुनाई के खूनी फूल
खुद ईश्वर ने चीर अंगूठा अपनी सत्ता भूल
उठ कर स्वयं किया होगा विद्रोही का अभिषेक

किंतु स्वर्ग से असंतुष्ट तुम, यह स्वागत का शोर
धीमे-धीमे जबकि पड़ गया होगा बिलकुल शांत
और रह गया होगा जब वह स्वर्ग देश
खोल कफ़न ताका होगा तुमने भारत का भोर।"(धर्मवीर भारती)

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

नवभारत टाईम्स बनाम हनी सिह: चोर चोर मौसेरे भाई

इंटरनेट पर गन्दगी फैलाने मे नवभारत टाईम्स महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. उत्तेजना को उकसाने वालो के लिये भी कोई कानून बने. बलात्कार जैसे अपराध के व्यक्ति तो जिम्मेदार है ही साथ ही बलात्कारी मानसिकता का निर्माण करने वाले फैक्टर्स की भी खोज करके उन्हे समाप्त करने की जरूरत है. मुझे कहने मे कोई गुरेज नही कि नवभारत टाईम्स एक समाचार पत्र की नही बल्कि बलात्कारी मानसिकता निर्माण करने का मुखपत्र है.

नवभारत टाईम्स और हनी सिह दोनो एक ही तरीके से चल रहे है. अश्लीलता मानव को अपनी ओर खीचती है आकर्षित करती  है उत्तेजित करती  है. उत्तेजना के सहारे बाजार मे बना रहा जा सकता है और बिका जा सकता है. जिस तरह इंडिया टुडे समेत तमाम पत्रिकाओ का पोर्नाईजेशन हुआ है उससे यह बात साबित हो जाती है कि पोर्न से लिपट कर आप न केवल जिन्दा रह सकते है बल्कि लोगो को पीछे छोड सकते है.समाज मे होने वाले बलात्कार और अन्य अपराधो को प्रोत्साहित और उनकी मार्केट वैल्यू बढाने मे नवभारत टाईम्स अपनी पूरी पूरी भूमिका निभा रहा है. आप इस समाचार पत्र को अपने परिवार के साथ नही पढ सकते है. माता पिता भाई बहन के साथ तो कतई नही. नंगी औरते दिखा कर यह अखबार ना जाने कौन सा मजा देना चाहता है खबरो की सनसनी से किसका भला होगा? वैसे कहने को धर्म साहित्य और दर्शन के भी ब्लाक आप पा सकते है किंतु क्या कभी एक ही थाली मे प्रभु प्रसाद और मल मूत्र को रख कर परोसा जा सकता है?
नवभारत टाईम्स सडी और बदबूदार मानसिकता का  द्योतक है, प्रतिनिधित्व है. ऐसे मे "प्रताप" की बहुत याद आती है.