सोमवार, 3 दिसंबर 2012

मेरे बिखरे हुये गेसू और उलझी लटें तुम्हारी राह देखती है

 


इस कविता के माध्यम से मै रत्नावली के मन मे उठे उदगारो  को रख रहा हू जो उन्होने गोस्वामी जी के वियोग मे व्यक्त किये होंगे. यदि आप मानस का हंस पढे  होंगे तो कविता के भाव और भीने हो जायेगे.









मेरे बिखरे हुये गेसू
और उलझी लटें 
तुम्हारी राह देखती है
कि तुम आओगे
एक दिन
चाहे वह मेरे जीवन का
अंतिम दिन ही क्यो ना हो
गूंथोगे मेरा जूड़ा 
मिटाओगे मेरी सिलवटें 
माथे से लेकर मन तक
उंगलिया बालो को
हौले हौले सहलायेगी
और मै तुम्हारे सीने मे
अपना मुंह  छुपा लूंगी
फिर तुम्हे देखूंगी एकटक
देखती जाऊंगी
इस तरह
तुम्हारी छवि लिये
बन्द होंगी पलके
सदा के लिये
मै उसी एक दिन की
प्रतीक्षा मे जी रही हू
बिखरे हुये गेसू और
उलझी लटों  के साथ.