सोमवार, 26 नवंबर 2012

"आप" का उदय और भाजपाईयो का रुदन:एक लेखा जोखा

आम आदमी पार्टी क्या बनी भाजपा के लोग और उनके समर्थक परेशान हो गये कि यह पार्टी भाजपा के वोट काटेगी और कांग्रेस इस तरह से फिर सत्ता मे वापस आ सकती है. क्या भाजपा आम आदमी पार्टी के रहमोकरम पर है या उसे अपने पर विश्वास नही है. भारत मे संगठन कोई भी बना सकता है सिर्फ इसलिये विरोध कि तुम्हारे संगठन बनाने से हमे नुकसान हो जायेगा के आधार पर विरोध जायज नही है, दूसरी बात भाजपा अपना घर सम्भाल नही पा रही है सुषमा और जेटली गडकरी के साथ मिलकर जिताऊ  लोगो  को उभरने का मौका ही नही दे रहे है. मोदी विरोध के नाम पर भाजपा की लुटिया डुबाई जा रही है. हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे. यूपी मे स्थिति और भी बुरी है योगी आदित्य नाथ को काट छाट कर गोरखपुर तक सीमित कर दिया गया. विनय कटियार और उमा भारती जैसे दो कौडी का नेतृत्व को थोपना और कल्याण सिह जैसे फुस्स पटाखे को फिर आजमाना इतना हास्यास्पद हो गया कि क्या कहने. अब  मतदाता किधर जाये ??? तो फिर  इसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को नही मिलना चाहिये तो क्या कांग्रेस को मिलना चाहिये. कांग्रेस एक प्रेत पार्टी है जो सजीव नही बल्कि भूतो द्वारा संचालित है  ऐसे मे उससे टक्कर लेना मामूली बात नही. आम जनमानस शायद पहली बार चेतना के आधार पर मत देने के बारे मे सोच रहा है. जाति धर्म व्यक्ति के आधार पर नही कार्य और सकारात्मक मुद्दो के आधार पर की गयी वोटिंग ही सच्चे लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त करेगी.
मतदाता को बधुआ समझने वाले राजनीतिक दलो को अपनी सोच मे बदलाव करना होगा. अब जबकि राजनीति के अखाडे मे एक और पहलवान आ गया है तो उसके द्वारा प्रयोग किये जा रहे दाव पेच देखना दिलचस्प होगा और यह भी देखना होगा कि क्या उसके दाव पेच से दूसरे प्रभावित होंगे. अरविन्द के ग्रुप के और सदस्यो से बिना सहमत हुये मुझे लगता है कि यह एक ठीक ठाक  तरीका है काम करने का. मुझे प्रशांत भूषण  के कश्मीर बयान से चिढ है किंतु राम जेठमलानी का अपराध मुझे अभी ज्यादा लग रहा है. भाजपा मे रहते हुये जेठमलानी अफज़ल गुरु का मुकदमा लडते है तो भाजपा को दिक्कत नही किंतु गडकरी  के खिलाफ बोले तो सस्पेशन .यानी गडकरी देश से ज्यादा महत्वपूर्ण है, बात हजम नही हुयी. मुझे लगता है जब रोग लाईलाज हो जायेगा तब भाजपा फिर राम रोटी यात्रा की शरण मे जायेगी पर तब तक तो हाण्डी मे भात पक चुका होगा.
मैने शुरु से अरविन्द के क्रियाकलापो पर आलोचनात्मक रवैया रखा और आई ए सी कानपुर से भी दूरी रखी  बावजूद इसके अरविन्द के कदम सराहनीय है इसमे कोई दो राय नही.